ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: सभ्यता का सलीका

भारतीय जमीन पर उगी उनकी बुरी आदतें इतनी पक चुकी होती हैं कि वे विदेशी धरती पर रहते हुए भी उन्हें संपादित नहीं करते। अपने न्यूजीलैंड प्रवास के दौरान मुझे यह देख कर दुख हुआ कि क्यों अनेक लोग बेहतर माहौल मिलने के बावजूद हल्की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाते।

Author Published on: July 2, 2020 1:48 AM
india, restauant, moneyविदेश में कुछ भारतीय अपने लोगों से अजीब तरह से व्यवहार करते हैं। इससे पता चलता है कि उनको सलीका नहीं मालूम।

संतोष उत्सुक
भारतीयों के जीवन से विदेश का आकर्षण कभी खत्म नहीं होता। वहां की जीवनशैली, अनुशासन, मेहनत की कीमत, स्वच्छता, समानता हमें बुलाती है। कोई न कोई रास्ता निकाल कर हममें से कई लोग विदेश जाते हैं, दिन-रात परिश्रम करते हैं और निस्संदेह बेहतर जीवन भी बिताते हैं। बहुत से भारतीय बरसों से विदेशों में रहते हैं, वहां के अनुशासन के अनुरूप हर काम करते हैं, सख्त यातायात नियमों का पालन करते हैं। लेकिन कुछ लोगों का व्यवहार हैरान करता है।

भारतीय जमीन पर उगी उनकी बुरी आदतें इतनी पक चुकी होती हैं कि वे विदेशी धरती पर रहते हुए भी उन्हें संपादित नहीं करते। अपने न्यूजीलैंड प्रवास के दौरान मुझे यह देख कर दुख हुआ कि क्यों अनेक लोग बेहतर माहौल मिलने के बावजूद हल्की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाते।

एक भारतीय दूसरे भारतीय के साथ कमतर व्यवहार करता है, जैसा कि उनकी नियमित प्रवृत्ति अपने देश में औरों के साथ करने की है। उनकी कई व्यावहारिक आदतों के कारण कई विदेशी उन्हें अपना मकान किराए पर देने से बचते हैं। किसी परिचित के साथ मेरा उस दिन उस क्षेत्र में जाना हुआ, जहां भारतीय लोग ज्यादा रहते हैं। मैंने देखा एक व्यक्ति आराम से आया और पेड़ के नीचे बने घेरे में, संभवत बासी चावल फेंक कर कार में बैठ कर निकल गया। सामने थोड़ी दूर कार में बैठे मुझे बुरा लगा, लेकिन मैं उसे कुछ कहने की सोचने के बावजूद चुप रह गया। यह मान कर कि अपना ही देशी भाई है, क्या पता टोकने पर कहीं गलत तरीके से प्रतिक्रिया न कर दे।

ऐसा नहीं हो सकता कि उन्हें पता नहीं होगा कि वहां म्युनिसिपल काउंसिल की तरफ से हर मकान में दो कचरा पेटियां रखी जाती हैं। एक पुनर्चक्रित किए जा सकने वाले कचरे के लिए और दूसरी अन्य कचरे के लिए। कचरा भर जाने पर इन्हें निश्चित दिन सड़क के किनारे रख दिया जाता है, जिसमें से गाडी कूड़ा ले जाती है। लेकिन जनाब ने विचित्र लापरवाही भरा तरीका ही प्रयोग किया। हमारा देश स्वच्छता अभियान के माध्यम से दुनिया भर में ख्याति अर्जित कर रहा है और इन्होंने अपना योगदान विदेश में इस तरह से देकर नाम कमाया।

इसके अलावा, भारतीय मालिक द्वारा चलाए जा रहे एक रेस्तरां में पनीर और चना मसाला की सब्जी में एक जैसी ग्रेवी खाने को मिली। काउंटर पर शिकायत की तो बोले वे रसोई में काम करने वाले को जरूर बताएंगे। उन्हें लगा होगा कि खाने वाले भारतीय बंदे ही तो हैं… इसलिए सब चलता है! लेकिन आॅनलाइन की हुई उनकी ‘तारीफ’ ध्यान से पढ़ लें तो कोई दोबारा जाए न इनके यहां। कई भारतीय नियोक्ताओं द्वारा उन विद्यार्थियों को निम्नतम वेतन से काफी कम पैसे दिए जाते हैं, जो सप्ताह में कुछ घंटे ही काम कर सकते हैं।

एक भारतीय द्वारा चलाए जा रहे प्रसिद्ध रेस्तरां में टेबल के लिए अग्रिम भुगतान करा कर पंद्रह किलोमीटर दूर पहुंचे तो वहां भीड़ नहीं थी। वहां मुझे आम की लस्सी की जगह नमकीन लस्सी में आम का रस मिला कर उसे आम-लस्सी बता कर दिया गया। मालिक को बताया तो बोले तो फिर वही टालमटोल करता हुआ जवाब। कोई जवाबदेही नहीं।

मुझे हैरानी होती रही कि यह सब कुछ विदेश में भी बदल क्यों नहीं सका! जब मैंने अपने परिवार के बीच ही थोड़ा दुख जाहिर किया तो बेटा बोला कि किसी अंग्रेज ग्राहक के साथ वे ऐसा बर्ताव नहीं कर सकते थे। यानी उनका व्यवहार व्यक्ति देख कर संचालित होता है।

क्या यह वर्चस्व और श्रेष्ठता के सामने नत होने की मानसिकता नहीं है? यहां अपने देश में लोगों का ऐसा व्यवहार आमतौर पर दिख जाएगा कि कोई व्यक्ति अगर रसूख वाला है तो उसके सामने ज्यादातर लोग विनम्र भाव से पेश आते हैं और अगर कोई दिखने में कमजोर पृष्ठभूमि का लग रहा तो उसे मिलने वाली सेवाओं में लापरवाही, अनदेखी तो आम है ही, उससे पहले ही उसे खराब या उपेक्षित बर्ताव का सामना करना पड़ता है।

विडंबना यह है कि इस तरह के बर्ताव पर अगर कोई दूसरा व्यक्ति आपत्ति जताता है तो उसकी बात को भी हल्के में लेकर किनारे कर दिया जाता है। मैं यह नहीं कह रहा कि विदेशों में बसे सारे भारतीय ऐसा ही बर्ताव करते हैं। लेकिन जब इस तरह की आदत से लाचार कुछ लोग दिख जाते हैं और उनका सामना होता है तो यह सवाल दिमाग में जरूर आता है कि क्या जगह के मुताबिक बात-व्यवहार में सकारात्मक बदलाव नहीं लाया जा सकता है। सुविधा और संसाधनों के बीच जीना एक बात होती है, सलीके के साथ पेश आना दूसरी बात।

विदेशी जमीन पर हम विदेशियों के साथ आमतौर पर मुस्कुराते हुए उचित व्यवहार करते हैं या कहिए करना पड़ता है, ताकि हमारी छवि अच्छी बनी रहे। फिर हम भारतीयों के साथ बेहतर, सही और बराबरी का व्यवहार करने में क्यों कतराते हैं? क्यों नहीं अपनी बिगड़ी हुई चलताऊ आदतों में थोड़ा सुधार लेते हैं? क्यों यह मान कर चलते हैं कि भारतीयों के साथ सब चलता है। विदेशी धरती पर भी अच्छाइयों को साथ लेकर जिएंगे तो प्रशंसा मिलेगी और देश की छवि भी सुधरेगी।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगे: जीवन का पहिया
2 दुनिया मेरे आगे: पैरोडी की कला
3 दुनिया मेरे आगे: समय का चक्र
ये पढ़ा क्या...
X