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आत्मविकास की ओर

रोजमर्रा की जिंदगी के बीच अपने आसपास दो साथियों के बीच इस तरह की प्रतिक्रिया से हम अनजान नहीं होंगे, जिसमें एक व्यक्ति दूसरे को कहता है- ‘क्या कहा? मैं खुद को बदलने की कोशिश करूं!

सांकेतिक फोटो।

पल्लवी विनोद

रोजमर्रा की जिंदगी के बीच अपने आसपास दो साथियों के बीच इस तरह की प्रतिक्रिया से हम अनजान नहीं होंगे, जिसमें एक व्यक्ति दूसरे को कहता है- ‘क्या कहा? मैं खुद को बदलने की कोशिश करूं! मुझमें ऐसी कौन-सी कमी है? कमी मुझमें नहीं, तुममें है।’ ऐसे आरोप-प्रत्यारोप की आवाजों के भीतर जाने कितने खूबसूरत रिश्ते बेमौत मर जाते हैं। अगर हम दोनों पक्ष से अलग-अलग बात करें तब दोनों सही लगेंगे, लेकिन फिर भी रिश्ते में तनाव आ जाता है। इसका कारण क्या है? एक वाक्य में निर्णय सुनाना हो तो हम सब कहेंगे कि इस रिश्ते को फलां के अहंकार ने खत्म कर दिया। अगर यह सच है तो आखिर इस अहंकार की वजह क्या है? दरअसल, किसी इंसान के अंदर उपजा श्रेष्ठता का भाव ही अहंकार की असली वजह है। अहंकारी व्यक्ति समझ ही नहीं पाता कि उसका आत्मसम्मान कब अहंकार में बदल गया।

आजकल एक नया चलन शुरू हुआ है- ‘मैं जैसा हूं/ जैसी हूं… सबसे बेहतर हूं।’ यह बात अगर आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए है, तो बहुत अच्:ी है, लेकिन अगर हम इसकी आड़ में किसी और के दर्द का कारण बन रहे हैं तो हमें सोचना होगा। अगर हम हर स्थिति में सही हैं तो क्या फर्क रह गया हममें और उस शिक्षक में, जिसने बच्चों को मार-पीट कर पढ़ाना ही पढ़ाने का सही तरीका माना! क्या फर्क रह गया हममें और उस सोच में, जिसमें कमजोर और वंचितों के दर्द को उनकी किस्मत कह कर अनदेखा किया गया! और क्या फर्क रह गया हममें और उस मानसिकता में जिसमें लड़की को खुली तिजोरी, पराया धन, सफेद चादर, हीरा आदि की उपाधि देकर उसके हाड़-मांस के तन और कोमल मन का अस्तित्व ही नकार दिया गया।

हम इस नए चलन को अपने बच्चों में भी भर रहे हैं। उन कच्चे घड़ों को ‘यू आर द बेस्ट’ और ‘प्राउड आॅफ यू’ जैसे वाक्यांशों से भरते जा रहे हैं। सरलता और विनम्रता की जगह हमने उनमें श्रेष्ठता के अहंकार के बोध के कंकड़ डाल दिए हैं। क्या हम कभी सोचते हैं कि ऐसे बच्चे आगे चल कर अपने परिवार और समाज को क्या देंगे। जब उन्हें हर स्थिति में खुद को सही समझने की आदत पड़ जाएगी, तब समझौता जैसा शब्द उसके अहं को कभी मंजूर नहीं होगा। जब भी हमें खुद पर या खुद से जुड़ी किसी भी चीज पर घमंड या गर्व की अनुभूति होने लगती है, हम बदलाव की खिड़कियों को बंद कर देते हैं। श्रेष्ठता का बोध हमें खुद से अलग इंसान को कमतर समझने को विवश करता है।

अगर हमको लगता है कि हमारी बेफिक्री दूसरों के चिंतित रहने से बहुत अच्छी है तो जाने-अनजाने हम अपने आसपास के लोगों की चिंताओं को समझना बंद कर देते हैं। हमारा बेफिक्र या मनमौजी स्वभाव का होना बहुत अच्छा है, लेकिन अपने इस स्वभाव के कारण खुद को श्रेष्ठ समझना और खुद से जुड़े लोगों की परेशानियों को न समझ पाना गलत है।

मुझे अपने बचपन की घटना याद आती है मेरी कक्षा में तीन लड़कियां पढ़ाई से लेकर दोपहर के खाने तक साझा करने वाली पक्की सहेलियां थीं। एक बार हमारी कक्षा में वर्ण-व्यवस्था के कर्म आधारित रूप को समझाया जा रहा था। कक्षा समाप्त होने के बाद हम सब सहेलियां इसी विषय पर चर्चा करने लगीं कि अब इस युग में वर्ण-विधान का कोई अर्थ नहीं बचा है। अगर आज भी कर्म के अनुसार वर्ण व्यवस्था होती तो हम सबका वर्ण अलग होता! चर्चा हंसी-मजाक के बीच हुई, लेकिन एक सहेली को एक बात चुभ गई और उसने अपनी राय जाहिर की कि स्वाद के लिए जानवरों का मांस खाने वाले उच्च वर्ण के नहीं हो जाएंगे, चाहे कर्म कितने भी अच्छे हों।

शाकाहारी होना सुंदर बात है, लेकिन हमारे अंदर उसके कारण उपजी श्रेष्ठता का भाव उस सुंदरता को खंडित कर देता है। यही बात धर्म पर भी लागू होती है। हमारा धर्म सब धर्मों से श्रेष्ठ है, यह मानना मानवता के विरुद्ध है। मानव का विकास परिवर्तन की अवधारणा पर टिका हुआ है। इसलिए खुद पर गर्व करने से बेहतर है खुद को प्यार करना सीखा जाए और हम जिनसे प्यार करते हैं, उनके स्वरूप को सुंदर बनाएं। यह हमारी जिम्मेदारी है। खुद को प्यार करना हमें खुशी की अनुभूति कराता है और अपने आप पर गर्व करना हमारे अहंकार को तृप्त करता है। श्रेष्ठता के अहंकार पैमाना कुछ भी हो, गलत है।

एक नजर में लगता है कि खुद को सर्वोपरी रखने वाला इंसान बहुत सकारात्मक होता है, लेकिन जब हम करीब से देखेंगे तब पता चलेगा कि उसने अपने ऊपर एक आवरण चढ़ाया हुआ है। वास्तव में वह अंदर से बेहद कमजोर और हीन भावना से ग्रस्त है। सामान्य-सा दिखने वाला जीवन भी कई परतों से घिरा होता है। जीवन यात्रा लंबी हो या छोटी, पर विकासोन्मुख होनी चाहिए। उसके लिए सीखने की प्रक्रिया जरूरी है। हम इस ब्रह्मांड की बहुत छोटी-सी शय हैं। हमारा अस्तित्व एक चुटकी भर राख के अलावा कुछ नहीं है। हमने अपनी आत्मा पर दुनियादारी की लेप चढ़ा ली है। जबकि दया, करुणा, प्रेम ही मानवता की प्रथम शर्त हैं और ये वे लेप हैं, जिनको लगाने से हमारा स्व सुगंधित होता है। अपनी आत्मा को इस भीनी खुशबू से धोते रहना चाहिए।

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