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जीवन की नदी में

जीवन नदी में गोते लगाते रहने और उससे निकलते रहने का खेल है।

सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

जिंदगी बड़ी दिलचस्प होती है, किसी वीडियो गेम की तरह। पहले आसान, बाद में थोड़ा मुश्किल और अंत में काफी मुश्किल स्तर तक पहुंचना पड़ता है। किन्हीं हालात में एक बार के लिए हम वीडियो गेम से पीछे हट सकते हैं, लेकिन जीवन के खेल से नहीं। यह एक ऐसी सच्चाई है, जिसमें न चाहकर भी सभी को खेलना पड़ता है। गिरते-पड़ते, उठते-बैठते जैसे भी हो खेलना पड़ता है। जीवन नदी में गोते लगाते रहने और उससे निकलते रहने का खेल है। जीवन अपने आप आगे की ओर खिसक जाती है और हम भी उसकी धारा में उसके समांतर चलते, बढ़ते, खिसकते या यों कहें कि तैरते रहते हैं।

अब मैं शरीर से बूढ़ा और रिश्ते में दादा बन चुका हूं। कुछ समय पहले एक दिन पोती पास में सो रही थी, तभी फाटक के बाहर से किसी ने आवाज दी। बूढ़ी आंखें आंखों से कम, दिमाग से ज्यादा देखने की आदी हो जाती हैं। पोती को बिस्तर पर सुलाने के बाद कमरे से बाहर आकर धुंधलाती नजरों से देखा तो बेटा हाथ में कोई कागज लेकर आया था।

मुझे कागज थमाते हुए बोला- ‘जहां-जहां मैंने टिक लगाया है, वहां-वहां साइन कर दीजिए। ज्यादा सवाल-जवाब तलब करने की जरूरत नहीं है। यह लीजिए आपका चश्मा। जिंदगी भर कोई काम ढंग का किया नहीं। कम से कम यहां हस्ताक्षर तो ठीक से कर दीजिए।’ इसके बाद बेटे ने मेरे चेहरे पर उमड़ने वाली भावनाओं को पढ़ने तक की जरूरत नहीं समझी और वहां से चला गया।

बहरहाल, हाल ही में बेटा और बहू मेरे पैतृक गांव के खपरैल घर को बेचने के बारे में बात कर रहे थे। रजिस्ट्री के कागजात भी तैयार कर लिए थे। मैं उनकी बातचीत में दखल नहीं देना चाहता था। कहते हैं एक उम्र आने पर चुप रहने की आदत डाल लेनी चाहिए। अगर यह आदत नहीं है तो किसी भी अचानक पैदा होने वाले हालात के लिए तैयार रहना सीख लेना चाहिए। मेरे शरीर में दाना-पानी कम मधुमेह और रक्तचाप की गोलियों का बसेरा ज्यादा था।

यों ये गोलियां आती तो मेरे पेंशन के पैसे से ही थीं, लेकिन एटीएम कार्ड बेटे के पास रहता था। बेटे का कहना था कि जिस उम्र में भजन-कीर्तन करना चाहिए, उस उम्र में रुपयों की मोहमाया नहीं रखनी चाहिए। अब उसे कौन बताए कि शरीर को चालू रखने के लिए थोड़े-बहुत रुपए-पैसों की जरूरत पड़ती है। मैंने ना-नुकूर किए बिना कागज पर हस्ताक्षर कर दिए।

बेटे का रिश्ता मेरे साथ छुई-मुई रहता था। जो समय बेटे के साथ गुजारना था, वह मैंने कोल्हू की बैल की तरह काम करने में गुजार दिया। बेटे के मुख से मेरे लिए प्यार भरी बातें सुनने के लिए मैं जीवनभर तड़पता रहा। उसके बदलने के इंतजार में दशकों गुजर गए। अब तो लाठी के सहारे के बिना कदम भी नहीं उठते। लेकिन बेटे के एक अदद प्यार भरे बोल के लिए मेरा जीवन अब तक कोरा कागज ही साबित हुआ। मैंने किताबों में पढ़ी बातों को आमतौर पर झूठा होते हुए देखा है।

सच तो यह है कि जीवन वह शिक्षक है, जिसके हाथों जोर से डंडे खाने पड़ते हैं। जीवन के परीक्षा भवन में पर्चा लिखकर पास होने की खुशी मैंने अपनी कमाई से तौला। अब वह खुशी फीकी लग रही है। ऐसी कमाई किस काम की कि जहां अपना ही मुझे पराया समझने लगे। ‘बच्चों के लिए कमाना’ और ‘बच्चों को कमाना’ में बहुत अंतर है। शायद मैं इस अंतर को ठीक से समझ नहीं पाया। इसीलिए जिसे कमाना समझता था, वह गंवाना निकला। जीवन में बुढ़ापा होना चाहिए, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि बुढ़ापा ही सब कुछ होना चाहिए। रुपए-पैसे जरूरत पूरा करने के लिए होते हैं, लेकिन इसके चक्कर में रिश्तों को मरते देखना बड़ा कष्टदायी होता है।

आज के जमाने में जो फेसबुक, इंस्टाग्राम, वाट्सऐप वगैरह पर अपने मां-पिता के लिए बड़ी-बड़ी बातें करते दिखाई देते हैं, अक्सर ऐसे ही लोग घर में अपने मां-पिता पर चिल्लाते दिखाई देते हैं। कुछ दिन पहले बेटे ने कहा- ‘अभी आपका शरीर घूमने-फिरने लायक है। खाना खुद से बना लीजिएगा। मैंने दफ्तर के पास दो कमरों का एक घर ले लिया है। एक कमरे में हम पति-पत्नी और दूसरे में बेटी रहेगी।’ मैं कुछ कहना चाहता था कि वह मुझे भांप गया और बोला- ‘वहां समय-समय पर मुझे मिलने के लिए बड़े-बड़े लोग आते रहेंगे।

मैं नहीं चाहता कि आपकी वजह से मैं उनके बीच शर्मिंदा होऊं। यों आपको क्या फर्क पड़ता है कि आप यहां रहे या वहां। दो जून की रोटी से मतलब है। उसका मैं इंतजाम कर दिया करूंगा। काम के सिलसिले में मुझे दुनियाभर से बातचीत करनी होती है। तो मेरे लिए वक्त निकालना मुश्किल होगा। फिर भी महीने में एक बार आ जाया करूंगा।’ इतना कहता हुआ बेटा अपने नए घर की ओर ऐसे जाने लगा, जैसे उड़ने वाले परिंदे के पंख अभी-अभी निकले हों!

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