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शहादत की छवियां

भारतीय वायुसेना में विमान चालकों और मार्ग निर्देशकों यानी ‘नेवीगेटर्स’ के हमारे बैच को 1965 के भारत-पाक युद्ध की पृष्ठभूमि में कमीशन मिला था।

भारतीय वायुसेना में विमान चालकों और मार्ग निर्देशकों यानी ‘नेवीगेटर्स’ के हमारे बैच को 1965 के भारत-पाक युद्ध की पृष्ठभूमि में कमीशन मिला था। ऐसा लगता है कि पलक झपकते आधी सदी बीत गई। इन पचास सालों में भारत बदला, भारतीय वायुसेना बदली, अगर कुछ नहीं बदला तो हमारे पूरे बैच का वायुसेना से गहरा लगाव। हमारे बैच के कुल एक सौ अस्सी सदस्यों में से कई साथियों ने सन 1971 के भारत-पाक युद्ध में जीवन की आहुति दी थी।

1987 से 1990 के बीच श्रीलंका के गृहयुद्ध में भारतीय शांति सेना के सदस्य के रूप में हमारे कुछ हेलिकॉप्टर चालक साथी शहीद हुए। 1998 के करगिल संघर्ष में वायुसेना की कोई बड़ी भूमिका नहीं थी। तब हमारे साथी युद्धक्षेत्र में सक्रिय होने के बजाय ऊंचे पदों से युद्ध संचालन में व्यस्त थे। सेना के अन्य अंगों की तुलना में वायुसेना में युद्ध के बिना ही विमान दुर्घटनाओं में कई हवाबाज मारे जाते हैं। नतीजतन, हम एक सौ अस्सी साथियों की संख्या सिमट कर एक सौ छह रह गई है। कुछ के विदेशों में बस जाने के बाद भारत में अब केवल पनचानबे बचे हैं।
सेवामुक्त होकर हम भारत के सुदूर कोनों में बिखर गए, पर आपसी संपर्क बना हुआ है। ऐसे में कमीशन मिलने की स्वर्ण जयंती मनाना भला हम कैसे भूलते! महीनों तक इंटरनेट आदि पर कई कार्यक्रम बने और बिगड़े। हम भारत के कोने-कोने से परिचित हो चुके हैं। कुछ नया करने के लिए तय हुआ कि यह स्वर्ण जयंती विदेश में मनाएं। इसलिए कोई पड़ोसी देश चुनना था। पाकिस्तान का प्रश्न नहीं था, बांग्लादेश से हम सन 1971 से परिचित थे, नेपाल अपनी परेशानियों में उलझा है, इसलिए नजरें श्रीलंका पर आकर टिकीं।

श्रीलंका में तमिल और सिंहली समुदायों का वैमनस्य 1983 आते-आते भीषण गृहयुद्ध में बदल गया था। पूरे छब्बीस वर्षों तक तमिल ईलम के गुरिल्लों और श्रीलंका की फौजों के बीच हुए गृहयुद्ध में लाखों नागरिक मारे गए और बेघर हुए। अंत में 2009 में तत्कालीन राष्ट्रपति राजपक्षे के नेतृत्व में श्रीलंका की सेनाओं ने जेनेवा कन्वेंशन की सारी मर्यादाएं तोड़ कर लाखों असैनिकों की नृशंस हत्या कीं तो तमिल टाइगर्स को हथियार डालने पड़े। भारतीय सेनाओं के हस्तक्षेप से इस गृहयुद्ध में अनावश्यक रक्तपात को रोकने के प्रधानमंत्री राजीव गांधी के निर्णय के फलस्वरूप भारतीय सेनाओं को भी हजारों सैनिकों की बलि चढ़ानी पड़ी। इधर तमिल गुरिल्लों ने इसे भारत द्वारा अपनों के प्रति विश्वासघात माना, उधर सिंहली नजर में हमारी सेनाएं विदेशी आक्रमणकारियों से कम नहीं थीं।

श्रीलंका में भारतीय शांति सेना द्वारा 1987 से 1990 के बीच हस्तक्षेप के दौरान हमारे कुछ साथियों ने ऊंचे पदों से युद्ध संचालन किया था। कई ने सक्रिय रूप से हेलिकॉप्टरों और भारवाही विमानों में उड़ानें भरी थीं। इसलिए श्रीलंका से हमारा भावनात्मक लगाव भी था। हरे रंग के रत्न ‘पन्ना’ जैसे इस सुंदर द्वीप के समुद्र तटों पर इठलाती लहरों, उन पर झुके नारियल कुंजों, हरे-भरे वनों से ढंके हुए मैदानी क्षेत्रों और पर्वतीय ढलानों पर गलीचे जैसे बिछे चाय बागानों का सौंदर्य निहारने तमाम पर्यटक श्रीलंका जाते हैं। कैंडी में भगवान बुद्ध के दांत वाला बौद्ध मंदिर और अनुराधापुर में राम कथा से जुड़ी किंवदंतियां बौद्ध और हिंदू पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं।

पर हम फौजियों के लिए कोलंबो का आइपीकेएफ (भारतीय शांति सेना) स्मारक सबसे पावन तीर्थ था। शहीद भारतीय सैनिकों को समर्पित इस स्मारक को कोलंबो में बनाने का निर्णय सन 2008 में राष्ट्रपति प्रेमदास ने लिया था, लेकिन 15 अगस्त 2010 को जब भारतीय उच्चायुक्त के हाथों इसका उद्घाटन हुआ तो श्रीलंका सरकार का कोई प्रतिनिधि उस समारोह में नहीं आया था। फिर भी हम अवकाशप्राप्त फौजियों ने जब श्रीलंका में अपने ‘मिलिटरी अटैची’ (सैन्यदूत) के जरिए इस स्मारक पर सैन्य शैली में पुष्पचक्र अर्पित करके श्रद्धांजलि देनी चाही तो पूरी सहायता मिली। इस गरिमामय स्मारक की काली ग्रेनाइट शिला पर भारतीय सेनाओं के बारह सौ शहीदों के नाम उत्कीर्ण हैं।

उस पर जब हमने पुष्पांजलि अर्पित की तो श्रीलंका नौसेना की एक छोटी टुकड़ी ने ‘उलटा शस्त्र’ की मुद्रा धारण की। बिगुल ने ‘लास्ट पोस्ट’ की करुण धुन बजाई। हमने फौजी सलाम करके अपने उन बिछुड़े हुए साथियों को याद किया। ‘होम करने में जले हाथों’ की इस मिसाल को नम हो रही आंखों से हमने निहारा तो मन में प्रश्न उठा- ‘शहीदों की मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा’ तो ठीक है, पर जो विदेश में शहीद हुए, वे क्या स्वदेश के लिए कुछ कर गुजरे, या केवल इसलिए मरे कि उनका धर्म प्रश्न करना नहीं, केवल करना या मरना होता है?

 

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