उपेक्षा की कड़ियां

बहुत पुराने समय से यह माना जाता रहा है कि शैशवास्था मां की छाया में बीतना चाहिए।

सांकेतिक फोटो।

सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

बहुत पुराने समय से यह माना जाता रहा है कि शैशवास्था मां की छाया में बीतना चाहिए। लेकिन आजकल के कारपोरेट शिक्षण संस्थान इसे नए सिरे से परिभाषित करने पर तुले हैं। वे बच्चे की महत्त्वपूर्ण जीवन अवस्थाओं- शैशव, बाल, किशोर सब पर कुंडली मार कर बैठे हैं। यही बच्चा जब बड़ा होकर अपने बीते जीवन में झांक कर देखेगा तो उसे उसके सिवाय वह सब कुछ दिखाई देगा, जिसे वह कभी चाहता नहीं था। शिक्षा बदलाव का पर्याय होना चाहिए, न कि शोषण का स्थायी पता। दस से बारह घंटे पाठशाला में बच्चों को ऐसे रखा जाता है, मानो पाठशाला में उसे पिसा जाना हो। पूरा दिन बच्चे को इस तरह पिसना पड़ता है कि शाम तक वह नीरस हो जाता है। उसे कुछ हासिल नहीं हो पाता।

दरअसल, यह शिक्षा ही ऐसी है कि वह उसे बच्चा छोड़ कर सब मानने पर तुली है। इसका दुष्प्रभाव बच्चों में शारीरिक और मानसिक रूप से देखने को मिलता है। पढ़ाई के नाम पर हम बच्चों को क्या सिखा रहे हैं? बच्चा कहने को तो पढ़-लिख कर बड़ा हो जाता है, लेकिन उसके भीतर सम्मान से लेकर संवेदना तक की क्या जगह बच जाती है? ऐसी शिक्षा का होना, न होना कोई मायने नहीं रखता है। कबीर के समय को लेकर लिखे विरोधाभासी दोहों, मसलन, ‘काल करै सो आज कर, आज करै सो अब’ और ‘धीरे-धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय’ पंक्तियों को बच्चा पढ़ तो लेता है, लेकिन दोनों के बीच अंतर नहीं बता पाता। हमारी शिक्षा बच्चों को इंजीनियर, डॉक्टर, कलेक्टर और न जाने क्या-क्या बनाने की क्षमता रखती है, लेकिन वही शिक्षा उसे मानुष से अमानुष क्यों बनाती है?

वर्तमान की शिक्षा से पले-बढ़े संतानों के बीच वृद्धों की स्थिति दयनीय होती जा रही है। हमारे घर के पास एक बुजुर्ग बाबा रहते हैं। एकदम सूखे पेड़ की तरह। न उनके पास पंछियों की तरह लोगों का तामझाम है, न ही कोई कलरव। हां, उनकी घर में क्या कद्र है, यह किसी से भी पूछा जा सकता था। कमाल कि बात यह थी कि लोग उनसे औपचारिकता के लिए कुछ पूछ लेते थे, लेकिन वहीं बैठे एक कुत्ते को जरूरत से ज्यादा पुचकारते थे, रोटी खिलाते थे। वे बुजुर्ग जब युवा थे, तब पत्नी खयाल रखने के फेर में उन्होंने अपने मां-बाप की घोर उपेक्षा की थी। कहते हैं दुनिया गोल है। घूम-फिर कर वहीं आना होता है। यों भी, दुनिया अंदर-बाहर का ही खेल है।

कहते हैं कि एक जैसे स्वभाव वाले लोगों के बीच दोस्ती बहुत जल्दी होती है। मैंने जिन बाबा का जिक्र किया, उनकी तरह पड़ोस में एक और बाबा रहते थे। यह आमतौर पर एक हकीकत है कि एक सताया हुआ व्यक्ति दूसरे सताए हुए का हमदर्द होता है। जैसे गणित में ऋण गुणा ऋण धन होता है। एक दिन दोनों साथ बैठे थे और इधर-उधर की बात चली तो दोनों अपने-अपने घरों की बात छेड़ बैठे। पड़ोस वाले बाबा ने कहा कि मैं बड़ा किस्मत वाला हूं। कल मुझे बहुत दिनों के बाद मेरा मनपसंद भोजन खाने को मिला। अक्सर मेरी पत्नी मेरे लिए बनाती थी। जब से वह गई, मेरे लिए खाना-पीना ही दुश्वार हो गया। पहले तो खाना भी नहीं मिलता था। मिला भी तो हर बार मैं पत्नी को याद करता था। जिंदगी भर बच्चों को पढ़ाता रहा कि हमें भोजन के लिए जीवन नहीं, जीवन के लिए भोजन करना चाहिए। आज मैं अपने कहे से ऐसे पलट कर जी रहा हूं, जैसे मैंने कभी कहा ही नहीं था। यों भी आज की शिक्षा में उसूलों को पीठ दिखा कर जीने वाले ही महान कहलाते हैं। बुढ़ापा एक गोदाम की तरह है। यहां यादों की गठरियां पड़ी-पड़ी सड़ती रहती हैं, जिसे न तो महसूस किया जा सकता है और न ही जिया जा सकता है।

यह सुन पहले वाले बाबा ने कहा कि तुम किस्मत वाले हो। तुम्हें कभी-कभार मनपसंद भोजन मिल भी जाता है। मुझे मेरे घर वाले खाना तभी सहजता से देते हैं, जब मात्रा से अधिक पक जाता है। अक्सर मुझे भूख का सामना करना पड़ता है या किसी अन्य से दयाभाव के रूप में मिले खाने से गुजारा करना पड़ता है। इंसानों के बीच अपने परिवार से लेकर रिश्तेदारों और आस-पड़ोस के लोगों तक का साथ देख चुका। कई बार लगता है कि इंसानों से अच्छी दोस्ती तो जानवर निभा लेते हैं। पुराने दिन याद आते हैं जब मैंने अपने माता-पिता को उनका हक नहीं दिया। अब मुझे वही दिन जीने पड़ रहे हैं। अफसोस जरूर होता है अपने पहले के बर्ताव पर, लेकिन मैं अब उन दिनों को वापस नहीं लौटा सकता। यह भूख होती है कि कम से कम आने वाली पीढ़ी को वैसी संवेदनहीनता से बचाया जा सके। लेकिन जो बर्ताव मैंने अपने माता-पिता के साथ किया था, वैसा ही मेरे बच्चे और परिवार के लोग कर रहे हैं। क्या यह सिलसिला कभी खत्म होगा? यह सब कहते हुए बाबा की आंखों से आंसू बह रहे थे।

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