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दुनिया मेरे आगे: छवियों के संबंध

माजशास्त्री मकाइवर और चार्ल्स पेज ने समाज को संबंधों के संजाल के रूप में परिभाषित किया है। समूचा जीवन ही संबंधों के दायरे में आता है। इनमें जिस संबंध की खास पड़ताल करने की जरूरत है वह है स्त्री और पुरुष के बीच का संबंध।

Author June 27, 2018 5:01 AM
प्रतीकात्मक चित्र(Photo Source: Representative Image)

समाजशास्त्री मकाइवर और चार्ल्स पेज ने समाज को संबंधों के संजाल के रूप में परिभाषित किया है। समूचा जीवन ही संबंधों के दायरे में आता है। इनमें जिस संबंध की खास पड़ताल करने की जरूरत है वह है स्त्री और पुरुष के बीच का संबंध। यह उन संबधों से थोड़ा अलग है, जिन्हें हम जन्म लेने के साथ ही अपने इर्दगिर्द निर्मित होते देखते हैं। इन्हें हम रक्त-संबंध कहते हैं। स्त्री-पुरुष के बीच के संबंध आमतौर पर एक विशेष तरह की चयनात्मक प्रक्रिया का परिणाम होते हैं, जिसमें नई-पुरानी परंपराएं, सांस्कृतिक आदतें, जिज्ञासा, अकेलापन, दैहिक सुख की कामना, प्रतिस्पर्धा, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक संतोष वगैरह की भूमिका होती है।

मानवीय संबंधों का क्षेत्र विराट है। जन्म के साथ ही हम किसी न किसी के साथ हर क्षण संबंधित होते हैं। एक संबंध टूट सकता है और फिर से कोई दूसरा निर्मित हो सकता है। जिनसे हम अलग होते हैं उनके साथ भी जुड़े रहते हैं। कभी ऐसा भी होता है कि हम मित्रों से ज्यादा शत्रुओं के बारे में सोचते हैं। ग़ालिब ने अपने एक शेर में अपनी माशूका से गुहार लगाई थी कि वह उससे किसी भी कीमत पर रिश्ता न तोड़े और अगर ‘कुछ नहीं है तो अदावत ही सही।’ अदावत का रिश्ता भी एक रिश्ता है।

रक्त संबंधों के अलावा सबसे अधिक दिलचस्प है उन संबंधों को खंगालना जिन्हें हम बाद में अकसर खुद-ब-खुद निर्मित करते हैं। इसमें भी खास हैं वे, जिन्हें हम प्रेम संबंध कहते हैं और जो अकसर स्त्री-पुरुष के बीच विकसित होते हैं। यह मूलत: एक कामना के रूप में जन्म लेता है। उसके साथ जुड़ी हुई सकारात्मक ऊर्जा, उससे जनमे सुख के कारण हम उसे प्रेम कहते हैं, पर चूंकि यह संबंध छवियों पर आधारित होता है, इसलिए अकसर इसमें एक तरह की भ्रामकता होती है। अगर यह किसी छवि पर आधारित नहीं होता, तो विरह या अलगाव और तलाक जैसी कोई घटना संभव ही नहीं होती। संबंधों का टूटना दरअसल छवियों का टूटना होता है जो हम एक-दूसरे के बारे में बनाते हैं।

मनोविज्ञानिक बताते हैं कि संबंधों में प्रत्यक्ष संपर्क होता ही नहीं; यह अकसर छवियों के आधार पर उनके ही बीच होता है। ऐसे में कुछ लोग यह भी कहते हैं कि संबंध में प्रेम होता ही नहीं; क्योंकि प्रेम विभाजन को मिटाता है, जबकि संबंध में अकसर दो लोग शामिल रहते हैं। जहां दो हैं, जहां द्वैत है, वहां प्रेम संभव नहीं, लेकिन सुख-दुख, प्रतीक्षा, क्षोभ, ईर्ष्या, अधिकार जमाने की प्रवृत्तियों का खेल जरूर चलता है और अलग-अलग अनुभवों की इस बड़ी-सी गठरी, विरोधाभासी गलियारों में इधर-उधर भटकने को ही हम अकसर प्रेम कह बैठते हैं। क्या ऐसा ही है?

छवियों पर आधारित इन संबंधों का एक और विचित्र पहलू है। जब किसी गर्म तवे से हमारी अंगुलियां जल जाएं, तो हम अगली बार सावधान रहना सीख लेते हैं। लेकिन जब संबंधों में कोई एक पक्ष दूसरे को आहत करता है तो हम खुद सावधान रहने का फैसला नहीं करते, बल्कि हम दूसरे पक्ष को दोष देते हैं। दोषारोपण का यह क्रम इस तरह लगातार चलता है कि या तो संबंध टूट जाते हैं या फिर उन्हें एक शव की तरह जीवन-भर कंधों पर लादे हुए हम घूमते हैं। यह जानना मुश्किल है कि हमारे संबंध हमें ज्यादा सजग क्यों नहीं बनाते और क्यों हम उन्हें तोड़ने या उनके बारे में शिकायत करने में ज्यादा रुचि रखते हैं।

संबंधों का टूटना अब लोगों को अधिक आश्चर्य में नहीं डालता। इसे एक आम सामाजिक या व्यक्तिगत घटना, आजादी वगैरह का प्रश्न मान कर हम एक ओर रख देते हैं। लेकिन क्या हम इससे कोई सीख ले पाते हैं? क्या हम इनके पीछे बनती-टूटती छवियों की अचेतन और अनवरत शृंखला को देख पाते हैं? क्या हमारे संबंध हमारे लिए एक ऐसा आईना बन पाते हैं, जिसमें हम खुद को, अपनी चेतना की अंतर्वस्तु को भी क्षण-क्षण उद्घाटित होता देख सकें? क्या संबंध एक दूसरे से अपेक्षाएं रखने, उन्हें पूरा करने के प्रयास और उनके अपूरित रहने के दुख के साथ रहने का ही नाम है? क्या बगैर किसी अपेक्षा के भी कोई संबंध हो सकता है? ये दिलचस्प सवाल हैं, पर हम इन्हें पूछने से इसलिए कतराते हैं क्योंकि ये हमें परेशान कर सकते हैं, और संबंधों का इस्तेमाल हम परेशान होने के लिए नहीं, सुकून के लिए, सुख के लिए करते हैं। क्या ये प्रश्न न पूछ कर हम संबंधों की सतह पर ही नहीं रह जाते?

वास्तविक इंसान अपनी छवि से हमेशा भिन्न होगा, छवि एक मृत वस्तु है जिसे हमने अपने सुकून और सुरक्षा के लिए निर्मित किया है। जबकि वास्तविक व्यक्ति लगातार बदलता हुआ एक प्रवाह है- उसकी भावनाएं, इच्छाएं, उसकी पसंद-नापसंद- सब कुछ लगातार बदलता है। एक लगातार बदलते हुए जीवित इंसान और उसके बारे में बनी छवि के बीच हमेशा फर्क बना रहता है और यही संबंधों के टूटने का कारण बनता है।

 

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