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दुनिया मेरे आगेः जादुई दुनिया का दरवाजा

डॉ आंबेडकर के निजी पुस्तकालय ‘राजगृह’ में पचास हजार से भी ज्यादा पुस्तकें थीं। लेखक, इतिहासकार और अध्येता पुस्तकालयों और अभिलेखागारों की खाक छानते हैं कि उन्हें सफेद-ओ-सियाह में कोई ऐसा संदर्भ मिल सके, जिससे वे भी अपनी किताब लिख सकें।

एक अनुमान के मुताबिक ई-किताबों की खरीदारी में तीन-सौ प्रतिशत कि वृद्धि हुई।

आतिफ रब्बानी

इससे कौन इनकार करेगा कि किताबें एक अनूठी दुनिया में प्रवेश करने का दरवाजा हैं। जब दरवाजा खुलता है, तो वह हमको मंत्रमुग्ध और चकित कर देता है। उसमें दाखिल होते एक नई दुनिया सामने होती है। किताबें पढ़ना एक जीवन-यात्रा पर निकलने जैसा है। किताबों के जरिए हम सभ्यता, संस्कृति और समाज के बारे में सीखते हैं। इतिहास और अतीत की घटनाओं से रू-ब-रू होते हैं। निकट भविष्य में होने वाले बदलावों और परिवर्तनों की दस्तक महसूस कर सकते हैं। मतलब यह कि किताबें ही हम को जीवन, दुनिया और कायनात की सच्चाई से परिचित कराती हैं।

हालांकि यह कहना कोई नई बात नहीं होगी कि किताबें ज्ञान का दरवाजा हैं और हमारी सच्ची साथी भी। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ निबंध लेखक फ्रांसिस बेकन ने अपने निबंध ‘ऑफ द स्टडीज’ में कहा है- ‘संसार में लगभग सब कुछ पराया ही है। रिश्ते-नाते तो बनते और बिगड़ते हैं- ये क्षणिक हैं। अगर इंसान का कोई सबसे बड़ा साथी है तो वे किताबें ही हैं’। दुनिया को बदलने का सपना देखने वालों का पहला प्यार किताबें ही होती हैं। कार्ल मार्क्स ने जीवन का अच्छा-खासा समय लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय और मैनचेस्टर के पुस्तकालयों में अध्ययन और लेखन में बिताया। अमेरिका के कोलम्बिया विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में सबसे ज्यादा पुस्तकों को पढ़ने वालों की फेहरिस्त में बाबा साहब भीमराव आंबेडकर का नाम आज भी दर्ज है।

डॉ आंबेडकर के निजी पुस्तकालय ‘राजगृह’ में पचास हजार से भी ज्यादा पुस्तकें थीं। लेखक, इतिहासकार और अध्येता पुस्तकालयों और अभिलेखागारों की खाक छानते हैं कि उन्हें सफेद-ओ-सियाह में कोई ऐसा संदर्भ मिल सके, जिससे वे भी अपनी किताब लिख सकें। किताबों की ओर तय किया गया सफर किताबों तक जा सकता है- दीप से दीप रोशन होते हैं। जो चीजें किताब का हिस्सा बन जाती हैं वे सदियों के लिए अमर हो जाती हैं। अतीत में उपलब्ध तमाम ज्ञान से हम इसलिए हाथ धो बैठे कि उन्हें कागज पर नहीं उतारा जा सका था।

कबीरदास ने कहा है- ‘मैं कहता आंखन की देखी, तू कहता कागद की लेखी’। सच्ची बात तो यह है कि अगर कबीर के दोहे और काव्य कागज पर न लिखे जाते तो शायद बहुत लंबे समय बाद ये सारी चीजें सामूहिक स्मृति में धुंधली पड़ सकती थीं। आखिरकार इनका वजूद भी समाप्त हो सकता था। महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक ‘सत्य के साथ प्रयोग’ में इस बात का जिक्र किया है कि कैसे जॉन रस्किन की पुस्तक ‘अंटु दिस लास्ट’ ने उनके जीवन को प्रभावित किया।

किताबें हमको प्रेरणा भी देती हैं और कभी-कभी उदास भी कर देती हैं। दुखांत कहानियां पढ़ कर मन करुणा से भर जाता है। ये हमको रुला सकती हैं, मायूसी के समुद्र में गोते लगवा सकती हैं और मायूसी के काले बादलों को हटा कर उम्मीदों की चमकीली किरणें भी बिखेर सकती हैं। किताब हमको सुला भी सकती है और मीठे सपने भी दिखा सकती है। हमको साहित्यकार से सूफी, वैज्ञानिक से दार्शनिक भी बना सकती है। हमारी कोमल भावनाओं की तजुर्मानी कर सकती है। हमारी अनुभूतियों को शब्दों के लिबास में रचा-बसा सकती हैं। आपकी छिपी हुई प्रतिभा को निखार भी सकती है। पिछले दिनों महामारी से बचने के लिए लागू हुए पूर्णबंदी के दौरान एक अच्छी बात यह सामने आई कि जो लोग अपनी व्यस्तताओं या अन्य कारणों से किताबें नहीं पढ़ पाते थे, उन्होंने फिर से किताबों से नाता जोड़ा। चूंकि किताबों की दुकान और अन्य प्रतिष्ठान बंद थे, इसलिए ई-बुक्स यानी इंटरनेट पर मौजूद किताबें काफी पढ़ी गईं।

एक अनुमान के मुताबिक ई-किताबों की खरीदारी में तीन-सौ प्रतिशत कि वृद्धि हुई। लेकिन जो मजा और अनुभूति किताबों के पढ़ने में है, वैसी ई-बुक्स में कहां! किताब की खुशबू को हम सूंघ सकते है, छूकर महसूस कर सकते हैं और देख कर पुलकित हो सकते हैं। पढ़ने के दौरान ऐसा लगता है कि पन्नों पर दर्ज इबारतें हमारे जेहन पर भी नक्श हो रही हैं। वहीं ई-किताबों से पढ़ने पर ऐसा लगता है मानो कोई अस्थायी काम किया जा रहा हो। ई-बुक पर पढ़ी हुई चीजें स्मृति में उतनी देर नहीं ठहरतीं। किताबों के बारे में सफदर हाशमी की एक प्रसिद्ध कविता की पंक्तियां है- ‘हर इक इल्म की इनमें भरमार है/ किताबों का अपना ही संसार है/ क्या तुम इसमें जाना नहीं चाहोगे/ जो इनमें है, पाना नहीं चाहोगे/ किताबें कुछ तो कहना चाहती हैं/ तुम्हारे पास रहना चाहती हैं’!

हालांकि हम डिजिटल युग में जी रहे हैं और अगर हमें कोई किताब खरीदनी है तो वे एक क्लिक पर आपके कंप्यूटर स्क्रीन, मोबाइल या किंडल पर मौजूद हैं। लेकिन इनडोर पुस्तकालयों के महत्त्व को अभी भी नकारा नहीं जा सकता है। अगर संभव हो तो इन पुस्तकालयों में दिन का कम से कम एक घंटा व्यतीत करें। अलमारियों में बंद किताबों से नाता जोड़ें। हो सके तो अपने घर में पुस्तकों के लिए एक कोना सुरक्षित करें। उन लोगों के साथ उठना-बैठना शुरू करें, जो पुस्तकों से रिश्ता रखते हैं। जिस दिन आप जीवन भर के लिए पुस्तक से जुड़ेंगे, वह दिन आपके व्यक्तित्व में सकारात्मक बदलाव का दिन होगा। आप जीवन को सुंदर बना पाएंगे, आपकी सोच आकाश की तरह बुलंद; धरती की विस्तृत और महासागरों की तरह गहरी हो जाएगी और आप किताबों की जादुई दुनिया का हिस्सा बन जाएंगे।

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