जीवट और जिजीविषा के बूते

इक्कीसवीं सदी के दो दशक गुजर जाने के बाद भी अपने आसपास की स्त्रियों को जिस सामाजिक हैसियत में देखती हूं, वह दुखी जरूर करता है, लेकिन हैरान नहीं करता है।

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सांकेतिक फोटो।

इक्कीसवीं सदी के दो दशक गुजर जाने के बाद भी अपने आसपास की स्त्रियों को जिस सामाजिक हैसियत में देखती हूं, वह दुखी जरूर करता है, लेकिन हैरान नहीं करता है। कई बार लगता है कि स्कूल-कॉलेजों की डिग्री के लिए लोग अपने बच्चों को अच्छे से अच्छा इंतजाम करते हैं, ताकि उनके बच्चे सभ्य समाज में अपनी जगह बना सकें, लेकिन सामाजिक पैमाने पर वे अलग-अलग स्तरों पर पसरे भेदभाव, कुंठा और दुराग्रहों से कैसे दूर हों, कैसे वास्तव में सभ्य बनें, इसके प्रशिक्षण को लेकर माता-पिता कतई फिक्रमंद नहीं रहते।

जबकि एक पढ़ा-लिखा या आधुनिक दिखने वाला व्यक्ति अगर अपने विचार और व्यवहार में असभ्य और दमनकारी है, तो उसकी स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई की अहमियत शून्य मानी जानी चाहिए। मगर होता यही है कि सतही चमक-दमक को हम आधुनिकता और सभ्यता मान कर खुश हो लेते हैं। एक समय पूर्व के मैनचेस्टर के रूप में मशहूर कानपुर में हाल ही की एक घटना ने मुझे स्तब्ध कर दिया। एक लड़की ने बैंक की अच्छी-खासी नौकरी महज इसलिए छोड़ दी कि रास्ते में आते-जाते एक लड़का उसे बहुत परेशान करता था। उसकी फब्तियों और धमकी से तंग आकर उसने नौकरी छोड़ कर खुद को घर मे बंद कर लिया।

महिलाओं के खिलाफ आजकल जिस पैमाने की बर्बरताएं सामने आ रही हैं, उसमें हो सकता है यह घटना किसी को बहुत उद्वेलित न करे। लेकिन सच यह है कि इसी तरह के वाकयों से एक ऐसा समाज बन रहा है, जहां महिलाओं को नाइंसाफी और जुल्म का शिकार बनना पड़ता है। एक लड़की को आत्मनिर्भर बनने की मंजिल के सफर में कितने कठिन पड़ाव तय करने पड़ते हैं, यह कोई भी होशमंद व्यक्ति समझ सकता है। स्कूल-कॉलेज जाने के लिए शुरू हुई ये मुश्किलें नौकरी पाने तक चलती रहती हैं। सच यह है कि आज भी ऐसी तमाम लड़कियां हैं, जिनके परिवार वाले बहुत ज्यादा पढ़ाई के पक्ष में नहीं रहते। अगर घर-परिवार ने पढ़ने-लिखने दिया तो रास्ते से लेकर कार्यस्थलों तक पर न जाने कितने संघर्ष करने पड़ते हैं।

कितने जीवट और कितनी जिजीविषा के दम पर कोई लड़की एक-एक कदम करके आगे बढ़ती है और कोई एक व्यक्ति उसके सारे संघर्ष को मिट्टी में मिला देता है। अहमदाबाद में एक लड़की ने एक वीडियो में अपनी आपबीती बताई और उसके बाद नदी में कूद कर जान दे दी। एक रिवायत की तरह कई लोग उस लड़की को दोष देने उग आए कि अगर उसका पति एक बुरा इंसान था तो उसे अलग हो जाना चाहिए था… जान देने की क्या जरूरत थी। सही है कि किसी ऐसे व्यक्ति के लिए अपनी जान क्यों देना! लेकिन क्या हमारा समाज किसी घटना के बाद उपदेश बांचने से आगे बढ़ कर अपने घर से ऐसा प्रशिक्षण शुरू करेगा, जिसमें लड़कियां किसी अपराधी प्रवृत्ति के व्यक्ति के लिए जान देने के बजाय जीने के नया रास्ता गढ़ लें?

समाज की संरचना की हालत तो यह है कि हमारे आसपास के लोग लड़कियों की शादी को सबसे ज्यादा अहमियत देते है। अगर कोई लड़की पति को छोड़ने का फैसला करे तो यह बहुत बड़ा मसला हो जाता है। उसे ससुराल में कितने भी कष्ट मिलें, फिर भी निभाने की सलाह ही दी जाती है। आखिर ‘मायके से डोली, ससुराल से अर्थी’ जैसी कहावतें भी हमारे समाज में ही कही जाती हैं। ऐसी मानसिकता वाले परिवार या समाज में पली-बढ़ी और मानसिक रूप से तैयार हुई लड़की के किन चुनौतियों का सामना करती है?

दरअसल, स्त्री के संघर्ष पुरुषों से काफी अलग होते हैं। स्त्री ने आत्मनिर्भर होकर अगर आर्थिक रूप से एक मोर्चा फतह भी कर लिया, तो भी जब तक वह घर गृहस्थी को ‘ठीक से’ न संभाले, तब तक उसे ‘अच्छी औरत’ की गिनती में नहीं शामिल किया जाता है। क्या यह दबाव पुरुषों पर भी होता है? वह तो नौकरी कर रहा है, वही काफी है। उसे घर के कामकाज आते हैं या अच्छा खाना बनाना आता है या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। बच्चे की देखभाल का ज्यादातर जिम्मा मां पर ही होता है। जबकि एक नौकरी करने वाली स्त्री नौकरी के साथ सब तरह के दबावों से भी जूझती चलती है।

अपने जीवट से वह सारे काम कर भी लेती है। इसके बावजूद कोई उसका जीना दुश्वार कर दे तो हिम्मत कई बार जवाब दे दे सकती है। लगातार छेड़छाड़ और धमकी की वजह से नौकरी छोड़ने के पहले वह लड़की किस पीड़ा से गुजरी होगी, यह सिर्फ वही ठीक से समझ पा रही होगी। एक दुर्घटना में मेरे एक परिचित की आंखों की रोशनी चली गई। वे उस समय पढ़ाई कर रही थीं।

एक संपन्न परिवार से होने के नाते उन्होंने अपनी पढ़ाई अमेरिका से पूरी की और कई साल वहीं नौकरी की। वहां उन्हें हर स्तर पर सहयोग मिला। किसी ने उनसे यह नहीं कहा कि ‘एक तो लड़की ऊपर से दृष्टिबाधित, अब इसकी शादी कैसे होगी!’ वहां उनसे एक सामान्य इंसान की तरह आसपास के लोग पेश आए। ऐसा माहौल जो आत्मविश्वास दे सकता है, उसी के साथ उन्होंने नौकरी की और समाज में एक खास जगह भी बनाई। क्या हमारा समाज भी कभी ऐसा बन पाएगा, जो रास्ते के कांटे भले न चुने, लेकिन हमारा चलना मुश्किल न बनाए?

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