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गम, गुड़िया और साथी

कितने सारे खिलौने थे। एक खिलौने में एक ढोल बजाता बंदर था, तो दूसरे में पहियों के सहारे चलने वाला घोड़ा। तीसरे को छुक-छुक करती टॉय-ट्रेन यानी खिलौना-रेलगाड़ी कहा जा सकता था, लेकिन सचमुच का खिलौना।

Boyसांकेतिक फोटो।

मीनाक्षी सोलंकी

कितने सारे खिलौने थे। एक खिलौने में एक ढोल बजाता बंदर था, तो दूसरे में पहियों के सहारे चलने वाला घोड़ा। तीसरे को छुक-छुक करती टॉय-ट्रेन यानी खिलौना-रेलगाड़ी कहा जा सकता था, लेकिन सचमुच का खिलौना। शिमला पहुंचाने वाली रेलगाड़ी नहीं! इसी प्रकार उसका कमरा कई और तरह के खिलौनों से भरा हुआ था। लेकिन उन तमाम खिलौनों में से उस बच्ची ने अपना खिलौना चुन लिया था- एक गुड़िया।

समाज की नजरों में गुड़िया हो या अन्य कोई खिलौना, मात्र एक मनोरंजन का उत्पाद है। बच्चों को तरह-तरह के खिलौने दिए जाते हैं, ताकि उनका मनोविनोद हो, वे प्रसन्न रहें। लेकिन सभी मानव निर्मित वस्तुओं की तरह खिलौने भी हमारी पारिवारिक परंपरा और सामाजिक व्यवस्था के बारे में बहुत कुछ बताने की क्षमता रखते हैं। अनुभवों से लेकर मनोविनोद में छिपी भावनाओं तक, वे हमारे बचपन के साथी के रूप में खड़े होते हैं। ऐसी ही एक साथी यह गुड़िया भी थी।

बात आजादी के पहले के वर्षों की है। उन दिनों औपनिवेशिक भारत में बाल-विवाह प्रथा अधिक प्रचलित थी। अधिकतर कन्याओं का लगभग दस वर्ष की आयु में ही विवाह करवा दिया जाता था। स्त्री का स्थान केवल घर पर है और अगर वह घर के बाहर हो तो वह अच्छी औरत नहीं है! उन्हें यही बताया जाता था। वे तब न अपनी सोच बदल सकती थीं और न ही समाज की सोच प्रभावित कर सकती थीं। चूंकि ब्याह होना जरूरी था, इसलिए दहेज जुटाना भी अनिवार्य था। अब भी है ही। माता-पिता बेटी को समय, सामीप्य और सहारा तो दे नहीं सके। वे अपनी योग्यतानुसार दहेज में बहुमूल्य वस्तुओं का ढेर लगा देते थे। गौरतलब है कि धनी परिवारों में पारिवारिक रीति-रिवाजों के अनुसार दहेज के रूप में अन्य तमाम वस्तुओं के अलावा कई गुड़िया भी दी जाती थी। विशेषकर बंगाल में यह परंपरा काफी साफ देखी जाती थी।

ससुराल में बाल-वधुओं को उनकी सास और घर की अन्य वरिष्ठ महिलाओं की देखरेख में एक सुंदर और सुशील पत्नी बनने के लिए प्रशिक्षित किया जाता था। उन्हें स्त्रैण शौक में रुचि लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। वे घर से बहुत कम निकलती थीं। बड़े-बुजुर्ग यही कहा करते थे। उनकी झोली तमाम आकर्षक और लुभावनी लगने वाली वस्तुओं से भर दी जाती थी। तरह-तरह के आभूषण, मनमोहक खिलौने, रंगीन वस्त्र… और भी न जाने क्या-क्या! लेकिन उन तमाम वस्तुओं में गुड़िया सबसे अधिक लोकप्रिय थी। मुख्य कारणों में से एक उनकी शारीरिक सुंदरता, गोरा-चिट्टा रंग और लगभग यथार्थवादी रूप था। यह गुड़िया चीनी मिट्टी की बनी होती थीं। अक्सर ससुराल में ऐसी अनेक गुड़िया होती थीं।

गुड़ियों का यह संसार अत्यंत मनमोहक और वैविध्यपूर्ण था। इस संसार में राजा-राजकुमारियों से लेकर पारंपरिक लाल अंगरखा पहने बकिंघम पैलेस गार्ड और अन्य बाहुबली संरक्षक थे। ‘रोमियो-जूलियट’ और ‘हैमलेट’ भी थे। परियों और नन से लेकर नर्तक, गायक, पियानो बजाता लड़का, फूल बेचती लड़की, चरवाहा और कृषक भी थे। लेकिन जितनी चित्र-विचित्र यह दुनिया थी, उसमें उतना ही कड़वा सच निहित था। बाल-वधुओं के लिए माता-पिता से अलग होने का अनुभव बेहद कड़वा, यातनादायी और हताशा देने वाला था। दूध, मिठाई, बिस्कुट आदि से माता-पिता की कमी नहीं पूरी की जा सकती थी, तो इन यथार्थवादी गुड़ियों की एक स्थिर आपूर्ति के साथ उनका मन बहलाया जाता था।

इसके अलावा, उन बच्चियों को व्यस्त रखने के लिए सिलाई मशीन भी एक अत्यंत उपकारक वस्तुओं में से थी। इसका उपयोग आमतौर पर गुड़ियों के लिए कपड़े सिलने के लिए किया जाता था। लाल, पीले, नीले और गुलाबी। गुड़ियों को अधिक आकर्षक बनाने के लिए उन्हें रंगों से रंगे, विविध प्रकार के वस्त्रों से सुसज्जित किया जाता था। समय के साथ-साथ वे बच्चियां उस नए घर-संसार में रचने-बसने का प्रयास करतीं। उनकी नाजुक कंधों पर समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक संरचना को जीवित रखने का बोझ था। यह बर्बादी थी, लेकिन वे विवश थीं। ऐसे में यह गुड़िया उस अकेलेपन और उदासी में सहानुभूति और सांत्वना देती थीं। सांत्वना क्या देती थीं, मानो उनकी हर घड़ी का साथी थीं!

कहते हैं कि माता-पिता का स्थान किसी अन्य वस्तु या विकल्प से नहीं भरा जा सकता। इसे त्रासदी और विडंबना ही समझिए कि उन बाल-वधुओं के पास विकल्प चुनने के सिवाय कोई रास्ता नहीं था। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। अपने देश में आज भी यह कटु सत्य सामाजिक वास्तविकता में निहित है। स्त्री के प्रति सदियों से चली आ रही मानसिकता और दकियानूसी सोच जारी है। बाल विवाह और उससे जुड़ी समस्याएं, जैसे उच्च मृत्यु दर, गर्भावस्था में जटिलता, यौन संचारित रोग, ग्रीवा कैंसर आदि पर चिंता लाजिमी है। यह बात हमारी नैतिक मान्यताओं को चोट पहुंचाती है। आज भी कई लोगों की नजरों में लड़कियां अनचाही और अशक्त औलाद हैं। जहां बालकों की अधिक संख्या को पाठशाला भेजा जाता है, वहीं उसके विपरीत परिवार का कुछ बोझ हल्का हो जाए तो कन्याओं को जल्द से जल्द विवाह करने पर विवश कर दिया जाता है।

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