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दुनिया मेरे आगे: उम्मीद की किरण

मजदूरों का पलायन भी एक बड़ी समस्या बन गई है। देश की आर्थिक स्थिति में जितना योगदान बड़ी-बड़ी कंपनियों और धनाढ्य वर्ग का है, उससे कहीं अधिक इन श्रमिकों का भी है।

Author Published on: May 20, 2020 12:04 AM
ना मजदूरों का पलायन थम रहा है ना सड़क हादसों की संख्या। बस, ट्रक या फिर पैदल चल रहे प्रवासी अमूमन हर दिन देश के किसी ना किसी हिस्से में हादसे का शिकार हो रहे हैं। यह तस्वीर नागपुर की है जहां मजदूर ट्रक में भरकर घर पर सफर के लिए निकल रहे हैं। (फोटो सोर्स – ANI)

बृजमोहन आचार्य
किसी शायर ने कहा है कि ‘हो के मायूस न आंगन से उखाड़ो पौधे, धूप बरसी है तो बारिश भी यहीं पर होगी।’ कुछ भी हो जाए, पूर्णबंदी से बेपटरी हुई देश की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा और देश वापस उसी पटरी पर दौड़ने लगेगा। यह सही है कि इस समय देश और दुनिया को महामारी से निपटने की दरकार है। उसके बाद ही आर्थिक सुधार की उम्मीद की जा सकती है। इसके चलते दुनिया में आर्थिक गाड़ी के पहिए एकदम से थम गए हैं। विश्व के अधिकांश देशों में लोगों को काम नहीं मिल रहा है। हर तरफ उदासी और मायूसी का आलम है।

श्रमिक तो क्या, धनाढ्य वर्ग भी चिंता के सागर में हिचकोले खा रहा है। जहां कहीं बैठते हैं या कहीं चर्चा होती है, तो देश के आर्थिक हालत बहस का मुख्य मुद्दा होती है और इस बहस का कोई अंतिम छोर निकलता नजर नहीं आता है। हालांकि देश और दुनिया में किसी न किसी कारणों से आर्थिक संकट उत्पन्न होता है और इसके हल भी खोजे जाते हैं। इस समय आर्थिक बदहाली अपने देश के लोग झेल रहे हैं। ऐसी स्थिति तो नोटबंदी के दौरान भी नजर नहीं आई थी। हालांकि उस वक्त लोग नोट बदलवाने के लिए सुबह से शाम तक लंबी कतार में खड़े रहते थे और उन्हें एक सीमा तक रुपयों की अदला-बदली करने का मौका मिल जाता, लेकिन इस समय जो हालात पैदा हुए हैं, उनसे निपटने के लिए लंबा समय गुजारना पड़ेगा।

यह सही है कि इतिहास भविष्य तय करता है, लेकिन अभी तो इतिहास स्वयं दफ्न हो चुका है। ऐसा नहीं कि देश में कोरोना की वजह से ही आर्थिक गाड़ी बेपटरी हुई है। आजादी से पहले भी आर्थिक हालात विकट हुए थे। लेकिन उस समय देश के नेताओं ने इन हालात को सुधारने के बजाय आजादी का झंडा फहराने का सपना संजोया हुआ था, जिसे पूरा किया गया था। आजादी से पहले ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश की आर्थिक गाड़ी का संचालन अपने हाथों में ले लिया था और अपनी मर्जी के मुताबिक इसे घुमाती रही।

इतिहास के पन्नों को पलटते हैं तो ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश में ऐसा काम किया जो न भूतो न भविष्यति हुआ। जब देश आजाद हुआ तब जाकर आर्थिक स्थिति में सुधार होता नजर आया। पर बढ़ती बेरोजगारी और जनसंख्या में इजाफा होने के कारण यह सुधार भी बौना नजर आने लगा। इसी तरह 1943 में बंगाल में पड़े भयंकर अकाल से भी आर्थिक स्थिति डांवाडोल हो गई थी। इस अकाल में करीब तीन लाख लोगों के मरने की जानकारी थी। इसके बाद देश के कई हिस्सों में समय-समय पर अकाल का साया मंडराने लगता है और सरकारें काम के बदले अनाज योजना चला कर पीड़ितों का पेट भरने का इंतजाम करती हैं, लेकिन आदमी को जीवन में केवल अनाज नहीं चाहिए, उसकी अन्य आवश्यकताएं भी होती हैं, उनको भी पूरा करने की दरकार होती है।

अमर्त्य सेन ने अकाल के संबंध में कहा था कि अकाल जटिल आर्थिक और सामाजिक ढांचे के विश्लेषण की मांग करता है। देश में जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना साम्राज्य फैलाया, तो लोगों की नाराजगी सामने आने लगी थी। लेकिन जब नमक पर कर लगाया तो आर्थिक असंतोष का गुब्बारा फूट गया था। उस वक्त लोगों के गुस्से को देखते हुए महात्मा गांधी ने अठहत्तर सत्याग्रहियों को साथ लेकर 12 मार्च, 1930 को दांडी यात्रा शुरू कर दी, जो पांच अप्रैल 1930 को समाप्त हुई थी। यहां पर महात्मा गांधी ने एक चुटकी नमक बना कर नमक कानून तोड़ने की घोषणा की थी। नमक पर कर लगाना भी देश में आर्थिक मुद्दा बन गया था। खैर, इस समय देश में जो आर्थिक हालात पैदा हुए हैं, उनसे निपटना नितांत आवश्यक है।

इस वक्त मजदूरों का पलायन भी एक बड़ी समस्या बन गई है। देश की आर्थिक स्थिति में जितना योगदान बड़ी-बड़ी कंपनियों और धनाढ्य वर्ग का है, उससे कहीं अधिक इन श्रमिकों का भी है। सरकार ने कोरोना महामारी से निपटने के बाद वापस आर्थिक स्थिति को सुधारना ही पहली प्राथमिकता होगी। इसलिए छोटे-छोटे उद्योग-धंधों को बढ़ावा और श्रमिकों को उनके शहर में ही काम की प्राथमिकता दी जाए। स्थानीय स्तर पर कारखानों को बढ़ावा देना जरूरी है और स्थानीय व्यक्ति को ही इसमें काम पर लगाया जाए। इसके अलावा स्वदेशी विचार को बढ़ावा देना होगा।

स्वदेशी के बल पर ही महात्मा गांधी ने विदेशी वस्तुओं की होली जलाई थी। उन्होंने कहा भी था ‘स्वदेशी वह विचार और भावना है, जो अपने आसपास उपलब्ध वस्तुओं और सेवाओं तक उपभोग को सीमित करने की प्रेरणा देती है, उन वस्तुओं के बजाय जो दूर हैं।’ स्वदेशी एक धार्मिक अनुशासन है, जिसकी पालना होनी चाहिए, भले ही इससे लोगों को असुविधा महसूस हो।

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