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दुनिया मेरे आगे: ढाई आखर का शब्द

हिंदी फिल्म निर्माताओं के प्रति राष्ट्र को कृतज्ञ होना चाहिए, जिन्होंने ढाई अक्षर के शब्द प्यार शीर्षक से पर्याप्त फिल्मों का निर्माण कर उस प्रेम को रेखांकित किया, जिसे एक संत कवि के कथन के मुताबिक ठीक से पढ़ लेने से पांडित्य हासिल हो जाता है।

Author Updated: February 17, 2021 6:18 AM
Loveसांकेतिक फोटो।

अशोक संड

प्यार किया तो डरना क्या, जब प्यार किसी से होता है, प्यार तो होना ही था, प्यार ही प्यार, कहो ना प्यार है, प्रेम ग्रंथ, हां मैं प्रेम दिवानी हंू आदि तक तो ठीक था, गदर और टायलेट भी ‘एक प्रेम कथा’ ही थी। भूलवश एक बार न जाने कैसे अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा आ गया, अन्यथा आजादी के बाद सारे नायक प्यार करने के लिए ही लीला करते रहे। उनके संग्रहालय में प्रेम के लिए त्याग करने वालों की भी लंबी फेहरिस्त है। बिमल राय कृत शरत चंद्र का देवदास भले ही अपनी पारो को हासिल न करने के कारण बुदबुदाता रहा, वह शादी के रास्ते पर चली गई। रमेश सिप्पी के शोले का बीरू प्रेम में विफल होने की आशंका मात्र से चढ़ गया पानी की टंकी पर। राजी कर लिया गांव वालों को और मौसी की अनुमति लेकर ‘कुर्यात सदा मंगलम’ हो गया।

प्यार की पृष्ठभूमि पर महल, मधुमती, अमरप्रेम, अनारकली जैसी फिल्में भी बनीं, लेकिन आज भी के आसिफ साहब की बनाई ‘मुगले आजम’ अपनी ऐतिहासिकता और भव्यता के चलते याद आ ही जाती है। अनारकली की भूमिका निभाने वाली मधुबाला, जिन्हें रोमन माइथोलॉजी की वीनस का देशी संस्करण कहते थे, अकबर के दरबार में शास्त्रीय नृत्य कर शहजादे सलीम से अपनी मुहब्बत का इजहार करते हुए गाया था- प्यार किया तो डरना क्या। दीवारों में चुनवा दिए जाने बावजूद सलीम से किया प्यार अपनी निडरता को रेखांकित कर गया था।

लव जिहाद वाले दौर में गीत के बोल आज भी डरपोक प्रेमियों को प्यार करने और उसका इजहार करने का नैतिक बल देते हैं। प्यार का एक अलग-सा कांसेप्ट राज कपूर साहब का भी रहा है। एक तरफ जहां वह नफरत को हाशिए पर डाल मानवता को प्यार कर ले, नहीं तो फांसी चढ़ जाएगा का संदेश देते नजर आते हैं, वहींं प्यार हुआ इकरार हुआ, प्यार से फिर क्यों डरता है दिल का बोध कराते हैं। दूसरी तरफ ऐसे आशिक से डरने का भय भी उत्पन्न करते हैं, जो प्यार भी करता है आरी भी चलवाता है।

प्यार की चर्चा में संतों का स्मरण भी आवश्यक है। संत कबीर ने तो उसी को डाक्टरेट देने की सिफारिश की, जिसने किताबें नहीं पढ़ी, लेकिन प्रेम किया। युगों युगों तक प्रेम की पवित्रता की रक्षा करने वाला मंत्र भी एक भारतीय संत ने ही दिया- जापर जाकर सत्य सनेहू… सनेहू में प्यार। सच्चे प्यार करने वालों का मिलन इस मिलेनियम में भी तय है। सो तेहि मिलहि न कछु संदेहू। अब एक विदेशी संत के उपकार और उसकी शहादत की आड़ में प्यार का लोकार्पण हो चुका है। पश्चिम की नकल में प्रणय दिवस वैलेंटाइन डे मनाना हमने भी शुरू कर दिया।

अस्त व्यस्त जिंदगी में रोज तो मस्त नहीं रहा जा सकता, एक दिन फिक्स हो गया, सारे झंझटों से मुक्ति। इस ढाई आखर वाले प्रेम, प्यार, इश्क, स्नेह के इजहार और प्रदर्शन के लिए न अब हमारे अपने भाव रहे न भाषा। उधार में मिले और वाट्सऐपी तैरते संदेश आगे ठेल दिए जाते हैं। उद्योग की चादर भला इश्क के डबल बेड पर क्यों न फैलती? सात समुंदर पार वाले कैदी संत की अनुकंपा से अखबार वाले भी थोड़ा-बहुत राजस्व उगाही कर लेते हैं। अधिकांश दैनिक अपनी-अपनी भाषा में प्रेमी-प्रेमिकाओं के और ‘यंग कपल्स’ अपने मुद्रित प्यार का सार्वजनिक प्रदर्शन करने में कोताही नहीं करते। पल्लू की कोर दाब दांत के तले, कनखियों ने किए कई वायदे भले वाली लज्जा तिरोहित।

कभी होता होगा, लेकिन अब अंधा नहीं होता प्यार। आंख खोल कर प्यार करते हैं आज के युगल। प्यार की आंखें तेज होने लगीं। जगह-जगह हिदायत भी मिलती है- बड़े धोखे हैं इस राह में। प्यार धीरे नहीं चलता, बल्कि सुपरफास्ट हो गया है।

व्यापक हो गया है प्यार का स्वरूप, आधुनिक प्रेमी दूरद्रष्टा है। ‘गुनाहों का देवता’ वाले चंदर सुधा और ‘उसने कहा था’ वाला लहना सिंह, जिसका प्यार सिर्फ तीन शब्दों की जिज्ञासा- तेरी कुड़माई हो गई- से आगे बढ़ न पाने के बावजूद युद्ध के मैदान तक सुरक्षित रहा, साहित्य के पन्नों में सिमट चुका। फेसबुकी दौर में प्यार मुद्रित शब्दों में प्रदर्शित होता है, जिसे लाइक करने वाले संगी-साथी भी मौजूद आज के कंप्यूटर युग वाला प्यार मिनरल वाटर की तरह पवित्र, जिसमें पेप्सी और कोक की ठंडक, पित्जा और नूडल्स की महक के साथ होता है चुनौती भरा कनफेशन- कहो ना प्यार है।

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