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दुनिया मेरे आगे: सुबह की चाय

बनारस में चाय की कई दुकानें सिर्फ रात में ही खुलती हैं। जब बाजार बंद हो जाते हैं तो वे दुकानें खुलती हैं और लोग दुकानों के पटरों पर बैठ कर चाय का आनंद लेते और गपियाते हैं। पर गोदोलिया वाली चाय का मजा कहीं नहीं आता।

चाय की शुरुआत को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं, लेकिन संभवत: इसकी शुरुआत चीन से हुई है।

अमरेंद्र कुमार राय

सुबह थोड़ी ठंड होने लगी है। उठने में जी भी अलसाने लगा है और शरीर लिहाफ में ही दुबके रहना चाहता है। बिस्तर पर चाय की आवश्यकता ज्यादा शिद्दत से महसूस होने लगी है। सुबह की चाय में अब थोड़ी चीनी अच्छी लगने लगी है। तुलसी का पत्ता, अदरख और काली मिर्च चाय को और लाजवाब बना देती है। चाय की बात चलती है तो मुझे बनारस का गोदोलिया जरूर याद आता है। यों गोदोलिया मिश्रांबु नामक प्रसिद्ध पेय के लिए मशहूर है, लेकिन जहां चौराहे पर मिश्रांबु की दुकान होती थी, उसी के सामने तांगा स्टैंड था।

वहीं एक चाय वाला चाय बनाता था। उसकी चाय के लिए लाइन लगी होती थी। उसका चाय का भगोना हमेशा चढ़ा ही रहता था। उसकी चाय का स्वाद ही निराला था। शायद उसमें वह हल्की कॉफी मिलाता था, क्योंकि उसमें कॉफी की सुगंध आती रहती थी। लेकिन बस उसकी सुगंध ही होती थी, होती वह चाय ही थी। कम से कम मुझे वैसी चाय उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत और पूर्व से लेकर पश्चिम भारत तक कहीं भी वैसी चाय नहीं मिली। एक बार गुजरात के पोरबंदर में जरूर अच्छी चाय मिली थी। पुराने इलाके में एक दुकान पर चाय पीते ही गोदोलिया की याद आई। फिर भी गोदोलिया की चाय की बात ही अलग थी।

बनारस में चाय की कई दुकानें सिर्फ रात में ही खुलती हैं। जब बाजार बंद हो जाते हैं तो वे दुकानें खुलती हैं और लोग दुकानों के पटरों पर बैठ कर चाय का आनंद लेते और गपियाते हैं। पर गोदोलिया वाली चाय का मजा कहीं नहीं आता। मैंने चाय पीनी कब शुरू की कुछ याद नहीं। बचपन में कभी-कभार आजी यानी दादी अपने लिए बोरसी (आग जलाने वाला मिट्टी का पात्र) पर चाय बनाती थीं। गुड़ वाली। जिद करने पर कटोरे में थोड़ा दे देतीं। कहते हैं, बूढे लोगों को चाय फायदा करती है। चाय फायदा करती है या नुकसान, इस पर सबकी अलग-अलग धारणा है, पर जिन लोगों ने चाय पीनी शुरू की, वे जरूर मानते हैं कि चाय पीने के कई फायदे हैं। फायदे वाली धारणा चाय की खोज के साथ ही जुड़ी हुई है।

कहा जाता है कि करीब पांच हजार साल पहले चीन में सम्राट शेन नुग्न की बादशाहत थी। वे खुद को स्वस्थ रखने के लिए प्रतिदिन टहलने के बाद अपने उद्यान में बैठ कर खाली पेट गरम पानी पीते थे। एक दिन गिलास में पानी भरा गया, लेकिन वे कुछ लोगों के साथ चर्चा में व्यस्त थे। उसी दौरान पास की झाड़ियों से कुछ पत्तियां आकर उनके गिलास में गिर गईं। थोड़ी देर बाद उन्होंने जब वह पानी पिया तो उन्हें बहुत पसंद आया। पत्तियों के मिलने से पानी से खुशबू आने लगी थी। उसे पीने के बाद उन्हें ताजगी महसूस हुई।

इसके बाद उन्होंने अपने कर्मचारियों को बुला कर उस झाड़ी की पत्तियों वाला गरम पानी देने का आदेश दिया। वे पत्तियां ही चाय की पत्तियां थीं। जब यह बात उनकी लोगों को पता चली तो उसने भी यह पेय पीना शुरू कर दिया। सभी ताजगी महसूस करते थे। लंबे अरसे तक चीन के लोग इसका सेवन करते रहे और यह बात किसी को पता नहीं चली। वहां रहने वाले बौद्ध भिक्षु भी इसका सेवन करते थे। उन्हीं बौद्ध भिक्षुओं के जरिये यह भारत में आई।

यानी कह सकते हैं कि चीन में चाय की संस्कृति तैयार हुई और वहीं से दुनिया भर में फैली, फली-फूली। हालांकि शुरुआती दौर में अनजान लोग इसके प्रति बहुत आकर्षित नहीं होते थे। लोगों में इसका उपयोग बढ़ाने के लिए काफी प्रचार करना पड़ा। इसके प्रचार के लिए कई शहरों में केतली रख कर बड़ी-बड़ी गाड़ियां घूमा करती थीं। वे लोगों से कहती थीं कि आप दूध ले आइए तो हम आपको चाय बना कर पिला देंगे। कुछ लोग ऐसा करते भी थे। चाय के प्रचार के शुरू में जो पोस्टर आए, उसमें भी बताया जाता था कि चाय कैसे बनाई जाती है। पर वह दौर और था, अब का दौर कुछ और है।

अब तो हालत यह है कि शायद ही ऐसा कोई घर हो जहां चाय सुबह-शाम न बनती हो। घरों में चाय बनने के बावजूद बाजार, सड़क आदि से गुजरते हुए जितनी दुकानें चाय की दिख जाती हैं, उतनी शायद ही किसी और चीज की होती हों। यही वजह है कि भारत अपने उत्पादन का बड़ा हिस्सा खुद ही खपत कर लेता है। आज चाय एक संस्कृति बन चुकी है। किसी के साथ या फिर अकेले ही वक्त काटना हो, काम करने के लिए मन-मिजाज को तैयार करना हो, किसी चर्चा का आयोजन हो, चाय का सहारा जरूरी माना जाता है।

हालांकि कई लोगों को इसकी लत लग जाती है और वे निर्धारित समय पर इसकी तलब से परेशान हो जाते हैं। लेकिन इसे पीने के लिए जरूरत जैसी कोई बाध्यता नहीं है। जब मन किया, कुछ लोग मिल-बैठे तो सड़क हो या घर, चाय की खोज शुरू हो जाती है। हमारे घर में भी चाय बनती है, पर गोदोलिया वाली चाय का जवाब नहीं। आप कभी बनारस जाएं तो गंगा के घाटों, बाबा विश्वनाथ और धार्मिक स्थलों के साथ ही गोदोलिया की चाय भी जरूर पीएं!

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