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दुनिया मेरे आगे: भरोसे का संकट

कैसा दौर आ गया है कि अब हर पुरुष पर शक होने लगा है। खासतौर पर बच्चियों को लेकर किसी पर भरोसा नहीं होता।

Author April 27, 2018 3:19 AM
प्रतीकात्मक चित्र

सीत मिश्रा

जिंदगी की दौड़-भाग से जब भी फुर्सत मिलती है, अपनी सेहत का खयाल रख लेती हूं। मुंबई में हरियाली से भरे इस पार्क में मेरी ही तरह ढेर सारे अनजाने चेहरे दिखते हैं। कुछ जाने-पहचाने भी, जो मुझे तो नहीं जानते, लेकिन मैं उन्हें पहचानती हूं फिल्मी दुनिया की जानी-मानी हस्ती होने के नाते। कुछ रोज पहले बाकी दिनों की तरह ही पार्क में लोग अपने में मस्त थे। सबने अपनी-अपनी सहूलियत और गतिविधियों के हिसाब से अपना स्थान चुन लिया है। इस तंग शहर में छत या आंगन जैसी जगहें बहुत कम हैं। शायद इसीलिए लोग परिवार के साथ खुले आसमान के नीचे वक्त बिताने की ख्वाहिश लिए यहां चले आते हैं। जो लोग घर वालों के साथ थे, उन्होंने घास वाली जगह पर अपना डेरा जमा लिया था, कुछ खाते और बतियाते हुए। कुछ प्रेमी जोड़े अपने में गुम थे, कुछ बुजुर्ग झूले पर बैठे बातें कर रहे थे तो कुछ लोग खुद को चुस्त-दुरुस्त करने की चाह लिए योगासन कर रहे थे। बच्चे हर जगह थे- झूले पर, घास पर, बहते पानी के पास। उनकी दुनिया सब जगह है। इसीलिए वे बच्चे हैं।

मैं पार्क में दौड़ते हुए चक्कर लगा रही थी कि एक छोटी बच्ची के रोने की आवाज कानों में पड़ी। मैं ठिठक गई। मैं उस आवाज की दिशा में आगे बढ़ने लगी। बच्ची के रोने की आवाज तेज हो रही थी। वह अपनी मां को पुकार रही थी। मैं उसके पास पहुंची और उसका हाथ थाम लिया। ठीक उसी वक्त वहां तेजी से गार्ड आया और उसने बच्ची का दूसरा हाथ थाम लिया। अजनबियों को देख कर बच्ची सकपका गई और उसकी आवाज थोड़ी धीमी पड़ गई। मैं कुछ कहती उससे पहले गार्ड ने कहा कि वह बच्ची को उसकी मां के पास छोड़ देगा। गार्ड की बात मान कर मैं आगे बढ़ गई, लेकिन ध्यान पीछे ही रह गया। मुझे गार्ड की आवाज सुनाई दे रही थी। वह बच्ची के साथ उसके घर वालों को आवाज देने लगा था।

मैं कुछ आगे निकल गई तब अचानक मन में अजीब-सी बेचैनी होने लगी। कठुआ की वह मासूम बच्ची बरबस ही जेहन में कौंध गई। आशंका से मन कांप उठा। मैंने बच्ची को जहां छोड़ा था, उसी ओर तेजी से लौटी। बच्ची और गार्ड दोनों वहां नहीं थे। मैंने आसपास मौजूद लोगों से उस बच्ची के बारे में पूछा तो उन्होंने दूसरी ओर जाने का इशारा किया। मैं उस ओर भागती हुई गई। थोड़ी दूर जाने पर गार्ड दिखाई दिया, पर बच्ची उसके साथ नहीं थी। मेरे मन में आशंका पैदा हुई। दौड़ कर गार्ड के सामने पहुंची और आंखें तरेरते हुए बच्ची के बारे में पूछा। उसने हैरानी से मेरी ओर देखा और पिता का हाथ थामे जा रही बच्ची की ओर इशारा किया। मैं सकपका गई और चुपचाप वहां से आगे बढ़ गई। पीछे मुड़ कर देखने की हिम्मत नहीं हुई कि वह गार्ड वहां खड़ा रहा या चला गया।

मन अभी भी बच्ची पर अटका था। सवाल घुमड़ने लगे कि पता नहीं वह जिसका हाथ पकड़ कर जा रही थी, वह उसका पिता है भी या नहीं! लेकिन मैंने गार्ड के साथ जो किया उसके बाद जाकर पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी। आगे बढ़ती जा रही थी, लेकिन बच्ची की फिक्र ने मुझे पीछे खींच लिया। मैं बच्ची का हाथ थामे उस शख्स के पास पहुंची और थोड़ा सख्त होकर पूछा- ‘आप इस बच्ची के पिता हैं?’ उस व्यक्ति ने शक भरी निगाहों से मुझे घूरा और डपटते हुए कहा- ‘प्रमाण-पत्र दूं क्या? पहले गार्ड और अब तुम..!’ उसकी बात सुन कर मन तो यह भी हुआ कि उसे फटकार लगाऊं कि नन्ही-सी बच्ची को ऐसे कौन छोड़ देता है! जमाना इतना खराब है और आपका दिमाग भी! जानती हूं कि यह ज्यादा हो जाता, लेकिन जिस समय से हम गुजर रहे हैं वहां यह ज्यादा हो जाना ही ठीक है।

कैसा दौर आ गया है कि अब हर पुरुष पर शक होने लगा है। खासतौर पर बच्चियों को लेकर किसी पर भरोसा नहीं होता। किसी की भी बच्ची हो, उसकी सुरक्षा जरूरी है। लेकिन किसी को आहत करना शायद ठीक नहीं। मुझे गार्ड पर भरोसा नहीं हुआ, उस बच्ची के पिता पर भरोसा नहीं हुआ। शायद उन दोनों को भी मुझ पर भरोसा नहीं हुआ। वे भी सोच रहे होंगे कि मैंने बच्ची के मामले में इतनी रुचि क्यों ली! हम भरोसे के संकट से जूझ रहे हैं। फिलहाल शायद इसका कोई हल नहीं है। कौन है इसका जिम्मेदार? कहते हैं, भरोसा बहुत मुश्किल से बनता है और बहुत आसानी से टूट जाता है। आज भरोसे को क्रूरता से तोड़ा जा रहा है। ऐसे वक्त के बारे में सोच कर दिल दहल जाता है जब हम किसी पिता के साथ उसकी बेटी को देख कर सहमने लगें और भाई से बहन को दूर करने की जद्दोजहद में जुट जाएं!

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