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दुनिया मेरे आगे- बचत के नुस्खे

टीवी स्क्रीन पर कितना भी जरूरी कार्यक्रम चल रहा हो, अगर इस दौरान बिजली चली जाए तो अब अच्छा लगने लगा है।

Author August 23, 2017 05:46 am
प्रतीकात्मक चित्र।

संतोष उत्सुक

जिंदगी के इम्तिहान में कई गंभीर तात्कालिक समस्याओं से ज्यादा अंक लेने वाली महंगाई का मौसम हमेशा रहता है। टीवी स्क्रीन पर कितना भी जरूरी कार्यक्रम चल रहा हो, अगर इस दौरान बिजली चली जाए तो अब अच्छा लगने लगा है। इस बहाने बिल में थोड़ी रकम बच जाती है और साथ ही इस बीच परिवार में आसपास मौजूद लोगों से बातचीत का मौका भी निकल आता है। लाइट नहीं होने पर कई बार संजीदा बातें भी अपने आप शुरू हो जाती हैं। शायद इसीलिए अंधेरे में उम्मीद का उजास छिपा होता है। हम इस बारे में बात करते रहते हैं कि महंगाई को सहने के लिए संजीदा उपाय करने चाहिए। ऐसे सुझाव सामने आते हैं कि जिन सब्जियों को हमने तुच्छ समझ कर खरीदना, पकाना और खाना बंद कर दिया है, उन्हें दोबारा प्रयोग में लाना चाहिए। इस बारे में हमें ग्रामीण अंचलों में रहने वालों से सीखना होगा। वहां अभी भी ढेअू की कलियों, सिंबल डोडों, कचनार, सहजन के फूल, काकोड़ा, मीठा करेला और अन्य कई वनस्पतियों को सब्जी के रूप में खाया जाता है। हालांकि विकास की बारिश ने वहां भी नए महंगे खाद्य बिखेर दिए हैं, मगर भुलाया जा रहा सामान प्रयोग करें तो बचत हो सकती है। मकान बनाते समय अक्सर जमीन हथियाने वाला आदमी कुछ वर्गफुट कच्ची जमीन रसोई के पड़ोस में मिर्च, धनिया, पुदिना और अन्य कम जगह घेरने वाली सब्जियों के लिए छोड़ दे तो स्वच्छ और ताजा स्वाद के साथ-साथ पैसे भी बच सकते हैं। रसायनों के छिड़काव से जान बचेगी, वह लाभ अलग। कभी-कभी पुदीने और धनिया की आठ या दस रुपए की छोटी-सी गुच्छी मिलती है। ऐसे में घर का धनिया, पुदीना या अन्य साग-सब्जी कितनी स्वादिष्ट, बचत बढ़ाने वाली और प्यारी लगने लगेगी! कुछ लोगों ने तो ऐसे प्रयोग घर में रखे गमलों और छत पर जमाई बगिया में कर रखे हैं।

जाहिर है, ऐसे उपायों से स्थायी बचत होगी। इसके अलावा, बचत के लिए पत्नी का यह सुझाव भी आया कि अक्सर बाहर के खाने पर रोक लगा कर जो मन चाहे, घर में बना कर खाया जाए। बाजार से दही न खरीद कर घर पर ही जमाई जाए, पनीर खाने का मन हो तो घर पर बनाया जाए। मटर के छिलके और आलू की भाजी बनाने के अलावा फूलगोभी के डंठल को छील कर सब्जी में डाला जा सकता है। स्थानीय और कम लोकप्रिय, मगर पौष्टिक सब्जियां खाना शुरू किया जा सकता है। मेरे पास दादी मां के जमाने की एक पुरानी किताब है, जिसमें बिना ज्यादा लागत के पौष्टिक और स्वादयुक्त खाना बनाने के तरीके हैं। हम सब वे नुस्खे जमाने के साथ चलने की नकल में ठुकरा चुके हैं। अब शायद वह किताब बड़े काम की साबित होगी।कई दिनों से मैं भी सोच रहा था कि बाजार के विज्ञापनी माहौल से खुद को अलग किया जाए। वही सामान खरीदा जाए, जिसकी जरूरत बनी रहती है। जिस कमरे में बैठें, वहीं बिजली जलाएंगे। साबुन खत्म होने वाला हो तो उसे यों ही नहीं फेंक कर नए साबुन के साथ चिपका लेंगे। ज्यादा दूर नहीं जाना हो तो पैदल चलेंगे। सेहत भी दुरुस्त रहेगी। दूर जाना हो तो टैक्सी नहीं, बस या ट्रेन से जाएंगे। सिर्फ शौक पूरे करने के लिए चीजें नहीं खरीदेंगे। टूथपेस्ट या शेविंग क्रीम की ट्यूब खाली होने के बाद उसे पूरी तरह पिचका कर काट लेंगे, ताकि कुछ दिन और काम चल जाए। बच्चों को बचत और पैसे का महत्त्व समझाने का समय आ गया है। अब यह चाहता हूं कि जिन बहुत से स्वदेशी और घरेलू उत्पादों को हम बरसों से हिकारत की नजर से देख रहे हैं, उन्हें अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाएं।

हो सकता है कि बिजली के बहाने की गई इन बातों में बहुत सारे लोगों को शायद कोई रुचि नहीं हो। लेकिन यहीं मुझे एक कहावत याद आती है- ‘बूंद-बूंद से घड़ा भरता है’। सबके दिमाग में महंगाई के मौसम में थोड़ा-थोड़ा करके कुछ पैसे बचाने के कुछ और भी नुक्ते आ सकते हैं। यों भी, बचत तो उन्हीं को करनी होती है, जिन्हें अपनी कमाई मेहनत की लगती है और अपनी मेहनत की कीमत समझ में आती है। तो मेरा खयाल है कि अपने घर के किसी कोने में उदास पड़ी दादी मां के जमाने की वह किताब ढूंढ़ लेनी चाहिए! क्या ही अच्छा हो, अगर बचत के सरल उपायों पर हम एक-दूसरे से बेझिझक संवाद शुरू करें, संपर्क का सस्ता माध्यम और साधन चुनें। आमने-सामने संवाद हो तो लोप हो चुकी बैठकें फिर लौट सकती हैं, जहां एक दूसरे के दुख-दर्द भी बांटे जा सकेंगे, आंसुओं की गुंजाइशें कम की जा सकेंगी।

 

 

 

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