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दुनिया मेरे आगे: बाजार की नई चमक

खरीदारी एक बड़ा ‘कैथारसिस’ होता है और यह अवसाद से भी मुक्त करता है। आज जब घरों में एकल परिवारों में संवाद की स्थिति टूट रही है, साथ बैठने, खाने-पीने, खुशी मनाने के मौके कम होते जा रहे हैं तो सबकी अपनी अलग-अलग दुनिया बन गई है।

Author Updated: December 9, 2020 5:26 AM
centerबाजार में खरीदारी करते लोग। फाइल फोटो।

कमल कुमार

राजधानी दिल्ली में मेरे घर से निकल कर सिर्फ एक चौराहा पार करने में पंद्रह से पच्चीस मिनट लग जाते हैं। कारण और भी होंगे, लेकिन इसका मुख्य कारण है साकेत परिसर में स्थित एक मॉल। मॉल में जाना लोगों के लिए अलग कारणों से निहायत जरूरी है। यह जरूरत और शौक के अलावा बाहर से दिल्ली आने वालों के लिए देखने की भी जगह होती है। निजी तौर पर अपने बारे में कहूं तो मुझे मॉल जाना अच्छा नहीं लगता। इसके अपने कारण हैं। पर बच्चों के साथ जिद नहीं करती और चली जाती हूं। वहां बैठ कर आते-जाते, घूमते-फिरते लोगों की भाव भंगिमाएं देखती हूं और आनंद उठाती हूं।

जो लोग वहां जाते हैं, वे खरीदारी भी करते हैं। वहां ज्यादातर सामान ब्रांडेड यानी नामी कंपनियों के होते हैं और इस कारण उनकी कीमतें भी सामान्य से ज्यादा होती हैं। कुछ समय पहले कई तो उस दिन मेरे साथ मेरी बेटी थी। उसने एक लंबी स्कर्ट पहन रखी थी। दो लड़कियों ने उसकी तरफ देखा और रुक गईं। एक ने पूछा कि आपने यह स्कर्ट ‘जारा’ से ली है? उस पर कीमत छह हजार लिखा है। आपने क्या सेल में ली थी? बेटी ने हंस कर कहा था कि नहीं, सरोजिनी नगर से ली है, चार सौ रुपए में। उसने उन्हें दुकान का पता भी बताया था। सरोजिनी नगर बाजार को चीन के शंघाई जैसा ‘मार्केट’ भी माना जाता है, जहां हर ब्रांडेड वस्तु सही कीमत पर उपलब्ध है।

मुझे वहां लोगों के चेहरे पढ़ना बहुत अच्छा लगता है। कुछ जो पहली बार, विशेष रूप से मॉल में आते हैं, उनके भाव हैरानी मिश्रित खुशी के होते हैं। जो हमेशा आते हैं, उनके चेहरे पर एक बेपरवाही होती है। खरीदारी करने वालों की एक अलग दुनिया है। बड़े-बड़े बैग लिए सामान खरीद कर जाते हुए उनके चेहरों पर उल्लास होता है। पर वे जो खरीदते हैं, क्या उसकी जरूरत उन्हें होती है? आज यह सवाल नहीं रहा। खरीदारी जरूरत के लिए नहीं भी की जाती है। मुझे कई महिलाओं ने बताया कि कई बार तो याद भी नहीं रहता कि जो पिछली बार खरीदा था, वह क्या था! घर लाया जाता है, अलमारियों में पड़ा रहता है और कई बार लाकर भूल भी जाते हैं। यह आज की नई संस्कृति है ‘खरीदो और किनारे करो’… पहले के ‘इस्तेमाल करो और फेंको’ के आगे की।

एक बार इस पर बहस हुई थी। जिसका निष्कर्ष यह था कि खरीदारी एक बड़ा ‘कैथारसिस’ होता है और यह अवसाद से भी मुक्त करता है। आज जब घरों में एकल परिवारों में संवाद की स्थिति टूट रही है, साथ बैठने, खाने-पीने, खुशी मनाने के मौके कम होते जा रहे हैं तो सबकी अपनी अलग-अलग दुनिया बन गई है। इस दुनिया में अकेलापन है, अवसाद है, निराशा का अंधेरा है। इसका निराकरण सब अपनी तरह से करते हैं। इसलिए खरीदारी करना, मॉल जाना उन्हें कुछ समय के लिए एक दूसरी जगमगाती दुनिया में ले आता है। फिर वे बार-बार यहां आना चाहते हैं। अपने भीतर के अंधेरे से निपटने के लिए।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखती हूं तो ऐसे लोगों के चेहरे पर ‘हीन भाव’ या ‘श्रेष्ठ भाव’ होते हैं। यहां आना अपने को दूसरे से श्रेष्ठ समझना है। उससे भीतर एक उत्साह जगता है। हीनभाव से मुक्त होने के लिए, अपने का कमतर न माने जाने के लिए उन्हें भी वही करना होता है जो दूसरे सब कर रहे है और ‘ऊंचे’ दिख रहे हैं। मुझे वहां एक कप कॉफी के दो सौ रुपए देना भी बहुत अच्छा नहीं लगता। मेरी मित्र ने कहा था- ‘तुम कंजूस हो।’ मैंने कहा था- ‘नहीं कंजूस वह होता है जो अपने को जरूरतों से वंचित रखता है। पर जो दूसरों के पीछे लगता है, वही करता है जो दूसरे कर रहे हैं, बिना जाने समझे कि उसे खुद को क्या चाहिए और क्यों चाहिए! ऐसे व्यक्ति एक तरह से भ्रमित होते हैं।’

युवा पीढ़ी के लिए यहां आना, घूमना, समय गुजारना एक नशा है। उन्हें आना ही होता है। कभी दोस्तों के साथ कभी वैसे ही। नहीं आएं तो लगता है कुछ जरूरी छूट गया है। यह मॉल संस्कृति है। बड़ी-बड़ी ब्रांडेड दुकानें हैं, अंतरराष्ट्रीय शृंखला के कॉफी हाऊस हैं, रेस्तरां हैं, सुपर स्टोर है। गृहिणियां यहां घर की खरीदारी करती हैं, घूमती हैं, कॉफी पीती हैं और खुश होकर लौट आती हैं। सबके लिए कुछ न कुछ तो है ही। मैंने इधर-उधर घूम कर जाना था कि मॉल के बाहर भी कुछ रेस्तरां हैं, जहां आसानी से बैठकर सामान्य दाम पर कॉफी, चाय-नाश्ता किया जा सकता है। वहां भी देखा भीड़ थी।

उस भीड़ में मुझे छात्र-छात्राएं अधिक दिख रहे थे। आगे जाकर देखा, एक खुला बाजार भी था, जहां कई तरह के सामान थे। कपड़े, जूते-चप्पलें, घरेलू वस्तुएं और साज-सज्जा की चीजें भी। वहां पर भी भीड़ थी। कीमतें सामान्य से कुछ ज्यादा थीं, पर अंदर की तरह बेतहाशा नहीं। खरीदारी करने वालों में उल्लास था। आखिर आए तो मॉल ही हैं न! कोई विशेष दिन हो, क्रिसमस, दीपावली या तीज-त्योहार, ऐसे दिनों में भी कुछ लोग यहां आना पसंद करते हैं। यह आज के जीवन की नई शैली है। यहां अच्छे-बुरे का प्रश्न नहीं है। बदले समय में विकसित जीवन जीने का एक अपना तरीका है।

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