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दुनिया मेरे आगे: हिंसा के ईंधन

ऐसी हिंसा जो ‘चिह्नित’ व्यक्ति या समूह के प्रति है, तब वह महज हिंसा नहीं है। दो विश्व युद्धों के बाद भी हर महाद्वीप किसी न किसी प्रकार की हिंसा में लिप्त है या शिकार है। अब अगर बात को भारतीय परिवेश में समझा जाए तो यहां हिंसा का जो इतिहास है, उसमें ‘चिह्नित’ समूह के प्रति हिंसा धार्मिक पुस्तकों, सामाजिक रीति-रिवाजों में एक तरह से नैतिक मान्यता प्राप्त रही है।

Author Published on: March 19, 2020 12:09 AM
Delhi riotsदिल्ली हिंसा के बाद का दृश्य। (PTI Photo)

बीनू कबीर
ऐसी हिंसा जो ‘चिह्नित’ व्यक्ति या समूह के प्रति है, तब वह महज हिंसा नहीं है। दो विश्व युद्धों के बाद भी हर महाद्वीप किसी न किसी प्रकार की हिंसा में लिप्त है या शिकार है। अब अगर बात को भारतीय परिवेश में समझा जाए तो यहां हिंसा का जो इतिहास है, उसमें ‘चिह्नित’ समूह के प्रति हिंसा धार्मिक पुस्तकों, सामाजिक रीति-रिवाजों में एक तरह से नैतिक मान्यता प्राप्त रही है। ये ‘चिह्नित’ समूह स्त्री, शूद्र, म्लेच्छ रहे हैं। समाज का शासक समूह इन तीनों को अपनी हुक्म बजाते हुए देखना चाहता है और इन्हें अपनी दया और अनुकम्पा पर रखना चाहता है।

लोकतंत्र जैसी व्यवस्था ने सबको एक समान समूह में परिवर्तित कर दिया- ‘नागरिक समूह’। शासक रहे समूह की यही बेचैनी है कि सब समान कैसे! फिर असमानता को उचित ठहराने के अनेक तर्क और असमानता को बनाए रखने अनेक उपाय किए गए। पिछली सदी में नब्बे के दशक से बदली आर्थिक और सामाजिक नीतियों ने समाज के हर समूह को दो भागों मे साफ-साफ बांट दिया। संविधान के विशेष उपबंध जो पहले से थे, फिर मंडल आयोग की सिफारिशें और उदारीकरण की आर्थिक नीतियां, इन दोनों ने समाज में नए शासक समूह पैदा किए जो सीधे पारंपरिक शासक समूह के बराबर आकर बैठ गया।

अब दोनों समूह शहरों या महानगरों के पांच सितारा होटलों में एक साथ दस्तरखान पर मौजूद थे। आरक्षण ने शासित समूह को आर्थिक मजबूती और सामाजिक सम्मान दिया, क्योंकि अब वे भी भारत सरकार की प्रथम श्रेणी के राजपत्रित सेवाओं में थे। वे कलक्टर के बंगले में माली, सफाईकर्मी, चपरासी नहीं, कलक्टर बन कर पहुंचे। इसने पारंपरिक भारतीय समाज के पुराने ताने-बाने को जितना संभव था, उतना तोड़ा।

सारे ‘चिह्नित’ समूह, शासक समूह का हिस्सा बने। यह अलग बात है अभी पारंपरिक शासक समूह की तुलना में उनका औसत बहुत पीछे रहा, क्योंकि पारंपरिक शासक समूह के पास उत्तराधिकार की शक्ति, संपत्ति, सामाजिक पहचान, सम्मान कहीं ज्यादा है। इस उत्तराधिकार की संपत्ति पर उन्हें कोई कर नहीं देना पड़ता और जमींदारी उन्मूलन कानून का क्या हश्र हुआ, सब जानते हैं।

अब इतने बिखरे, टूटे और परस्पर विरोध, यहां तक की शत्रुता के भाव से भरे समाज में हिंसा तो बस एक छोटी-सी घटना, छोटी-सी अफवाह पर जंगल की आग की तरह फैलती है। बहुत से लोग आग लगाते हैं, कुछ उसमें अपने ‘यज्ञ की समिधा’ डालते हैं, कुछ पेट्रोल, कुछ लकड़ियां डालते हैं, कुछ हाथ सेंकते हैं। राज्य जब अपने नीति-निर्देशक तत्त्वों से दूर किसी राजनीतिक दल का चुनावी घोषणा-पत्र पूरा करने का साधन बन जाए तो ऐसी हिंसा फिर नैतिकता, न्याय, नीति की नई ही परिभाषा प्रस्तुत करती है। अरस्तू ने बहुत पहले सरकार के विविध रूपों पर चर्चा की थी। लोकतंत्र के भीड़तंत्र बन जाने का खतरा बताया था। बर्टेंड रसल ने कहा है- ‘लोकतंत्र में मूर्खों को भी वोट देने का अधिकार होता है और निरंकुश तंत्र में मूर्खों को शासन करने का अधिकार होता है।’

समाज में दो तरह के असंतुष्ट समूह हैं। एक जो पारंपरिक शासक समूह हैं, दूसरे जो शासित समूह हैं। हिंसा के ईधन बनते हैं समाज के ये असंतुष्ट समूह। पारंपरिक शासक समूह के असंतुष्ट समूह अपनी शासक के विरासत-भाव से लोकतंत्र में आकर भी नहीं निकले। ये पारंपरिक शासक समूह अभी भी राजा साहब हैं, अपना राजतिलक, अभिषेक करवा रहे हैं और आधुनिक राज्य के प्रतिनिधि इनके मेहमान बनते हैं।

जनता समझ नहीं पाती कि संप्रभुता का ‘डि-फैक्टो’ और ‘डि-जूरे’ निवास कहां है। दूसरे वे असंतुष्ट समूह हैं जो गरीबी, बेरोजगारी और बीमारी से जूझ रहे हैं, जिनकी डिग्रियां रद्दी के भाव हो चुकी हैं। समाज में इतिहास जिस तरह धार्मिक नामकरण से पैबस्त है, मसलन हिंदू काल, मुसलिम काल, ईसाई काल, तो इसने भी हिंसा की जमीन बचपन से तैयार कर दी है। वे शासक और शासित के बतौर इतिहास का पाठ कभी नहीं कर पाते।

बदली हुई आर्थिक नीति, समाज में राज्य का दखल, नई सामाजिक नीति ने बहुत से बदलाव लोगों के सामने ला दिया। नई तकनीक से लैस नई मशीनों ने जहां जीवन को सरल बनाया, वहीं आलसी भी बनाया। बाजार बहुत मुंहजोर हो गया और इसने लोगों के जीवन का संचालन अपने हाथ में ले लिया, लोगों का मन बदलने लगा और बनाने भी लगा। सब कुछ इतना त्वरित गति से घटने लगा कि विचार और विवेक गायब होने लगे।

या तो लोग मशीन बन गए या भीड़ बन गए। दूसरी तरफ, उदारवाद के सारे पाप राज्य की सामाजिक नीतियों खासकर ‘विशेष उपबंध’ के सिर पर डाल दी गर्इं। इससे समाज, इतिहास, भूगोल की अनपढ़ता सामने आ गई। कोई भी इतिहास बिना उसके भूगोल के अधूरी और गलत समझ देगा। इतिहास में दर्शन, विज्ञान, गणित को रेखांकित किए बिना सही सामाजिक-आर्थिक समझ और राजनीतिक दिशा सामने प्रस्तुत नहीं किया जा सकेगा। हिंसा को लेकर जहां हर धार्मिक पुस्तक के पास तर्क है, हर व्यक्ति के पास अपने को सही ठहराने की ‘बौद्धिक क्षमता’ है, वहां कोई हिंसा आखिरी नहीं!

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