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बड़प्पन के बरक्स

आमतौर पर समाज में जिन्हें ‘बड़े’ लोग के तौर पर देखा-समझा जाता है, उनसे हमारी अपेक्षाएं क्या होती हैं?

depriveसांकेतिक फोटो।

मोनिका भाम्भू कलाना

आमतौर पर समाज में जिन्हें ‘बड़े’ लोग के तौर पर देखा-समझा जाता है, उनसे हमारी अपेक्षाएं क्या होती हैं? हम उनसे ऐसा इंसान होने की उम्मीद करते हैं, जिनके पास इंसानियत और संवेदना को लेकर बड़ा दिल हो और उनकी उदारता समाज के लिए प्रेरक हो। लेकिन व्यवहार में सच कई बार इससे इतर दिखता है।

हम आए दिन जिस तरह के समाज का सामना करते हैं, उसमें ‘बड़े’ लोगों के दंभ भी बड़े होते हैं। वे चाहते हैं कि एक ही पंजे से आपके आत्मसम्मान को दबोच कर आपकी गर्दन को जमीन से लगा दें। ऐसा करके शायद उन्हें बहुत सुख मिलता है। समाज की बुनावट और बनावट इस तरह की बनाई गई है कि कितनी ही अच्छी जगह आप पहुंच जाएं, वहां कोई न कोई ऐसे ‘बड़े’ लोग मिल ही जाते हैं।

कई बार यह समझना मुश्किल हो जाता है कि लोगों के सोचने का पैमाना क्या है और वे कैसे सोचते हैं। किसी भी की गई गलती पर वे आपको उस वक्त नहीं बताते हैं कि आप गलती सुधारिए, बल्कि इंतजार करते हैं उस वक्त का, जब वे आपको उस गलती को आधार बना कर अपमानित कर सकें या अपमानित होने के हालात पैदा होने दें। बड़प्पन को ओढ़ने का अहंकार बहुत बड़ा होता है।

कुछ अच्छा करने या बोलने पर तारीफ इसी अहंकारवश वे नहीं करते हैं। ऐसे लोगों को यह भी भ्रम होता है कि उनको कोई नहीं जान सकता। शायद वे खुद को ‘छोटे’ लोगों की ज्ञान की सीमा से बाहर समझते हैं, लेकिन उनका भविष्य तय करने की भी इच्छा रखते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐसे लोग बड़े आदर्श रखते हैं और खुद भी वही होने की कल्पना में रहते हैं।

इस तरह की धारणा में जीना ऐसी मनोस्थिति तैयार करता है, जिसमें ऐसे लोग आमतौर पर अपनी सच्चाइयों को लेकर एक तरह के भ्रम में रहते हैं और उसका सच आने पर दूसरों को यह उलाहना देने लगते हैं कि आप हमारे बारे में जानते ही कितना हैं! मानो किसी संदर्भ में किसी व्यक्ति का उदाहरण देने मात्र से उसके बारे में सब कुछ जानने की अनिवार्यता हो जाती हो!

जबकि सच यह है कि इतिहास से लेकर आज तक जितने ‘बड़े’ लोग माने और जाने जाते हैं, उनमें लगभग सबके बारे में हम सिर्फ उतना ही जानते हैं, जितना उन्होंने खुद अपने बारे में बताया होता है या फिर किसी ने अध्ययन करके उनके बारे में लिखा होता है। जो भी व्यक्ति सार्वजनिक परिदृश्य में सक्रिय हो, उसके काम को देखने-समझने वाले आम लोग हों और उसका लोगों पर असर पड़ता हो, क्या उनके काम और व्यक्तित्व के बारे में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जानना-समझना और उसका विश्लेषण करना जरूरी नहीं है? यह संबंधित व्यक्ति या रचना या काम के बारे में एक नया आयाम खोल सकता है। इसके जरिए यह भी जाना जा सकता है कि वे और उनका काम संतुलन का बड़ा उदाहरण है या फिर उनके किसी काम को और बेहतर किया जा सकता था।

जिस तरह किसी भी रचना की स्वतंत्र सत्ता होती है, उसी तरह आमतौर पर हर व्यवसाय की अपनी पहचान होती है। अगर किन्हीं वजहों से हमारी कोई पहचान है तो कोई दूसरा व्यक्ति उस सीमा तक हमारे बारे में बात कर सकता है, जहां तक हमारा कुछ निजी न हो। मेरी राय में व्यक्ति की निजता के दायरे का या तो सम्मान किया जाना चाहिए या फिर उसकी अनदेखी की जानी चाहिए। लेकिन उसके सार्वजनिक परिदृश्य और असर वाले काम पर बात करना सामुदायिक हित में होता है।

समाज, संसार और अपने आसपास को देख-समझ कर सोचना और उस पर लिखना मुझे अच्छा लगता है। जब तक परिस्थितियों के व्यापक संदर्भ न हो और उससे समाज या उसकी व्यवस्था पर कोई ठोस असर नहीं पड़ता हो, मैं उस पर बात करना बहुत जरूरी नहीं समझती। ‘बड़े’ और ‘छोटे’ लोगों की जो आम परिभाषा गढ़ी गई है, उसके मुताबिक ‘छोटे’ लोग मिट्टी से जुड़े होते हैं।

लेकिन दिमाग और दिल सभी इंसानों के पास होते हैं, बस सोचने-समझने का सलीका अलग हो सकता है। यह वस्तुस्थिति के प्रति दृष्टि पर निर्भर करता है, जो व्यक्ति की सामाजिक पृष्ठभूमि से तैयार होता है। हर व्यक्ति किसी बात से खुश हो सकता है और किसी बात पर आहत हो सकता है। समाज में जिन्हें ‘छोटे’ लोगों के तौर पर देखा-जाना जाता है, वे मिट्टी से जुड़े हुए अवश्य होते हैं, लेकिन मिट्टी में मिला दिए जाने के लिए कतई नहीं होते हैं।

किसी व्यक्ति का अख्तियार, शख्सियत, तेवर, अहंकार और उसकी बातें- सब बड़ी हो सकती हैं, लेकिन अगर इसी मुताबिक बड़ी नजर और बड़ा नजरिया भी हासिल हो सके तो किताबों में दर्ज पात्रों के साथ वैसी जिंदगी जीने वालों से भी प्रेम किया जा सकता है। हाशिये के लोग किताब लिखते हुए तो अच्छे लगते हैं, लेकिन बाहर किताबों से बाहर यथार्थ में फूहड़ मान लिए जाते हैं।

इस तरह का दोहरापन रचनाकर्म की विश्वसनीयता को भी कठघरे में खड़ा कर देता है। जबकि अतीत से लेकर अब तक रचनाओं की अहमियत ही इसलिए मानी जाती रही है कि वह व्यक्ति के भीतर संवेदनाओं का विकास करता है और इस तरह वर्तमान से बेहतर समाज के सपने की ओर बढ़ने के लिए रास्ते तैयार करता है।

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