jansaata duniya mere aage about happiness of moon night - Jansatta
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चांद रात की खुशी

कॉलोनी की सड़कों पर न बारिश का मजा, न खेलकूद की जगह। चारों तरफ बाजार ही बाजार है। गाड़ियों और लोगों का अंबार है। घर पर घर कि आसमान भी ठीक से नहीं दिखता।

Author June 8, 2017 5:35 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

 मेहजबीं   

जिंदगी के पैंतीस साल कैसे गुजर गए दिल्ली को साल दर साल बदलते देखते, पता भी नहीं चला। पहले भीड़ भरी सड़कों पर बसें, फिर लो-फ्लोर, फ्लाइओवर, मेट्रो, छोटी-छोटी दुकानों के बरक्स मॉल को खड़े होते देखा। बड़े-बड़े आंगन वाले आम, अमरूद, जामुन, मेहंदी, नीम, पीपल, गुलाब, गेंदा के फूलों से भरे घरों को छोटे दड़बेनुमा घरों में बदलते हुए। आज सड़कों पर इतनी भीड़ और जाम है कि घर से निकलते हुए मन कांप जाता है। याद है, बचपन में हम सड़कों पर साइकिल चलाया करते थे। कभी साइकिल के पुराने टायर को छोटे डंडे से मार कर चलाते थे, तो कभी छुपम-छुपाई, खो-खो, चिब्बो, कोकला छुपक, जुमेरात आई रे जैसे खेल खेलते थे। बरसात के दिनों में छम-छम पानी में कूदा करते थे, सड़क पानी से भर कर चलती थी और हम उसमें कागज की नाव चलाते थे। मुझे बारिश में भीगने से जुकाम हो जाता है, फिर भी छिप कर बारिश के पानी में उछल कूद लेती थी। उसके बाद अब्बा से पिटाई।

अब ऐसा कुछ बाकी नहीं रहा। कॉलोनी की सड़कों पर न बारिश का मजा, न खेलकूद की जगह। चारों तरफ बाजार ही बाजार है। गाड़ियों और लोगों का अंबार है। घर पर घर कि आसमान भी ठीक से नहीं दिखता। पतंग उड़ाना हो तब या फिर कपड़ा सुखाने, बारिश का थोड़ा-बहुत मजा लेने, बिजली चली जाए या चांद रातों में चांद देखने… किसी भी ऐसे काम के लिए सीधे पांचवीं मंजिल की छत पर ही जाओ। बड़ी-बड़ी फ्लैट वाली इमारतें तो और भी ऊंची-ऊंची हैं। अब खो गए वे प्यारे-प्यारे दिन… चला गया बचपन। मगर माजी की यादें हमेशा तरोताजा रहती हैं। आज भी याद हैं अपनी कॉलोनी के कट चुके दरख्त, बड़े-बड़े आंगन वाले घर।आजकल चांद रात के दिनों में रोजे जारी हैं। दुकानों पर सेवइयों के टोकरे सजे हैं। सजा होगा सारा ओखला, जाफराबाद,, मुस्तफाबाद, नबीकरीम, रंजीत नगर, ख्याला, इंद्रलोक, पुरानी दिल्ली और जामा मस्जिद का बाजार। जब हम छोटे थे तो अम्मी छत पर मशीन से मैदे की सेवइयां बनाती थीं। हाथ से तगारी में मैदा गूंद कर, छोटे-छोटे पेड़ों को खाट में बंधी मशीन में डाल कर उसकी हत्थी को घुमाने से नीचे लंबी-लंबी लच्छेदार सेवइयां निकलती थीं। मैं और भाई उन्हें रस्सी और चटाई पर रखते थे सूखने के लिए।

सूखने के बाद अम्मी उन्हें बड़ी कढ़ाई में भूनती थीं तो उनमें से भीनी-भीनी प्यारी-सी खूशबू आती थी। यही सेवइयां अम्मी सहरी के लिए तैयार करती थीं और अब्बा चांद रात के दिन बाजार से काले चने और रूहअफजा, पकौड़ियों का सामान लाते थे। फिर हम सब असर के आखिरी वक्त में मगरिब में छत पर चांद देखने जाते थे। तब ज्यादातर मकान एक मंजिला ही होते थे और पहली मंजिल पर जाकर ही चांद आसानी से दिखाई दे जाता था। कितनी खुशी होती थी चांद को देखने के बाद! फिर सुबह सहरी की तैयारी शुरू हो जाती थी। अब्बा दूध लेने जाते और डेरी वाले शर्मा अंकल से कहते कल से बच्चों को थोड़ा ज्यादा दूध दीजिएगा सहरी के वास्ते। अंकल कहते- ‘चांद दिखाई दे गया हाफिज साहब, रमजान मुबारक हो।’ अब इन ऊंची-ऊंची इमारतों की छतों पर जाकर चांद देखने की किसमें हिम्मत है और किसे फुर्सत है! दिल्ली में अब घरों से आसमान नहीं दिखता। चांद-सूरज या सितारे नहीं दिखते। पहले गरमियों में छतों पर सोते थे चांद को देखते-देखते और सितारों को गिनते-गिनते। अब तो चांद दिखने की खबर सुनते हैं टीवी-रेडियो पर। टीवी चैनल वाले वेलेंटाइन डे, किस डे, रोज डे, चॉकलेट डे, स्लेप डे वगैरह की खबरें जोर-शोर से दिखाते हैं। लेकिन अपने त्योहार उनके लिए कुछ नहीं। कई बार हाशिये के बाहर होने के तकलीफ भरे अहसास से गुजरना पड़ता है। कितना कुछ बदल गया इस आधुनिक बाजारी युग में कि अब कोई किसी को चांद दिखने की मुबारकबाद भी नहीं देता। वाट्सऐप या फेसबुक पर सारी खानापूर्ति अदा कर दी जाती है।

हम भी अब उम्र के उस दौर में हैं जब चांद दिखने की खुशी तो होती है, मगर वह बात नहीं। जो बचपन में थी, वह खुशी तो कुछ और ही थी। कोई जिम्मेदारी सिर पर न थी, न अफतारी, न सहरी के इंतजाम की फिक्र, न सदका-जकात अदा करने का खयाल। अब अम्मी भी इस दुनिया से नहीं ले गर्इं अपने साथ चांद रात या ईद-बकरीद की खुशी। ससुराल में अब जैसे ही रोजे का चांद दिखने की खबर कानों में पड़ती है तो साथ में खर्च की फिक्र सताने लगती है। हिसाब-किताब गड़बड़ाने लगता है। देखती हूं सदका-जकात की मुंतजिर उन आंखों को, गरीब-गुरबा आंखों को, जो साल भर इंतजार करती हैं सदका-जकात की इमदाद का। मेहरूमियों में सब्र में ही उनका सारा रमजान बीत जाएगा। चांद रात का उनके लिए यही सौगात है।

 

 

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