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दुनिया मेरे आगे: सफर में आजादी

दुखद है कि एक संप्रभु देश में आजादी के छिहत्तर साल बाद भी भावी पीढ़ी के एक बड़े हिस्से के लिए आजादी का जश्न कुछ रुपए कमा लेने का मौका है, ताकि गुजारा हो सके।

Author August 15, 2018 5:12 AM
क्या आजादी हमारे लिए प्रतीकात्मक रह गई है जो दरवाजों, गाड़ी की खिड़कियों और हाथ में झंडे लहराने से पूरी होती है या हम सक्रिय नागरिकता का परिचय देते हुए इन बच्चों को कम से कम इनके लिए बने शिक्षा के अधिकार कानून को सुनिश्चित कर सकते हैं?

ऋषभ कुमार मिश्र

एक काम के सिलसिले में दिल्ली के लट्यंस जोन की गलियों से गुजर रहा था। जो लोग इस इलाके से परिचित हैं वे जानते होंगे कि यह भारत का वह संभ्रांत इलाका है जिसकी गलियां सरकारी हस्तियों के घरों से गुलजार हैं। इस इलाके की एक विशेषता सड़कों पर आने वाले चौराहों की लाल बत्तियों की अधिकता है। आजादी के जश्न के मौके को देखते हुए अमूमन हर लालबत्ती पर तिरंगा झंडा और गुब्बारा बेचने वाले मौजूद थे। बेचने वालों में से अधिकतर बच्चे थे जो आमतौर पर स्कूल जाने की उम्र वाले थे। आशय यह है कि उन बच्चों और उनके अभिभावकों के लिए पढ़ाई के बदले तिरंगा और गुब्बारा बेचना ज्यादा महत्त्वपूर्ण था। चौराहों पर लालबत्ती के संकेत के साथ रुकने वाले ‘साहब’ लोग भी उन बच्चों पर तरस खाकर या फिर झंडा और गुब्बारा खरीद कर खुद देशप्रेम के प्रतीक से रंगना चाहते थे।

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मैंने जब उन बच्चों ने बातचीत करना शुरू किया तो उन्होंने बताया कि उनके लिए झंडे बेचना मौसमी व्यवसाय है जो साल में दो बार 15 अगस्त और 26 जनवरी को आता है। इन मौकों पर वे एक हफ्ते में एक हजार से दो हजार रुपए तक कमा लेते हैं। दुखद है कि एक संप्रभु देश में आजादी के छिहत्तर साल बाद भी भावी पीढ़ी के एक बड़े हिस्से के लिए आजादी का जश्न कुछ रुपए कमा लेने का मौका है, ताकि गुजारा हो सके। झंडे और गुब्बारे बेचने का यह मतलब नहीं कि वे देश से अपने रिश्तों को केवल क्रेता-विक्रेता के रूप में देख रहे हैं, बल्कि इस व्यापार में उनकी भागीदारी उनके राजनीतिक समाजीकरण का हिस्सा है। इन बच्चों से बातचीत इस समाजीकरण की कई परतों को खोलती है! सरकार इनके लिए देश के समतुल्य है और उसे ये अपने और परिवार के लिए बाधा मानते हैं। सरकार के माध्यम यानी पुलिस, ट्रैफिक पुलिस, नगर निगम या अन्य सरकारी महकमे इनकी गृहस्थी या रोजगार को उजाड़ते हैं। सरकार का यह रूप इनमें डर पैदा करता है।

वे सरकार के माध्यम से अपने जीवन में देश के महत्त्व को नहीं स्वीकार कर पाते हैं। सरकार की यह समझ और भूमिका देश के नागरिक के रूप में इन्हें बड़ा कर रही है। तुर्रा यह कि इनके और इनके परिवार के पास खुद को नागरिक सिद्ध करने का प्रमाण-पत्र नहीं है। इसके अभाव में सरकार इन्हें नागरिक सुविधाएं कैसे दे? मजबूरी है कि वे इसके लिए औपचारिक दावा नहीं कर सकते, क्योंकि गलियों को किसी मोहल्ले का दर्जा प्राप्त नहीं है और न ही इनके अभिभावकों ने बच्चों के जन्म आदि को सरकारी तरीके से दर्ज करवाया है। एक तरह से वे देश में होकर भी देश के नहीं हैं। तो क्या मान लिया जाए कि इन बच्चों में देश के लिए प्रेम, गर्व और सम्मान का भाव नहीं है? इनसे बातचीत में ऐसा नहीं पाया। वे भी देश से अपने रिश्ते को इन भावों के सापेक्ष देखते हैं। इन बच्चों में यह भाव स्वाभाविक नागरिक जीवन का हिस्सा नहीं है, बल्कि युद्ध की संभावना या कल्पना द्वारा जगाया जाता है।

इसका स्रोत मीडिया है। ये बच्चे ‘बॉर्डर’, ‘गदर’ और ‘कर्मा’ जैसी फिल्मों के लोकप्रिय संवादों को दोहराते हैं। इनके लिए देश का होना किसी दूसरे देश या धर्म विशेष से घृणा का भाव है। देश के सम्मान को वे सैनिकों के सम्मान या देश की रक्षा से जोड़ कर बताते हैं। यह प्रवृत्ति उन्हें ऐसा नागरिक बनाती है, जिनके लिए देश की सरकार एक डर है, लेकिन देश की सेना एक गर्व भाव पैदा करती है। उनके लिए देश का एक रूप दिग्गज राजनेता है। ये देश के अलग-अलग दलों के लोकप्रिय नेताओं को पहचानते हैं। इनकी भूमिका को वे ‘विकास’ से जोड़ते हैं। विकास की सरकारी परिभाषा जैसे- सड़क, गैस और अस्पताल का ये उल्लेख करते हैं। यह परिभाषा इनके आसपास के सरकारी विज्ञापनों का हिस्सा है।

गौरतलब है कि विकास के इन रूपों से ये अपना रिश्ता नहीं देख पाते। कुल मिला कर ये बच्चे एक राजनीतिक परिवेश में बड़े हो रहे हैं जहां ये राजनीति के लोकप्रिय संदेशों को पढ़ रहे हैं, लेकिन खुद और अपने परिवार को इस परिवेश में वे चिह्नित नहीं कर पा रहे हैं। वे कैसे चिह्नित करें? हमारा जोर तो ऐसे ‘सिविल बिहेवियर’ (जिसका आंशिक अनुवाद भद्र व्यवहार होगा, लेकिन समाजशास्त्रीय अनुवाद अभिजन व्यवहार होगा) पर है, जहां सफाई पसंद, सुसज्जित नागरिक जो व्यवस्थित और भव्यता में लपेटी हुई इमारत या किसी मनोरम प्राकृतिक दृश्य के साथ खड़ा है। इसके विपरीत फटे कपड़े में आधा ढका तना शेष आधे पर बहता पसीना, जल सुविधा के अभाव में स्नान और कंघी के बिना घूमते बच्चे, मिट्टी में सना हाथ भी भारत है। देश का भविष्य अपने अधिकार से वंचित है। क्या आजादी हमारे लिए प्रतीकात्मक रह गई है जो दरवाजों, गाड़ी की खिड़कियों और हाथ में झंडे लहराने से पूरी होती है या हम सक्रिय नागरिकता का परिचय देते हुए इन बच्चों को कम से कम इनके लिए बने शिक्षा के अधिकार कानून को सुनिश्चित कर सकते हैं?

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