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दायरों में आजादी

पड़ोस की सुगंधा दीदी अपनी पढ़ाई के लिए शहर के जिस छात्रावास में रह रही थीं, उसका मुख्य दरवाजा रात को नौ बजे बंद हो जाता था। उसके बाद भीतर प्रवेश करना मुश्किल था। वे उस दिन अपने गांव से शहर स्थित हॉस्टल लौट रही थीं तो रास्ते में बस खराब होने की वजह से […]
Author August 20, 2015 08:58 am

पड़ोस की सुगंधा दीदी अपनी पढ़ाई के लिए शहर के जिस छात्रावास में रह रही थीं, उसका मुख्य दरवाजा रात को नौ बजे बंद हो जाता था। उसके बाद भीतर प्रवेश करना मुश्किल था। वे उस दिन अपने गांव से शहर स्थित हॉस्टल लौट रही थीं तो रास्ते में बस खराब होने की वजह से एक घंटे देर हो गई। बस से उतरने के बाद आॅटोरिक्शा लेकर हॉस्टल की ओर जाते हुए वे थोड़ा घबराई हुई थीं, क्योंकि इसके पहले उन्हें कभी इतनी देर नहीं हुई थी। अचानक उन्हें लगा कि आॅटो का रास्ता हॉस्टल से थोड़ी दूर पहले दूसरी ओर मुड़ गया था।

सुगंधा दीदी ने अचानक अपना पर्स नीचे गिर जाने का बहाना बना कर आॅटोरिक्शा रुकवाया और फिर पैदल ही छात्रावास की ओर दौड़ने लगीं। आॅटो वाले ने भी थोड़ी दूर पीछा किया, लेकिन किसी तरह वे हॉस्टल के गेट तक पहुंचने और अंदर जाने में कामयाब रहीं। इस हादसे का उन पर इतना गहरा असर पड़ा कि फिर कभी शाम के समय भी अकेले बाहर नहीं निकलीं।

साथ की लड़कियों से हॉस्टल के कर्मचारियों के बीच सात बजे के बाद आने वाली लड़कियों के बारे में तरह-तरह की बातें अक्सर सुनने के अलावा उनके दिमाग में उस दिन की त्रासदी की कई भयावह तस्वीरें चलती रहतीं। मैं उन्हें याद करते हुए उस तनु के बारे में सोच रही थी जो तमाम सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्थाओं को धता बताते हुए अपनी मर्जी की जिंदगी जीती है। क्या कोई कहानी समाज के यथार्थ के बरक्स इतना ज्यादा भ्रम में डाल सकती है।

‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ फिल्म में जिस तरह कानपुर में तनु का ‘स्वतंत्र’ और आवारगी भरा जीवन बिना किसी बाधा के सहज गति से चलता है, सुख और दुख में भी, क्या वह महानगरों के मध्यवर्ग की लड़कियों को भी सुलभ है? मैं सचेतन उच्च- वर्ग की उन लड़कियों के बारे में कुछ नहीं कह रही, जिनके साथ साए की तरह बॉडीगार्ड लगे रहते हैं। मेरी चिंता का विषय यहां सुगंधा दीदी है, मध्यवर्ग की वे लड़कियां हैं, जो तनु की तरह हों।

कानपुर शहर या उत्तर प्रदेश या फिर देश का कोई भी राज्य स्त्रियों के लिए कितना सुरक्षित रहा है, यह आए दिन के अखबारों की खबरों से पता चल जाता है। जिस देश में तंदूर कांड के आरोपी को सजा मिलने में इतना लंबा समय लग जाए और जहां राजधानी दिल्ली में रात को नौ बजे एक पुरुष मित्र के साथ होने के बावजूद निर्भया के साथ बर्बरता हुई और उसे जान से हाथ धोना पड़ा, वहां एक मध्यवर्गीय परिवार की तनु जिस स्वच्छंदता से रात-बिरात बेफिक्र घूमती रहती है, नशे में धुत्त दिखती है, वह हैरान करने वाला है।

क्या यह सिर्फ इस तर्क पर कि ‘आप फिल्म देख रहे हैं’? लेकिन यह सवाल पीछा करने लगता है कि अगर कभी गलती से तनु जैसी कोई लड़की उत्तर प्रदेश या बिहार के किसी मध्यवर्गीय परिवार में हो तो उसकी नियति क्या होगी? पहला, दसवीं पास करते ही उसके घर वाले ब्याह करा कर उससे पीछा छुड़ा लेते। दूसरा, उसके पीछे पड़े अनेक आशिकों में से ही कोई उस पर तेजाब डाल देता। तीसरा, देर रात कानपुर की गलियों में अकेले घूमने वाली लड़की का हाल कुछ निर्भया की तरह का होता। चौथा, पुलिस वाले किसी भी आरोप में उस लड़की को पकड़ कर जेल में डाल देते, और पांचवां, पति को मानसिक चिकित्सालय में भेजने वाली लड़की को पति तलाक दे देता और मायके वाले भी अपने दरवाजे उसके लिए बंद कर लेते।

बहरहाल, कुछ समय पहले ‘बेबी डॉल’ गीत के लिए मशहूर हुई कणिका कपूर ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि पति के विवाहेतर संबंधों को जब और सहन नहीं कर पाने की स्थिति में वे पति से अलग हो गर्इं, तब लंदन के उनकी जान-पहचान के भारतीय समुदाय के लोगों ने न केवल उनका सामाजिक बहिष्कार किया, बल्कि उन्हें कॉलगर्ल तक कहा। ध्यान रखा जाए कि यह भारतीय समुदाय लंदन के उच्चवर्ग का प्रतिनिधित्व करता है।

यानी यथार्थ के पैमानों पर रख कर देखें तो सच यह है कि तनु जैसी लड़कियों के मध्यवर्ग में टिक पाने का अव्वल तो सवाल ही नहीं उठता, लेकिन अगर गलती से ऐसा कोई चमत्कार हो भी जाए तो जल्दी ही उसे उसकी हैसियत बता दी जाती है। जिस देश में ‘जिमि स्वतंत्र भए बिगड़ि नारि’ सामाजिक मानसिकता का ‘ब्रह्मवाक्य’ हो, वहां जमीनी यथार्थ स्वतंत्रता को हक मानने वाली लड़कियों के अस्तित्व को नकारता है। फिलहाल हम सिर्फ उम्मीद कर सकते हैं कि शायद किसी दिन हमें अपने आसपास तनु जैसी लड़की दिख जाए। वह स्त्री-स्वातंत्र्य के लिहाज से सचमुच एक उल्लेखनीय दिन होगा। अभी तो सूरदास के पद ‘निर्गुण कौन देस को बासी’ की तर्ज पर यह कहने को जी चाहता है कि ‘तनु, तुम कौन देस को बासी…!’

पल्लवी प्रकाश

 

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