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दुनिया मेरे आगे- भूलते भागते क्षण

नेपथ्य में शंकर महादेवन की आवाज है। कैडबरी चॉकलेट का यह विज्ञापन टीवी पर उन दिनों आता था, जब बहुत ज्यादा चैनल नहीं होते थे और ज्यादातर घरों में सिर्फ दूरदर्शन चलता था।
Author August 14, 2017 05:27 am
प्रतीकात्मक चित्र।

 अनिल हासानी 

एक पुराना विज्ञापन अभी कुछ दिन पहले यूट्यूब पर देखा। एक क्रिकेट मैच में लड़का छक्का मार कर शतक पूरा करता है। दर्शक दीर्घा में बैठी लड़की, जो शायद उसकी मित्र है, खुशी से कुछ अलग और मजेदार तरह से नाचती हुई स्टेडियम में आती है। नेपथ्य में शंकर महादेवन की आवाज है। कैडबरी चॉकलेट का यह विज्ञापन टीवी पर उन दिनों आता था, जब बहुत ज्यादा चैनल नहीं होते थे और ज्यादातर घरों में सिर्फ दूरदर्शन चलता था। तब पता नहीं था कि जो विज्ञापन मजबूरी में देखने पड़ते हैं, कभी इतने सालों बाद फिर यूट्यूब पर देख कर इतना अच्छा लगेगा। 1990 का दशक। कुछ तो खास बात थी उन दिनों। आर्थिक मोर्चे पर वैश्वीकरण और निजीकरण की हवा चल रही थी। सामाजिक स्तर पर जहां नए मूल्य स्थापित होने की प्रक्रिया जारी थी तो पुराने मूल्यों को संजोए रखने की कोशिश भी चल रही थी। तथाकथित मध्यवर्ग अपना दायरा बढ़ा रहा था। स्कूल में पढ़ाया जाता था कि भारत एक विकासशील अर्थव्यवस्था है। अब भी शायद यही पढ़ाते हैं। खैर… हम बच्चों को इन बातों से क्या लेना-देना। हमारा तो अर्थशास्त्र का ज्ञान यहीं तक सीमित था कि स्कूल आने-जाने के लिए मिलने वाले बस के भाड़े में से बचत कैसे की जाए!

वे दिन जब टीवी चैनल कम थे और मनोरंजन ज्यादा था, जब मोबाइल और इंटरनेट के बिना भी संवाद होता था; जब फोटोग्राफ ‘कोडक’ के कैमरे से लिये जाते थे, एक-एक फोटो किफायत से खींची जाती थी और अपने निजी एलबम में रखी जाती थी। जब घर में रंगीन टीवी और टेलीफोन होना संपन्नता का प्रतीक समझा जाता था और जब एक स्क्रीन वाले सिनेमा हॉल में पंखे की हवा और मूंगफली खाते हुए फिल्म का मजा लिया जाता था। वहां कोई गार्ड हमें घर से लाया खाने-पीने का सामान अंदर ले जाने से रोकता नहीं था और अंदर दस गुना कीमत पर सामान बेच कर कोई लूटता नहीं था। आज पूंजीवाद की देन मल्टीप्लेक्स के सामने हम शायद बेबस हो चुके हैं।तब यूट्यूब नहीं था और अपनी पसंद के गाने सुनने और पसंदीदा फिल्में देखने के लिए वीसीआर और टेप रिकॉर्डर का ही आसरा था। वीडियो गेम और कॉमिक्स के दिन। मई की गरमी की वजह से घर में कैद तब चाचा चौधरी, बिल्लू, पिंकी, नागराज और सुपर कमांडो ध्रुव की कॉमिक्स का ही सहारा होता था। पापा हमें पढ़ने के लिए चंपक, बालहंस, नंदन आदि पत्रिकाएं लेकर देते थे, मगर पता नहीं क्यों, कॉमिक्स पढ़ना अच्छे बच्चों की आदत नहीं मानी जाती थी। इसलिए हमेशा कॉमिक्स पढ़ते हुए कुछ अपराध-बोध सा महसूस होता था। उन सभी किताबों और कॉमिक्स का अच्छा-खासा संग्रह मेरे पास इकट्ठा हो गया था, जो अभी तक संभाल कर रखा हुआ है। पीले पड़ते हुए कागजों में से अभी भी वह बचपन वाली खुशबू आती है। आजकल के अभिभावक चाहते हैं कि बच्चा मोबाइल और कंप्यूटर छोड़ कर कुछ तो पढ़े। स्कूली किताबें न सही, कुछ कहानी, कविता या कॉमिक्स ही पढ़े, बस पढ़ने की आदत तो डाले।

पहले वीडियो गेम से लेकर कॉमिक्स और साइकिल भी घंटे के हिसाब से किराए पर मिलती थी। मुझे याद है, जब हम कभी एक दिन के किराए पर वीडियो गेम लाते थे तो हम सभी भाई अपना खाने-पीने और दैनिक क्रियाकलापों का कार्यक्रम ऐसे तय करते थे कि चौबीस घंटे में सारा पैसा वसूल सकें। केबल टीवी सिर्फ गरमी की छुट्टियों में नसीब होता था। माना जाता था कि इससे पढ़ाई पर बुरा असर पड़ता है। अब समझ आया कि दूरदर्शन का वह समय टीवी सीरियलों की गुणवत्ता की दृष्टि से स्वर्णिम युग था। उस समय प्रसारित होने वाले कार्यक्रम, जैसे ‘व्योमकेश बक्शी’, ‘फ्लॉप शो’, ‘श्रीमान श्रीमती’, ‘मालगुडी डेज’, ‘जंगल बुक’ आदि की अपनी एक खास जगह और पहुंच थी। यह वही वक्त था जब साक्षरता अभियान पर केंद्रित ‘तरंग’ जैसे कार्यक्रम से भी मनोरंजन हो जाता था। आज सिर्फ फिल्मों के ही कम से कम बीस चैनल आते हैं, जिन पर रोजाना सैकड़ों फिल्में आती हैं। लेकिन जो इंतजार तब दूरदर्शन पर सप्ताह में एक बार आने वाली फिल्म के लिए होता था, वह आज नदारद है। और फिर ‘रुकावट के लिए खेद है’ को भला कौन भूल सकता है।तब बिना किसी इलेक्ट्रॉनिक सामान के जिंदगी बहुत आसान होती थी। किसी भी वस्तु को खरीदने का निर्णय उसकी कीमत और अपनी जरूरत के आधार पर लिया जाता था, न कि उसके प्रचार पर। उन दिनों भारत में उपभोक्तावादी संस्कृति पूरी तरह से विकसित नहीं हुई थी। हर पीढ़ी अपने बचपन के समय को सबसे यादगार और विशिष्ट मानती है। 1990 के दशक को खास समझना हमारी पीढ़ी की खुशफहमी ही हो शायद। बस यही सोचता हूं कि ऐसे कितने लोग होंगे जो आज अपनी सारी दौलत कुर्बान कर अपने बचपन का एक दिन फिर से जीना चाहेंगे, बशर्ते ऐसा मुमकिन हो। कुछ तो होंगे ही शायद!

 

 

 

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