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किस दिवस का कितना महत्त्व- मित्रता दिवस, रक्षा बंधन और स्वतंत्रता दिवस

अगर इसकी अलग-अलग व्याख्या न कर सामान्य रूप से कहें तो मनुष्य को अपनी जड़ से लगाव और रक्षा बंधन के रूप में अपने खून के रिश्तों से प्रेमपूर्ण व्यवहार को जाहिर करना मन को सुकून देता है। जन्म के रिश्ते बने-बनाए होते हैं, जबकि दोस्त व्यक्ति अपने मन से चुनता है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

इसे संयोग कहा जाएगा, मगर यह तथ्य है कि इस साल के अगस्त महीने में मित्रता दिवस, रक्षा बंधन और स्वतंत्रता दिवस, तीनों आए। किस दिवस या त्योहार का कितना महत्त्व है, अगर इसकी अलग-अलग व्याख्या न कर सामान्य रूप से कहें तो मनुष्य को अपनी जड़ से लगाव और रक्षा बंधन के रूप में अपने खून के रिश्तों से प्रेमपूर्ण व्यवहार को जाहिर करना मन को सुकून देता है। जन्म के रिश्ते बने-बनाए होते हैं, जबकि दोस्त व्यक्ति अपने मन से चुनता है। अपने जैसे व्यक्ति के साथ जुड़ना और खुलना उसे पूर्णता का अहसास कराता है। जीवन का एक अन्य जरूरी पक्ष सभी के लिए स्वतंत्रता का सम्मान और उसकी निजता है। स्वतंत्रता दिवस इस महत्त्वपूर्ण पक्ष की याद दिलाता है। समानता, न्याय और आगे बढ़ने के लिए समान अवसर इसकी महत्त्वपूर्ण कड़ी में शामिल हैं। सभी को बेहतर जीवन के लिए अनुकूल माहौल और सुविधा मिल पाए, यह हर किसी की तमन्ना होती है और यही स्वतंत्रता का लक्ष्य भी है।

हमारे देश को आजाद हुए सत्तर वर्ष हो गए और इसके लिए तो न जाने समाज के कितने हिस्सों ने अपने स्तर पर कितना योगदान दिया, कितने लोग शहीद हुए, तब जाकर यह आजादी हासिल हुई। आज भी उस आजादी को बरकरार रखने के लिए विभिन्न रूपों में देश के आम नागरिक, सैनिक, सिपाही और दूसरे सहयोगी शामिल हैं। लेकिन अपने देश का ही एक अफसोसनाक सच यह भी है कि समय-समय पर कुछ ऐसी कमियां दिख जाती हैं जो स्वतंत्रता की अवधारणा पर सवाल खड़ा करती हैं, मसलन, जाति और मजहब के नाम पर तनाव, भाषायी और सांस्कृतिक समस्या, वर्ग भेद वगैरह। इन कुछ घटनाओं के बावजूद सवा सौ करोड़ से ज्यादा की विशाल आबादी वाले अपने देश में अगर लोकतंत्र कायम है तो यह हमारी उपलब्धि ही है। सभी को अपनी पसंद से जीने के तरीके के चुनाव का, बिना लिंग, जाति-धर्म भेद के व्यवसाय चुनने और देश के किसी भी कोने में रहने और यात्रा करने अधिकार है।अपनी क्षमता के हिसाब से भोजन और जीवन साथी चुनने का भी हक है, अंतरजातीय या अंतरधार्मिक शादियों के तमाम उदाहरण मिलते हैं।लेकिन एक सच यह भी है कि आज भी देश में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। समाज में कमजोर तबकों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है और व्यवहार में इनके लिए अपने अधिकारों का उपयोग कर पाना इतना आसान नहीं है। हालांकि सबको अपने हकों के लिए आखिर खुद ही मजबूत करना पड़ता है, वह समाज में कमजोर जातियां और तबके हों या फिर महिलाएं। हाल ही में एक वरिष्ठ लेखक मित्र ने एक बहस के दौरान कहा कि महिला अगर कमतर स्थिति में है तो उसे खुद को उभारना और सक्षम बनाना चाहिए।

मेरा भी मानना है कि केवल उन्हें कोसने और खुद पर रोने से अब काम नहीं चलने वाला है। ऐसे नकारात्मक कार्यों में ऊर्जा बेकार करने से बेहतर है कि अपनी क्षमताओं के विकास पर ध्यान केंद्रित किया जाए। अपनी समस्याओं के लिए व्यवस्था पर सवाल उठाना जरूरी है, लेकिन उससे लड़ना भी हमारी जिम्मेदारी है। अब हम सबको डर कर या खुद को सीमित रखने के बजाय अपने रास्ते की बाधाओं को खुद ही दूर करना होगा। हम जिनके दमन के शिकार रहे, उनसे उम्मीद करके किसे कितना क्या मिला है, यह सब जानते हैं। खुद को लाचार महसूस करके दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय अगर अपने बूते खड़ा होने की कोशिश की जाए तभी किसी की मदद भी काम आएगी। अगर हम अपने स्वतंत्र देश के लिए आजादी की लड़ाई में योगदान देने वाली तमाम शख्सियतों को नमन करते हैं, देशवासियों के साथ जश्न मनाते हैं तो यही दिन यह सोचने का भी है कि हमारे समाज में जो लोग किन्हीं वजहों से पीछे और कमजोर रह गए, वे कैसे हमारे बराबर आ सकें।

जब हम इसी मसले पर सोचने बैठते हैं तो इसमें हमारे परिवार, दोस्त और हमारे समाज के सभी छूटे हुए लोग हमारी चिंता में शुमार हो जाते हैं। इस लिहाज से भी यह न केवल खून और दिल के नातों के प्रति अपनापन भरे पैगाम का, बल्कि खुद की पहचान और स्वतंत्रता-सुविधा बढ़ाने के लिए संकल्प लेने का भी महीना है। इसलिए हमारी कोशिश हो कि हम अपने साथ सबकी जिंदगी को बेहतर बनाने के बारे में सोचें। हर समाज के कुछ सफल लोगों की उपस्थिति और उनका जीवन दर्शन यही जताता है कि निष्ठा, लगन, मेहनत हो तो कुछ भी पाया जा सकता है। तमाम सफल लोगों में अमीरों के साथ-साथ गरीब मां-बाप के बच्चे भी शामिल पाए गए हैं। इसलिए किसी भी वजह से किसी को या खुद को कम समझने की जरूरत नहीं है।

दुनिया मेरे आगे- भरोसे की राह

 

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