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दुनिया मेरे आगे : संत्रास के रंग

दलित-कला समकालीन कला आंदोलन के भाग रूप में चली भी, कुछ चित्रकारों ने आंचलिकता के नाम पर उसे संयोजित भी किया, लेकिन वह व्यापकता के साथ नहीं समेटी जा सकी।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

आजादी मिलने के सत्तर वर्षों के बाद भी भारतीय समाज की चेतना में अब भी वह भाव नहीं दिखाई देता, जो किसी विकासशील राष्ट्र में जागरूक रूप में दिखाई देता है। यों नगरों-महानगरों का विस्तार तेजी से हो रहा है। आंकड़ों में ही सही, गरीब आबादी का प्रतिशत कम हो गया है, लेकिन उसके दर्शन आज भी सर्वत्र उपलब्ध हैं; कमजोर, असहाय और अनुसूचित जाति वर्ग की समस्याएं ज्यों की त्यों विद्यमान हैं। साहित्य, कला और संस्कृति में दलित चेतना के स्वर आज भी दबे स्वरूप में परिलक्षित हैं। भारतीय चित्रकला के व्यापक फलक पर दलित चेतना अब तक समकालीन कला आंदोलन में एक बिखराव के साथ दिखती है। दसअसल, हमारे चित्रकारों की रंग-प्रियता, चटकता और चकाचौंध ने उपेक्षित जनसमाज को अपनाने में सदैव कोताही की है। यही वजह रही कि दलित साहित्य के समान ही दलित कला का भाव निरूपण चित्र-फलक पर सघनता से नहीं उभर सका। जबकि अंतरराष्ट्रीय फलक पर नजर जाती है तो हम भूख-बेकारी, अस्पृश्यता और भेदभाव की एक ऐसी जटिल संधि से सामना करते हैं, जिसकी समझ हमारी चेतना के केंद्र में हमेशा अलग-थलग पड़ी रही है। यह कमोबेश रंग-कूचियों का ध्यान अपनी ओर खींचती तो है, लेकिन उससे एक रागात्मकता कायम नहीं कर पाती। संविधान में दलित वर्ग की समस्याओं को स्वीकार कर उन्हें बढ़ावा दिए जाने के उपाय सुझाए गए हैं, लेकिन वे कितने सामाजिक सरोकारों से प्रतिबद्धता के साथ जुड़ पाए हैं, कहना कठिन है। दलित कला चेतना का जो स्वर समकालीन कला में जिस भी रूप में समेटा जा सका है वह संतोषजनक तो नहीं है, फिर भी जिन चित्रकारों ने ग्रामीण और लोकजीवन के बिंबों को उकेरा है, वे अवश्य थोड़ा बहुत न्याय कर सके हैं। कला पाठ्यक्रमों में दलित कला चेतना के लिए नियोजित क्रम से यथार्थवादी कला को प्रस्तुत कर उसे क्रमबद्धता दी जानी चाहिए। भारत जैसे गरीब राष्ट्र में दलित कला के चित्रांकन के लिए जहां विषयों की भरमार है, वहीं वह विकासशील राष्ट्र के रूप में उसकी आवश्यकता भी है।

भारतीय चित्रकला के प्राचीन स्वरूप में जहां सामंती चित्रों की भरमार है, वहीं अब जनवादी कला का रूप-स्वरूप दलित कला चेतना केंद्रित चित्रों की अपेक्षा भी करता है। कचरा बीनने वाले बच्चे, मजदूरी करते बाल श्रमिक, फुटपाथों पर जीवनयापन करने वाले लाखों वे लोग, जिनकी आवश्यकताएं रोटी से ज्यादा बढ़ ही नहीं पाई हैं या वे अनुसूचित और जनजाति के समाज, जो विकास की एक किरण के लिए आज भी मोहताज हैं। वे कब समकालीन कला के फलक पर उभर पाएंगे? दरअसल, विषयों से साक्षात्कार का सवाल हर कलाकार, चित्रकार या साहित्यकार के लिए शुरू से ही चुनौती भरा रहा है। यह चित्रकार की दृष्टि और उसकी सजगता पर भी निर्भर करता है। समसामयिक घटनाओं से प्रेरित जटिलताओं का सहज अंकन कलाकार को जहां उसके दायित्व के करीब ले जाता है, वहीं वह सामाजिक संत्रासों को भी रंग दे सकता है। उसके रंग क्या कहेंगे या उनकी भाषा क्या होगी, यह समय तय करेगा, लेकिन उससे निरंतर जुड़ाव उसकी प्रतिबद्धता में अवश्य आना चाहिए। बड़े-बड़े चित्रफलक बन रहे हैं, उन पर नए प्रयोग हो रहे हैं और रंगों की मार से वे अपनी ओर ध्यान आकर्षित भी रहे हैं। लेकिन वे मूक-से, बेजान दिखाई देते हैं। सामाजिक यथार्थ का स्वरूप भले स्थूल रूप में चित्रकारों ने समेटा है, लेकिन वह उपेक्षित जन-समाज को अपनी रंग योजना में शामिल नहीं कर पाया है।

दलित-कला समकालीन कला आंदोलन के भाग रूप में चली भी, कुछ चित्रकारों ने आंचलिकता के नाम पर उसे संयोजित भी किया, लेकिन वह व्यापकता के साथ नहीं समेटी जा सकी। वह शौकिया या दिखावे के रूप में पास की झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने वाले वे नागरिक जो हर वर्ष राजनीति की आग के शिकार होकर नए सिरे से फिर निर्माण में जुटते हैं और बस वे केवल घरौंदे की तरह बनते-बिगड़ते रहते हैं। उनके लिए पंचवर्षीय योजनाओं में प्रावधान तो होते हैं लेकिन कागजी शेर की तरह जिसे खानापूर्ति के बाद आंकड़ों के रूप में दर्शाया भर जाता है। यह संत्रास क्या चित्रफलकों में प्रतीकात्मक स्वरूप में चित्रित होने पर दलित चेतना को स्वर दिए जाने के लिए समुचित नहीं है?
यह चेतना कला का प्राण बन सकती है और हमारी टूटती संवेदनाओं को भी बचा सकती है। कला पर बहसें होती हैं, उनमें यथार्थ को तलाशा जाता है, लेकिन हम उस समय इस सत्य को भूल जाते हैं कि कलाओं में पिछड़ापन क्यों है या एक बेजान सन्नाटा क्यों पसरा हुआ है। अब मोहभंग जरूरी है और तिलस्मी लोक से बाहर आना भी समय की मांग है। जो जीवित संसार है, उससे रूबरू होना ही पड़ेगा और वह जीवित संसार दलित कला का विपुल भंडार है। उसे न अपनाना समसामयिक स्थितियों से मुकरने की तरह है। इसलिए दलित कला को केंद्र में रख कर जो काम अब आएगा, वह जीवन की धड़कन को सुनाएगा और समाज की संवेदनाओं को जिंदा भी रखेगा।

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