jansatta article about inhuman behavior - Jansatta
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गुम संवेदना

कई नजरों के सामने कोई हाड़-मांस का इंसान जमीन पर पड़े छटपटाता रहे और कोई भी इंसान आगे बढ़ कर मदद के लिए नहीं आए! मूकदर्शक बना रह जाए।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

वह तस्वीर अखबारों में छापी जा चुकी है। कुछ समाचार चैनलों से भी प्रसारित हो चुकी है। सोशल मीडिया में अब भी विचर कर रही है। हमारी संवेदना पर सवाल उठाती हुई बार-बार। यह कैसे संभव हो सकता है कि कई नजरों के सामने कोई हाड़-मांस का इंसान जमीन पर पड़े छटपटाता रहे और उसकी तरह का ही वहीं आसपास भीड़ की शक्ल में मौजूद कोई भी इंसान आगे बढ़ कर मदद के लिए नहीं आए! मूकदर्शक बना रह जाए। बल्कि उनमें से बहुत सारे आंखें फेर ले। असमंजस की स्थिति में पड़ जाए। नोटबंदी की वजह से लगी कतारों में खड़े लोग अपनी बारी के इंतजार में किसी दूसरे पर यकीन नहीं करना चाहते, कोई हटना नहीं चाहता कतार छोड़ कर। हर किसी को रुपए की जरूरत है। जो भी मिल जाए। रद्दी करार दिए गए नोट बदल जाए। एटीएम या बैंक में कब रुपए खत्म हो जाएं, इस अंदेशे के साथ कतार छोड़े कौन? कतार छोड़ कर किसी की तिमारदारी में कौन लगे?
इसी वजह से एक पैंतालीस साल के आदमी की जान चली गई। बंगाल के हुगली जिले में वह आदमी कल्लोल चौधरी एटीएम के आगे लाइन में लगा था। कल्लोल चौधरी को अचानक हार्ट-अटैक आ गया। वह कोई आधे घंटे तक एटीएम के बगल में ही छटपटाता पड़ा रहा। लेकिन कतार से निकल कर एक भी शख्स उसे देखने, उसका हाल पूछने नहीं आया। शायद सबको डर था कि कहीं कतार से हटने से उसे रुपए निकालने का अवसर खोना पड़ सकता है। आखिर में एटीएम के गार्ड की पहल से उसे अस्पताल पहुंचाया गया। तब तक देर हो चुकी थी। घर से कहीं दूर निकले राही का लौटना संभव नहीं हो पाया।

सोचता हूं कि कहां पहुंच गए हैं हम और कहां पहुंच गया है हमारा समाज। अफसोसनाक यह भी कि एक ऐसे समाज में यह घटना घटती है, जिसके दूसरों से ज्यादा संवेदनशील और जागरूक होने का ढोल पीटा जाता है… अहर्निश। बिना शक कहा जा सकता है कि जिस धरती पर बंकिम, शरद, रवींद्र, सुभाष, मृणाल, ऋृतिक, सत्यजीत राय से लेकर महाश्वेता देवी तक जैसे सांस्कृतिक शख्सियतों की फसल लहलहाती रही हो, उससे इंसानी संवेदना की परवाह की चाह कुछ अधिक हो ही जाती है। शोबार ऊपर मानुष… सबसे ऊपर मनुष्य… इस कथन को बार-बार कहने-सुनने वाले समाज से तो उम्मीद या अपेक्षा तो की ही जानी चाहिए। लेकिन अचानक बगैर किसी जरूरी तैयारी के थोपी गई नोटबंदी के कारण वहां उस कतार में लगे लोगों ने भी एक उम्मीद पर पानी फेर दिया तो उसे क्या कहेंगे! हालांकि कतारों ने पूरे देश में बहुत-सी जाने ले ली हैं अब तक। बुजुर्ग-बीमार लोगों की। लेकिन बंगाल में हुई उस आकस्मिक मौत ने शर्मिंदगी के अहसास को बहुतों में जगाने का काम किया है। यह संभव नहीं कि वहां कतार में लगे लोगों के विवेक ने खुद उन्हें कोसा न हो।

हालांकि शर्म उस ओर, उस इलाके में नहीं पहुंच पाई। विवेक जैसे शून्य हो गया। तुगलकी फरमान के दरपेश कुनतीजों के बावजूद। साथ ही इसे नकारने की जिद भी। करोड़ों लोगों की हैरानी-परेशानी की तरफ नहीं देखने की कसम ले ली हो जैसे। कहीं यह पश्चिम बंगाल में बदलती फिजा का नतीजा तो नहीं! समय गवाह है कि यहां की फिजा इधर के कुछ सालों में बदली है। स्टेशनों, सड़कों, अस्पतालों, होटलों, घरों तक में बीमार, हादसे का शिकार, हिंसा की गिरफ्त में आया आदमी असहाय हालत में अनेक बार पाया गया है। मगर संवेदना की जगह उन्हें सुर्खियां जरूर मिलती रही हैं। भीड़ की हिंसा की जद में बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक आने लगे हैं। महिलाएं तो हैं ही। छोटी-मोटी चोरी के आरोप में मासूम बच्चे बिजली के खंभों में बांध कर पीट-पीट कर अधमरा कर दिए जा रहे हैं। शराब, जुए, आतिशबाजी के शोर पर एतराज जताने पर बुजुर्ग तक पिट जा रहे हैं। प्रेम पर चाकुओं या फिर तेजाब के हमले हो रहे हैं। रिश्ते तार-तार हो रहे हैं। राजनीतिक हिंसा-प्रतिहिंसा का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा। और बीच-बचाव, प्रतिकार की पहल कम या कमजोर पड़ती जा रही है दिनोंदिन। उत्सवों में भीड़ बढ़ रही है, लेकिन दुख के परोसे क्षणों में आंसुओं को पोंछने वालों की तादाद कम होती जा रही है। इस बदलते परिदृश्य ने इंसान को अति छोटे दायरे में समेटना शुरू कर दिया है। बंग समाज ऐसा न था। सामाजिकता के क्षीजते इस मंजर की बाबत सोचा जाना चाहिए। कतार के पास इंसानों की मौजूदगी में कोई तड़प-तड़प कर मर जाए, यह किसी भी संवेदनशील समाज के लिए काम्य नहीं हो सकता। कतई नहीं।

 

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