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संवाद बनाम रस्म अदायगी

जाबिर हुसेन कभी मैंने अपनी तहरीरों में लोक-शासन के लिए एक वैकल्पिक या समांतर शब्द ‘संवाद’ का इस्तेमाल किया था। यही शब्द आगे चल कर बिहार विधान परिषद की समाचार-विचार बुलेटिन का नाम पड़ गया। ‘संवाद’ यानी संपर्क का माध्यम और विचारों का आदान-प्रदान। दूसरे शब्दों में, संवाद यानी लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव, इसकी बुनियाद! […]
Author April 27, 2015 12:43 pm

जाबिर हुसेन

कभी मैंने अपनी तहरीरों में लोक-शासन के लिए एक वैकल्पिक या समांतर शब्द ‘संवाद’ का इस्तेमाल किया था। यही शब्द आगे चल कर बिहार विधान परिषद की समाचार-विचार बुलेटिन का नाम पड़ गया। ‘संवाद’ यानी संपर्क का माध्यम और विचारों का आदान-प्रदान।

दूसरे शब्दों में, संवाद यानी लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव, इसकी बुनियाद! लेकिन बदले हुए माहौल में आज मैं लोकतंत्र की शासन-व्यवस्था के लिए एक नए शब्द ‘रस्म-अदायगी’ का इस्तेमाल करना चाहता हूं। ‘रस्म-अदायगी’ यानी रूढ़ियों पर आधारित, निर्जीव और यांत्रिक व्यवहारों पर टिकी शासन-व्यवस्था! यही तो है वह सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य, जिसे हम व्यवहार में लोक-शासन के नाम से जानते हैं!

लोक-शासन अगर ‘रस्म-अदायगी’ है, तो फिर संसद और राज्यों की धारा-सभाएं क्या कहलाएंगी! रस्म-अदायगी का माध्यम, यही न? सचमुच, क्या हमारी संसद और हमारी धारा-सभाएं ‘रस्म-अदायगी’ का सतही माध्यम बनती जा रही हैं? जनता भी संसद और धारा-सभाओं को किस ऐनक (चश्मे) से देखना चाहती है, जरा सोचें तो!

सदन में जनता के सवाल उठते हैं, बहसें होती हैं, तर्क-वितर्क होता है, शोर-शराबा होता है। सदस्य सदन के वेल में आते हैं, अपना आक्रोश जाहिर करते हैं, अपनी असहमति जताते हैं। सदन की कार्यवाही में बाधा डालते हैं, पीठासीन अधिकारियों से नियमन की मांग करते हैं।

सरकार को अपने आग्रहों की रोशनी में मोड़ने की कोशिश करते हैं। कोई नतीजा नहीं निकलने की स्थिति में सदस्य सदन की कार्यवाही का त्याग करते हैं और प्रतिकार-स्वरूप सदन से बाहर चले जाते हैं। पीठासीन अधिकारी सदन की बैठक की अगली तारीख और समय से सदस्यों को अवगत कराते हैं। और सदन की कार्यवाही स्थगित हो जाती है।

जिस समय-बिंदु पर सदन की कार्यवाही स्थगित होती है, वही समय-बिंदु दरअसल लोक-शासन की ‘रस्म-अदायगी’ की घड़ी है। उसी क्षण एक दिन की ‘रस्म-अदायगी’ का अभ्यास पूरा हो जाता है। इस प्रकार, सदन की उस एक दिन की चर्चा इतिहास का हिस्सा बन जाती है। दशकों बाद किसी सिरफिरे दिमाग के आदमी को उस एक दिन की चर्चा की तफसील जानने की जरूरत महसूस होगी तो वह इतिहास में गहरे उतरेगा और उस एक दिन की चर्चा से रूबरू होगा। तक तक उस चर्चा पर मनों मिट्टी पड़ी रहेगी।

लेकिन मैं आपको अभी, इस बिंदु पर उस एक दिन की चर्चा से परिचित नहीं कराऊंगा। अखबार भी लोक-शासन के चौथे खंभे की भूमिका में जनता के सवालों को उठाते हैं, उन्हें अपनी लेखनी का वैचारिक और सूचनात्मक आधार बनाते हैं। वे ऐसा क्यों करते हैं? इसीलिए न कि वे भी लोक-शासन का अंग हैं और लोक-शासन के अंग के तौर पर उनकी भी समाज और जनता के प्रति जिम्मेदारियां होती हैं।

कोई ऐसा दिन बताएं जब अखबार के स्तंभों में सामान्य जन के अधिकारों के साथ छेड़छाड़ की कोई खबर किसी न किसी रूप में छपी हुई नहीं मिलती हो! सरकारों पर यानी किसी भी दल की सरकार पर, हर रोज यह इल्जाम लगता है कि जनसंहारों और दंगे-फसाद में मारे जाने या अपाहिज होने वाले परिवारों की सुध नहीं ली जाती, उन्हें उनकी बदहाली के आलम में जीने-मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। बोलिए, ऐसा होता है न!

अखबारों में यह खबर भी छपती है कि दंगे-फसाद के शिकार परिवारों को सरकार की तरफ से समुचित मुआवजा नहीं दिया जाता, उनके बदनसीब, अनाथ आश्रितों या रिश्तेदारों को सरकारी नौकरियां नहीं दी जातीं, उनके साथ भेदभाव का सलूक होता है, उनके प्रति मानवीय बर्ताव नहीं होता। उन्हें सिसक-सिसक कर बेमौत मरने पर मजबूर कर दिया जाता है। ये सब होता है, आप जानते हैं न!

अखबार ये सारे काम लोक-शासन के चौथे खंभे के रूप में करते हैं, उनका दायित्व भी है ऐसा करना। मैं कौन हूं कहने वाला कि अखबार लोक-शासन का चौथा खंभा होने के नाते ‘रस्म-अदायगी’ के तौर पर ही ये सारे काम अंजाम देते हैं! मैं ऐसा कहने की हिम्मत कैसे कर सकता हूं! हां, संसद के बारे में और राज्यों की धारा-सभाओं के बारे में जरूर मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ यह बात कह सकता हूं, कह भी रहा हूं।

लोक-शासन की ‘रस्म-अदायगी’ ने अपने समाज में जो हालात पैदा किए हैं, उनमें संसद को और राज्यों की धारा-सभाओं को बेअसर और बेमानी बनने से रोक पाना मुश्किल होता जा रहा है। जो तत्त्व लोक-शासन की विभिन्न संस्थाओं को अपने संकुचित हितों की रक्षा का माध्यम भर मानते हैं, उनके लिए सदन का बेमानी और बेअसर होते जाना कोई खतरे की बात नहीं है। जब ये संस्थाएं अपनी सार्वजनिक उपयोगिता की दृष्टि से अत्यंत कमजोर हो जाएंगी, तो ये तत्त्व शासन के कुछ नए आयाम तलाश लेंगे।

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