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दुनिया मेरे आगे- हमारी अजन्मी बेटियां

बेटे से ही वंश चलेगा, बेटा ही बुढ़ापा पार लगाएगा, बेटी तो पराई है सो पराये घर चली जाएगी और विवाह में भारी खर्च कराएगी सो अलग।

Author Published on: December 11, 2017 5:26 AM
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वीना सिंह 

कहने को तो हम सब कहते हैं कि बेटियां हमारे घर की शान हैं; बेटियों से घर में रौनक है और बेटियों से ही घर की व्यवस्था संतुलित है। पर ऐसा मानते बिल्कुल नहीं हैं। हमारी कथनी और करनी में बड़ा भेद है। हमारे घरों में हर रोज देवी की पूजा-अर्चना होती है। बेटी को देवी का ही रूप कहते हैं, पर बेटी का जन्म होते ही सब निराश हो जाते हैं और बेटे के जन्म पर खुशियों से भर जाते हैं। हम अंतर्मन से बेटे को ही मान्यता देते हैं। बेटा ही चाहते हैं। केवल अपने आपको अच्छा साबित करने के लिए ‘हमारे लिए बेटा-बेटी एक समान हैं’ ऐसा कहते हैं, पर यह सत्य नहीं है। हमारे समाज की कुछ ऐसी ही निम्न मानसिकता है जो गांव और शहर दोनों जगह दिखाई पड़ती है। हर तरह का बदलाव होने के बाद भी लड़कियों के प्रति भेदभाव जस का तस है। वे आज भी उपेक्षा की दृष्टि से देखी जाती हैं और वे अपने जीवन में कई तरह से शोषण का शिकार होती हैं। बेटे से ही वंश चलेगा, बेटा ही बुढ़ापा पार लगाएगा, बेटी तो पराई है सो पराये घर चली जाएगी और विवाह में भारी खर्च कराएगी सो अलग। ऐसे तुच्छ विचारों के कारण लोग बेटी को जन्म ही नहीं देना चाहते। इसी वजह से हमारे देश में दिनोंदिन कन्याभ्रूण हत्या में बढ़ावा हो रहा है।

बेटियों की इतनी अवहेलना, इतना तिरस्कार समाज व देश के लिए चिंताजनक है। पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों के घटते अनुपात का मुख्य कारण कन्याभ्रूण हत्या ही है जो कि हमारे समाज में रूढ़िवादिता और लोगों की संकीर्ण सोच का नतीजा है। समाज इतना क्रूर और संवेदनहीन हो गया है कि कन्याभ्रूण हत्या जैसा जघन्य पाप करने पर परिवार के सदस्यों को जरा भी दुख या शोक नहीं होता और न ही कोई अपराध-बोध होता है। अमीर लोगों के लिए तो पैसा खर्च करके गर्भपात कराना आसान है, पर जो गरीब हैं वे भी किसी तरह पैसा जुटा कर बेटी को कोख में ही मार देना उचित समझते हैं। कई बार तो कन्याभ्रूण को ऐसे ही कूड़े आदि में फेंक देते हैं जिसे अक्सर आवारा कुत्ते नोच-नोच कर खाते नजर आते हैं। ऐसे लोगों को न कोई पीड़ा होती है न खौफ। सच में हमारा समाज बेटियों के नाम पर क्रूरता की हदें पार कर चुका है।  कहते हैं संतान के जरा से कष्ट से मां का हृदय द्रवित हो उठता है। पर बेटी के नाम पर उसका भी हृदय पत्थर-सा हो जाता है। बलात्कार, यौन शोषण, अत्याचार, मानसिक व दैहिक शोषण जैसे अपराध तो बेटियों के बड़े होने पर होते हैं, पर यह अपराध तो उनके जन्म लेने से पहले ही किया जाता है जिसमें अपने माता-पिता ही शामिल होते हैं और जिसे अपराधी अपराध ही नहीं मानता, न दूसरा कोई हस्तक्षेप करता है न इस विषय पर कोई खुलकर बात करता है। कन्याभ्रूण हत्याओं के लिए काफी हद तक आज का असुरक्षित वातावरण भी जिम्मेवार है। हमारे परिवारों में बेटा न होने पर मां को ही जिम्मेवार ठहराया जाता है और उसे हेय दृष्टि से देखा जाता है, प्रताड़ित किया जाता है, यहां तक कि बेटा पाने के लिए पति दूसरा विवाह तक कर लेता है। इसी वजह से कई बार मां न चाहते हुए भी कन्याभ्रूण हत्या के लिए तैयार हो जाती है, क्योंकि परिवार और समाज में वह अपना महत्त्व या स्थान खोना नहीं चाहती।

चंूकि वंशवृद्धि, मोक्षप्राप्ति बेटे से ही होनी है और पिता की संपत्ति का वारिस भी बेटा ही होता है, बेटा होने से ही मां सम्मान पाती है। इसलिए हर मां एक बेटा जरूर चाहती है। कानून बनने के बाद भी संपत्ति में बेटी का हिस्सा नदारद है। बेटी का बस विवाह करना ही माता-पिता की जिम्मेदारी है, जिसके दहेज के लिए बेटी के जन्म लेते ही माता-पिता चिंतित हो जाते हैं। कहीं न कहीं दहेज प्रथा भी कन्याभ्रूण हत्या के लिए जिम्मेदार है। बेटियों के लिए अनेक कानून बने हुए हैं, पर सब बेअसर। बेटी बचाओ का नारा लगाने वाले ही बेटियों को नहीं बचा रहे हैं। सारे कानून फाइलों में ही सिमटे हुए हैं। नियम-कानून सभी जानते हैं, पर सब के सब मूकदर्शक हैं। जरूरत है माता-पिता को अपनी सोच के दायरे को बढ़ाने की, कि वे बेटी और बेटा दोनों के महत्त्व को समझें और अपने बच्चों के पालन-पोषण व शिक्षा-दीक्षा में भेदभाव न करें। दोनों के जीवन को सफल व सुंदर बनाने का प्रयत्न करें। कन्याभ्रूण हत्या की वजह से देश में स्त्री-पुरुष अनुपात बिगड़ गया है। विचार करने की बात है कि जिस वंशवृद्धि के लिए बेटों को प्रमुखता दी जा रही है वह बेटियों के बिना कैसे मुमकिन है? नारी के बिना जीवन कैसे संभव है? अत: बेटे जितने आवश्यक हैं उतनी ही बेटियां भी।

 

 

 

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