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विकृत पूजा

विष्णु नागर जिस दिन भारत के अधिकतर क्रिकेटप्रेमी भारत-आस्ट्रेलिया के बीच क्रिकेट का विश्वकप मैच देख रहे थे, उस दिन एक खबर के अनुसार अलीगढ़ के हजारों गरीब-अमीर एक घर के बाहर जमा हो रहे थे, क्योंकि वहां एक गरीब के घर में ऐसी लड़की का जन्म हुआ था, जिसके मुंह पर ‘सूंड़’ जैसा कुछ […]

विष्णु नागर

जिस दिन भारत के अधिकतर क्रिकेटप्रेमी भारत-आस्ट्रेलिया के बीच क्रिकेट का विश्वकप मैच देख रहे थे, उस दिन एक खबर के अनुसार अलीगढ़ के हजारों गरीब-अमीर एक घर के बाहर जमा हो रहे थे, क्योंकि वहां एक गरीब के घर में ऐसी लड़की का जन्म हुआ था, जिसके मुंह पर ‘सूंड़’ जैसा कुछ है। हिंदू-मुसलमान सब उसे देखने के लिए लालायित थे, जिसे किसी ने ‘गणेश पत्नी’ नाम तक दे दिया था और वह चल गया (वह रिद्धि है या सिद्धी?)। पता नहीं हम किस युग में जी रहे हैं कि एक दिन की लड़की हुई नहीं कि उसे ‘गणेश-पत्नी’ बना दिया! जबकि गणेशजी की दोनों पत्नियों में से किसी एक की भी सूंड़ होने का उल्लेख कहीं नहीं मिलता। लेकिन मामला धर्म का है, इनमें हास्यास्पदता भी प्रसाद और आशीर्वाद की तरह ग्रहण की जाती है। उस लड़की के भी पैर छूकर आशीर्वाद लिए गए, लोगों ने उसके चरणों में नोट और नारियल वगैरह चढ़ाए। जिस तथाकथित सूंड़ के साथ वह बच्ची पैदा हुई, अगर किसी भले आदमी या संस्था ने समय रहते उसके जटिल और महंगे आॅपरेशन का खर्च नहीं उठाया तो जीवनभर उसे ‘सूंड़धारी’ लड़की होने का अभिशाप भोगना पड़ेगा।

पिछले साल एक खबर आई थी कि पश्चिम बंगाल के एक पचास साला मन्नान मंडल मुसलमान हैं, मगर उनकी भी ‘सूंड़’ है। इस तर्क के हिसाब से तो वे भी गणेशजी के अवतार ही हुए! उनकी ‘सूंड़’ तो है, मगर इस वजह से एक आंख, एक कान नहीं है और कुल चार दांत हैं। ताजा खबर वाली लड़की की भी नाक के दोनों छिद्र दो सूंड़ के दो सिरों पर हैं, उसके होंठ तथाकथित सूंड़ के नीचे दबे हुए हैं। इस विकृत चेहरे के कारण मन्नान को स्कूल में पढ़ने नहीं दिया गया, क्योंकि ऐसी सूरत देख कर बच्चे डर जाते थे। आॅपरेशन करवा सकने लायक आर्थिक हैसियत उनकी नहीं रही। इसलिए ‘सूंड़’ को ही उन्होंने रोजी-रोटी का साधन बना लिया, जिसके साथ वह देशभर में घूमते हैं और जो भी मिलता है उससे पांच लोगों के परिवार का खर्च चलाते हैं। हाल ही में किसी ने उनका आॅपरेशन करवाने का प्रस्ताव रखा तो उन्होंने यह कारण बताते हुए मना कर दिया कि इस शारीरिक विकृति को अब वे कमाने का साधन बना चुके हैं। इससे उन्हें करीब चार सौ रुपए रोज की आमदनी हो जाती है। उन्हें दो बेटियों की शादी की भी फिक्र है। बिना सूंड़ के मन्नान के लिए अब गुजारा करना मुश्किल है।

लखनऊ के पास के एक गांव के एक और गरीब चन्नालाल ‘सूंड़’ वाले हैं। कुछ पैसा जोड़ कर उन्होंने दस साल पहले आॅपरेशन करवाने का प्रयास किया था। मगर वे मरते-मरते बचे तो यह प्रयास अब छोड़ दिया है। ये ‘गणेश’ उसी दिन मजदूरी करने जा पाते हैं, जिस दिन लगातार होने वाले भयानक शारीरिक दर्द से उन्हें कुछ देर छुटकारा मिल पाता है। वे न ठीक से खा पाते हैं, न बोल पाते हैं। उनकी भतीजियां उनका एकमात्र सहारा हैं, जो उनकी देखभाल करती हैं। गांव में तो उन्हें कोई गणेश नहीं मानता, मगर वे बाहर जाते हैं तो लोग उनकी पूजा करते हैं। लेकिन इस पूजा से उन्हें खुशी नहीं मिलती, गुस्सा आता है, क्योंकि वे जानते हैं कि वे भगवान नहीं हैं। होते तो इतना दर्द झेल कर किसी तरह रोजी-रोटी कमाने को मजबूर क्यों होते? मधुबनी के बाईस साल के ललितराम का जरूर दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में आॅपरेशन हुआ, क्योंकि उनका मामला किसी विदेशी टीवी चैनल पर आ गया। अब उनकी शादी भी हो चुकी है।

लेकिन लोग जिसे दैवीय चमत्कार मानते हैं, वह गूगल प्रदत्त ज्ञान के अनुसार न्यूरो फिब्रोमेटोसिस नामक बीमारी है जिसमें शरीर के अंग उम्र बढ़ने के साथ अनियंत्रित ढंग से बढ़ते चले जाते हैं। इसे कुपोषण और पर्यावरण प्रदूषण का नतीजा भी माना जाता है और ‘गणेश पत्नी’ के मामले में डॉक्टर यही कह रहे हैं। इसी साल नार्वे से भी खबर आई थी कि वहां भी एक ‘सूंड़’ वाला बच्चा हुआ है तो बहुत सारे पढ़े-लिखे हिंदू वहां पहुंच गए इस ‘गणेशावतार’ का दर्शन करने। इससे वह परिवार बहुत परेशान हुआ। लेकिन वह इस विकलांग बच्चे को अपने पास रखना नहीं चाहता था। हिंदुओं का ‘गणेश प्रेम’ देखते हुए उसके पास एक विकल्प यह भी था कि उसे भारत में बेच दिया जाए।

बहरहाल, एक ऐसे समाज में जहां धार्मिक पाखंड सिर चढ़ कर नहीं बोलता है, वहां लोग गरीब की इस बच्ची की मदद करने आते, उसका आॅपरेशन करवाते। लेकिन यहां तो लोग पूजा करने आ रहे हैं, ताकि लड़की इस अभिशाप के साथ जिए और इनकी जब जहां इच्छा हो, उतनी पूजा करके मुक्ति पा लें। इन्हें बच्ची के भविष्य से नहीं, अपनी तथाकथित आस्था और आशीर्वाद से लेना-देना है। धर्म की आड़ में यह कितनी बड़ी त्रासद विडंबना और अमानवीयता है, गरीबी का कितना भद्दा मजाक है!

 

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