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दुनिया मेरे आगे: बांटने का सुख

यह चिंतन करने का समय तो है ही कि हम ये कैसी कुसंगति में फंस गए कि दैनिक जीवन से रस और रंग गायब ही हैं। एक बार कुछ ऐसा हुआ कि लाल बत्ती पर गाड़ी रुकी और सामने ही रंग-बिरंगे गुब्बारे देख कर एक बच्चा गाड़ी के भीतर मचलने लगा। मां ने तीन-चार गुब्बारे खरीद लिए। तभी एक किशोर की आवाज भी आई- ‘रूमाल खरीद लीजिए, गुब्बारे की कीमत में दे दूंगा।’ मगर जरूरत नहीं थी महिला ने मना कर दिया।

Author Updated: November 25, 2020 4:12 AM
Raceप्रतिस्‍पर्धा के दौर में लोग एकांतवास को मजबूर। फाइल फोटो।

पूनम पांडे

आज हवा कुछ ऐसी हो चली है कि कहीं किसी में दया और करुणा की छवि भर भी दिख जाए तो उसे देख कर हम चकित रह जाते हैं, दुविधा में पड़ जाते हैं या संदेह करने लगते हैं कि आखिर क्यों और किसलिए यह इंसान दयालु है! लालच, लोभ और स्वार्थ से भरे इस समय में यह अनिवार्य होने लगा है कि हम सबका का जीवन मानवीयता, सहयोग और सहृदयता की अनूठी बगिया जैसा महक जाए। सादगी से भरे व्यक्ति खोजने पर मिल जाएं तो उनकी संगति का लाभ जरूर लेना चाहिए। वह अपने संपर्क में आने वाले लोगों को अपने जैसा बना देता है। नीति भी कहती है कि बुरी आदतों वाले से नहीं, बल्कि मानवीय भाव वालों से ही मित्रता करनी चाहिए।

जरा कल्पना कीजिए कि हम सभी जमाने के मतलबी स्वभाव के साथ चलने लगें तो हम सब आखिर क्या करेंगे! जाहिर है कि बस अपना-अपना राग अलापेंगे और किसी की मदद के नाम से भी जी चुराएंगे। धूर्त लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए शहद से मीठी भाषा और चापलूसी का इस्तेमाल करते हैं, यानी चेहरे पर एक नकाब पहन लेते है। अब तो यह सब और भी सरल हो गया है। आभासी दुनिया में जाकर कुछ भी अनर्गल कहा जाए और बस येन-केन-प्रकारेण अपना मतलब साध लिया जाए।

यह एक वास्तविकता है कि हर इंसान कहीं न कहीं तनाव में घिरा हुआ बेचैनी में जी रहा है। आधुनिकता और तकनीक का यह मकड़जाल है ही ऐसा कि जो इसमें अटका वह इंसानियत से भटका। यह माहौल की मजबूरी हो गई है कि हम सब ऐसी दिनचर्या को अपना बना चुके हैं, जहां अपने सिवा किसी के बारे में कभी सोच नहीं पाते या फिर सोचने का मन ही नहीं करता। बड़ी-बड़ी कॉलोनियों अच्छी सुख-सुविधाओं के बीच रह कर भी जाने क्यों, हमें चैन और आनंद की नींद नहीं आ पाती और अजीब-सी जद्दोजहद में समा चुके हम उस नींद को बुलाते हैं, खोजते हैं, करवट बदल कर उसका अता-पता ढूंढ़ते हैं।

यह चिंतन करने का समय तो है ही कि हम ये कैसी कुसंगति में फंस गए कि दैनिक जीवन से रस और रंग गायब ही हैं। एक बार कुछ ऐसा हुआ कि लाल बत्ती पर गाड़ी रुकी और सामने ही रंग-बिरंगे गुब्बारे देख कर एक बच्चा गाड़ी के भीतर मचलने लगा। मां ने तीन-चार गुब्बारे खरीद लिए। तभी एक किशोर की आवाज भी आई- ‘रूमाल खरीद लीजिए, गुब्बारे की कीमत में दे दूंगा।’ मगर जरूरत नहीं थी महिला ने मना कर दिया। गुब्बारे वाले ने अभी-अभी कमाए सारे रुपयों से उसके तीन रूमाल खरीद लिए। वह महिला उस साधारण व्यक्ति में यह दया, करुणा, आत्मीयता देख कर चकित रह गई। फिर उसने दोबारा दोनों को बुलाया कुछ रूमाल और दो और गुब्बारे खरीद लिए। कहते हैं कि बांटने का स्वभाव प्रकृति की उदारता का प्रतीक है। इसे अपना कर्म मान लेने से हृदय पवित्र होता है, मेधा बढ़ती है मस्तिष्क प्रफुल्लित होता है।

एक अच्छी संगति का एक और दृष्टांत मुझे याद है। एक महिला गरमागरम भुट्टे लेने एक ठेले पर पहुंची। वहां एक किशोरी भट्टी पर बैठ कर ताजे गरम भुट्टों के साथ ग्राहक की प्रतीक्षा कर रही थी।महिला ने एक भुट्टा हाथ से छूकर देखा तो महसूस किया कि वे भुट्टे जरा सख्त थे। महिला के दांत इतने भी मजबूत नहीं थे। वहां चार कदम की दूरी पर एक और किशोरी ताजे भुट्टे सेंक रही थी। जब वह महिला बोली कि ‘ये कठोर दाने हैं। यह मेरे काम के नहीं हैं। जरा कोमल दाने वाले दिलाओ’, तो इस पर वह लड़की मौन खड़ी रही। इतने में ही दूसरी किशोरी वहां आ गई। उसने फुर्ती से अपने ठेले से कोमल और सिंके हुए भुट्टे छांट कर दे दिए। महिला ने सोचा कि पैसे किसे देने हैं!

इस पर विचार करते हुए महिला ने पर्स में हाथ डाला। उन्हें लगा कि अब इन दोनों किशोरियों में पैसों के लिए झगड़ा होगा। फिर उन्होंने सोचा, जिससे कोमल भुट्टा खरीदा है, उसे ही पैसे चुका देती हूं। इसलिए उन्होंने बाद में आने वाली किशोरी को पैसे दे दिए। उसने पैसे तो लिए, लेकिन वे पैसे उसने पहले वाली किशोरी की हथेली पर रख दिए। फिर प्रेम से उसकी पीठ थपथपायी और अपने ठेले की ओर चल पड़ी।

वह महिला विस्मित नेत्रों से यह देखती रही। उसने दूसरी लड़की को तुरंत वापस बुलाया और पूछा- ‘यह क्या चक्कर है?’ लड़की बोली- ‘जी! यह लड़की तीन महीने पहले सीढ़ियों से गिर गई थी। तब इसके हाथ-पैर में बहुत चोटें आई थीं। किसी तरह यह बच गई, नहीं तो इसकी वृद्धा मां और पांच बहनों का क्या होता?’ फिर थोड़ा रुक कर वह बोली- ‘यहां गरम भुट्टे, मूंगफली बेचने वालों का हमारा समूह है और हम मिलजुल कर काम करते हैं।’

हम सभी शरीर से भिन्न-भिन्न होते हुए भी, हैं तो एक ही जैसी आत्मा, इसलिए हम सब भी एक ही हैं। उन गरीबों मे आपसी प्रेम, सहयोग, एकता और मानवता की ऐसी ऊंचाई देख कर वह महिला चकित रह गई। उसने फिर हर ठेले पर जाकर वहां से एक-एक भुट्टा और गरम मूंगफली खरीदी और उन सबको वृद्धाआश्रम में जाकर दे आई। वह सोच रही थी कि एक अच्छे व्यक्ति के संपर्क में आने वालों का जीवन मानवीयता, सहयोग और सहृदयता की अनूठी बगिया-सा महक जाता है।

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