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एक सभ्य समाज में

मणिपुर में मेहनतकश और समझदार स्त्रियां आम हैं। इसकी वजह यह होगी कि वहां सार्वजनिक गतिविधियों में महिलाओं के लिए ज्यादा और बेहतर मौके हैं। और मेरा मानना है कि जहां मौका मिलता है, वहां एक वंचित व्यक्ति अपनी क्षमता साबित कर ही देता है।

महिलाओं को बराबरी का हक किसी भी सभ्य समाज में आम होना चाहिए। (फोटो सोर्स ; Indian Express)

प्रकृति ने स्त्री और पुरुष के बीच लैंगिक आधार पर काम तय नहीं किए हैं। वह तो हमारे समाज की देन है। स्त्रियों को लेकर समाज अक्सर पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होता है। मसलन, वे नाजुक होती हैं, मेहनत के काम करने में थोड़ा पीछे रहती हैं, अकेली कहीं आना-जाना नहीं कर सकतीं। न ही अकेले घूम-फिर सकती हैं। प्लेटो, अरस्तू और रूसो जैसे दार्शनिकों ने कोमलता और भावुकता जैसे गुण स्त्री के लिए और वीरता और बल जैसे गुण पुरुषों के बताए हैं। स्त्री को शुरू से ही बौद्धिक रूप से श्रेष्ठ नहीं समझा गया। कई पुरुष उन्हें कमतर समझते हैं। उन्हें लगता है कि स्त्रियां बुद्धि और बल दोनों में ही उनसे कमतर हैं और इसी आधार पर स्त्रियों को नीचा दिखाने की कोशिश की जाती है। शहरों में तो फिर भी हालात एक हद तक सही, ठीक हैं। लेकिन अगर ग्रामीण और सुदूर इलाकों की बात करें तो स्थिति सही नहीं लगती, लेकिन पिछले दिनों एक सांस्कृतिक महोत्सव में शामिल होने के मकसद से जब मणिपुर जाना हुआ तो समाज में मौजूद कई धारणाओं के उलट बातें देखने को मिलीं। हालांकि देश के दूसरे हिस्सों औरखास तौर पर पूर्वोत्तर के राज्यों में तमाम महिलाओं ने अपनी मेहनत और ज्ञान से साबित किया है कि उनके बारे में पूर्वधारणाएं गलत हैं। लेकिन मणिपुर में मेहनतकश और समझदार स्त्रियां आम हैं। इसकी वजह यह होगी कि वहां सार्वजनिक गतिविधियों में महिलाओं के लिए ज्यादा और बेहतर मौके हैं। और मेरा मानना है कि जहां मौका मिलता है, वहां एक वंचित व्यक्ति अपनी क्षमता साबित कर ही देता है।

तो मणिपुर के सार्वजनिक जीवन में स्त्रियों की भूमिका और भागीदारी किसी जड़ व्यक्ति को विस्मित कर सकती है। उन व्यवसायों में भी उनकी मौजूदगी आम दिखी, जिन पर उत्तर भारत में पुरुषों का वर्चस्व माना जाता है। ज्यादातर दुकानों की मालकिन महिलाएं थीं। बल्कि वहां का इमा बाजार इसी बात के लिए मशहूर है। यह इंफल का सबसे बड़ा बाजार है, जहां सब्जी और फल से लेकर कपड़े और जूते तक सब कुछ मिलता है। करीब चार हजार दुकानों से सजे इस बाजार में सभी दुकानदार महिलाएं थीं, जिनकी उम्र अठारह साल से लेकर अस्सी साल तक थी। कई बुजुर्ग महिलाओं ने अपने साथ रेडियो रखा हुआ था और फिल्मों के गीत सुनते हुए मस्ती में सामान बेच रही थीं।

‘इमा’ शब्द मतलब है मां। इस बाजार में आकर ऐसा लगता है कि जैसे मां अपने बच्चों के लिए रोटी बनाने के साथ साथ सम्मान के साथ रोटी कमाती है। वहां लगभग पचपन साल की मूर्ति जी से मुलाकात हुई। यों वे राजस्थान के कोटपुतली की हैं पर इंफल में उनकी दुकान है, जहां वे कंबल बेचती हैं। जहां दिल्ली में सड़कों पर नजर पर जोर डालने के बाद कहीं कोई लड़की या महिला मोटरसाइकिल चलाती दिखती है, वहां मुझे लड़कियां धड़ल्ले से स्कूटी और कार चलाती दिखीं। इसके अलावा, मेरी मुलाकात एक के बाद एक कई स्वावलंबी महिलाओं से हुई, चाहे वे पर्यटकों को अपनी बैटरी कार में कंगला फोर्ट घुमाती पच्चीस वर्षीय मलेयम हो या बीस वर्षीय फीफी हो जो पढ़ने के साथ-साथ उत्सवों के मौके पर केले और आलूबुखारे से पेय बना कर बेचती हैं। कई जगह स्त्रियां अपने छोटे बच्चों को पीठ पर बिठा कर कपड़े से बांध कर अपने रोजमर्रा के काम निपटाती नजर आर्इं। उत्तर भारत के लिए ये बातें खास होंगी, लेकिन वहां के लिए आम थीं।

मैं जिन विमानों से दिल्ली से मणिपुर गई और आई, उनकी पायलट महिला ही थीं। वहां से दिल्ली लौटते समय जब विमान में महिला पायलट के नाम की उद्घोषणा हुई तो मणिपुर से इतने सारे अनुभव लिए मैं मैरी कॉम, दीपा कर्मकार, कल्पना चावला, अरुणिमा सिन्हा या अवनि चतुर्वेदी के बारे में सोच रही थी। ये उन बहुत से नामों में से कुछ हैं जिनकी कामयाबी के बारे में हम सब जानते हैं। इनके अलावा भी ऐसी कितनी ही महिलाएं हैं, जिनकी कामयाबियों और कारनामों को शायद हम कभी न जान पाएं, मगर वे सब अपने क्षेत्र में अव्वल हैं और खामोशी से अपना काम करते हुए स्त्रियों की दुनिया और अपने देश के उत्थान में अपनी भूमिका निभा रही हैं। हां, यह सच है कि देश भर में पत्रकार, लेखक, डॉक्टर, इंजीनियर, अफसर, क्लर्क या फिर किसी व्यवसाय में लगी तमाम महिलाएं भी इसी मुहिम का हिस्सा हैं, जो चुपचाप घर और बाहर, दोनों ही मोर्चों पर अपना काम कर रही हैं। स्त्रियों को अगर अधिकार के रूप में थोड़ा सम्मान और समाज का साथ मिल जाए तो ये क्या नहीं कर सकतीं! यह अलग बात है कि हमारे देश और दुनिया के बहुत सारे हिस्सों में आज भी आगे बढ़ती और कामयाबी के परचम लहराती महिलाएं खास लगती हैं। जबकि हर स्तर पर महिलाओं को बराबरी का हक किसी भी सभ्य समाज में आम होना चाहिए।

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