जीवन के सफर में

पंद्रह साल की आयु में स्कूल जाती हुई जो मासूम पाकिस्तानी लड़की तहरीके-तालिबान पकिस्तान के नृशंस हत्यारों की गोली का शिकार बन कर मौत के मुंह में जाने से किसी तरह बच गई थी।

मलाला यूसुफजई। फाइल फोटो।

अरुणेंद्र नाथ वर्मा

पंद्रह साल की आयु में स्कूल जाती हुई जो मासूम पाकिस्तानी लड़की तहरीके-तालिबान पकिस्तान के नृशंस हत्यारों की गोली का शिकार बन कर मौत के मुंह में जाने से किसी तरह बच गई, वही सत्रह वर्ष की होते-होते लड़कियों की शिक्षा के अधिकार की लड़ाई का इतना सुपरिचित चेहरा बन गई कि उसे शांति के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। देखते ही देखते मलाला यूसुफजई का नाम महिलाओं को हर प्रकार के बंधन से मुक्त होकर खुले आकाश में पंख पसारने का संदेश देने वाली विश्व प्रसिद्ध हस्तियों में शामिल हो गया।

अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कुर्बानी देने के लिए महिलाओं को तैयार करना जब उसके जीवन का मिशन बन गया तो दुनिया की अग्रणी महिला नेताओं की तरह उसकी तस्वीर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में अक्सर नजर आने लगी। फिर तो विवाह बनाम सहजीवन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भी मलाला के विचारों को उतनी ही प्रमुखता से संचार माध्यमों में जगह मिलनी ही थी। स्त्री विमर्श पर उसके मुक्त विचारों से क्षुब्ध पारंपरिक सोच वाले धार्मिक संगठनों की नजर में मलाला का वह वक्तव्य सबसे ज्यादा जहरीला था, जो पारंपरिक विवाह पर सवाल उठा कर पूछता है कि अगर आप अपने जीवन में एक व्यक्ति को चाहते हैं, तो विवाह के कागजात पर दस्तखत करना क्यों जरूरी है।

धार्मिक ग्रंथों और परंपरागत सोच में पापतुल्य सहजीवन को नारी स्वतंत्रता का परिचायक बताने वाला वक्तव्य काफी चर्चा में रहा, हालांकि पाश्चात्य देशों में सहजीवन एक आम प्रथा है। अब तो भारत के महानगरों में भी सहजीवन ऐसा अजूबा नहीं रह गया है कि उसका नाम सुन कर लोग चौंक पड़ें। पर सुर्खियों में रहने वाली मलाला का चेहरा इस बार एक लोकप्रिय ब्रिटिश पत्रिका के मुखपृष्ठ पर आया तो यह बता कर सबको चौंका गया कि सहजीवन को महिला स्वतंत्रता का परिचायक मानने वाली मलाला ने अपने लिए पारंपरिक निकाह की राह चुनी। मलाला पारंपरिक विवाह करें या उन्मुक्त सहजीवन का आनंद लें, यह उनका निजी मामला है, लेकिन स्त्री मुक्ति आंदोलन की इस प्रमुख चेहरे का यों अपनी राय से उलट काम करना एक पुरानी बहस के ऊपर पड़ी हुई राख को कुरेद गया है, जिससे कई महत्त्वपूर्ण सवाल फिर चिनगारियों की तरह निकल पड़े हैं।

भारत के कस्बों और छोटे शहरों के बेरोजगारी के मारे युवाओं को रोजी-रोटी की तलाश में महानगरों की तरफ पलायन करना पड़ रहा है। बड़े शहरों में मकानों के किराए आसमान छू रहे हैं। ऐसे में नई-नई नौकरी के वेतन में कुछ साथियों का साथ रह कर किराए का फ्लैट और वाहन साझा करना सुविधाजनक होता है। इस आर्थिक सुविधा के साथ आती है महानगरों की गुमनामी में डूब जाने से मिली स्वच्छंदता। नए परिवेश में पारंपरिक ढंग के बेमेल वैवाहिक संबंधों की कड़वाहट और पत्नी और बहू को मुफ्त में मिली ‘घरेलू कर्मचारी’ समझने वाली सोच के प्रति विद्रोह का संगम होता है खुली सोच वाले आधुनिक जीवनसाथी की आसान उपलब्धि से। सहजीवन के उन्मुक्त आकाश में खुल कर उड़ान भरने के इस विकल्प के सामने पुराने किस्म का दांपत्य जीवन फीका लगने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं।

शहर हों या गांव, निम्न आर्थिक स्थिति वाले परिवारों में सहजीवन पहले भी कोई अजूबा नहीं था। अब बड़े शहरों और महानगरों में अन्य आर्थिक वर्गों में भी इसे स्वीकार किया जा चुका है। कानून भी इस नई जीवन प्रणाली को स्वीकार करते हुए स्थायित्व जैसी सुरक्षा प्रदान करने के लिए राजी है। बच्चे के (अगर हुए) भविष्य को लेकर सहजीवन में संभव असुरक्षा अब कानूनन कम है। तो फिर ऐसा क्या दिखा करोड़ों सताई हुई लड़कियों को राह दिखाने वाली मलाला को कि वे उसी राह पर लौट गर्इं, जिसका उन्हें कोई औचित्य नहीं दिखता था। उनके सामने तो वे वजहें नहीं थीं, जो कुछ पर्यवेक्षणों के अनुसार आज भारत में फिर से युवाओं को संयुक्त परिवार की तरफ आकर्षित कर रही हैं।

शायद पाकिस्तान से आने वाली मलाला को ब्रिटेन की संस्कृति के पटल पर दिखते व्यवहारों ने इतना मुग्ध कर दिया था कि उसकी चकाचौंध में उन्हें पारंपरिक दांपत्य जीवन अर्थहीन कागजी कार्रवाई जैसा लगने लगा था। लेकिन अब तरुण महिला बन चुकी मलाला आक्सफोर्ड की स्नातक हैं और पाश्चात्य संस्कृति से इंसानों के जीवन में भरते हुए एकाकीपन के दंश को और तथाकथित खुली हवा में सांस लेते लोगों में बढ़ते हुए मानसिक रोगों की गहराई को शायद समझ पाई हैं। तारीफ तो करनी पड़ेगी कि उन्होंने अपनी नई सोच सार्वजनिक कर दी कि तात्कालिक और कुछ वक्त के संबंध और उसमें परिवार के विचार की जगह के बरक्स जीवन में साथ निभाने वाले तत्त्वों की अपनी अहमियत और जगह है। यों भी किसी एक विचार को आखिरी सच मानने से आगे बढ़ कर किसी नए विचार के सफर पर बढ़ने में कुछ भी गलत नहीं है।

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