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गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता

गुलमोहर का पेड़ और उसका अनिंध्य सौंदर्य कोई पहली बार नहीं देखा था, पर अचानक पसीने से लथपथ मुखड़े पर मुस्कान खिल गई।

हरीश चंद्र पांडे

कुछ दिन पहले दोपहर के समय गांव के स्कूल से एक हस्तशिल्प प्रदर्शनी देखकर लौट रहा था, तो एक मैदान मे गुलमोहर का बड़ा दरख्त देखा। यों गुलमोहर का पेड़ और उसका अनिंध्य सौंदर्य कोई पहली बार नहीं देखा था, पर अचानक पसीने से लथपथ मुखड़े पर मुस्कान खिल गई। कोई तरंग उठी जो वहां दो पल बैठने-रुकने को व्यग्र कर रही थी। न तो इन फूलों में कोई सुगंध और न कोई संकोच या लज्जा थी। कैसे बिंदास लालिमा के संग फल-फूल और फैल कर गर्मी के सहचर बने हुए ये गिलहरी, तोते, कबूतर, गिरगिट, छिपकली- सबके लिए प्रीतम किसी से कोई छल-कपट नहीं। सचमुच हर किसी में गुलमोहर होने की कुव्वत नहीं है। अगर कोई पशुपालक यहां आसपास होता तो इसके मजबूत तने में बछड़ा या बकरी को बांध कर, एकदम निश्ंिचत, गुलमोहर के भरोसे अपना बाकी काम करने चल देता।

अब इस तीक्ष्ण गर्मी में कुदरत की यह हरी-लाल नेमत को देखा जाए तो मन खुश हो जाता है। उस समय भी बिल्कुल ऐसा ही हुआ, मानो आकाश ने अपनी लाल मुट्ठी को एक जगह पर खोल दिया हो। घर पहुंच जाने की जल्दी थी, पर कदम उसे देख कर ठहर गए। इसके इतने मनोहारी फूल ऐसे लग रहे थे, जैसे आनंद और उमंग के संदेशवाहक हो। लग रहा था कि धूप का तपता हुआ माथा इन फूलों ने चूम कर शीतल कर दिया हो।

चटकीले लाल-नारंगी रंग के फूल ऐसे लगते, मानो सूरज से इसे रंग मिला और चांदनी से यह अनोखी शीतलता, जो इसे देखने वालों की आंखों से उनके जिगर तक को तर कर देती है। अब आजकल तो लगभग सभी बच्चों के पास काफी घर के भीतर ही खेलने वाले खेल हैं और गांव-देहात में भी बच्चे मोबाइल पर ही व्यस्त रहते हैं। सबके पास तकनीकी साधन हैं और बाहर झांकने की न फुरसत है, न जरूरत। पर हमारे बचपन मे ऐसा माहौल था कि गांव के एक बड़े मैदान में सहजन, नीम, इमली और दो गुलमोहर के पेड़ भी थे।

उसमें से एक के मोटे तने पर रस्सी लपेट कर हम बच्चे झूला बना लेते और उसकी छांव में बस बच्चों का ही हक होता। दूसरे की छाया में दरी, चटाई, खाट बिछा कर बड़े लोग लेटे रहते और दोपहर की नींद का आनंद लिया करते थे। कौन-सा गुलमोहर बच्चों का है, इसका अंदाजा आसानी से लग जाता था, क्योंकि इमली के बीज, सूखे बेर, कैरी की गुठलियां, कुछ नहीं खाए गए शहतूत, जंगली जलेबी, गुलेल, टायर, कंचे और कुछ बिखरे हुए कच्चे फालसे यह साफ घोषणा कर देते थे कि बच्चों का गुलमोहर तो पक्का यही रहा। आजकल तो सड़कों का सौंदर्य सौ गुना कर रखा है इस गुलमोहर ने।

इन दिनों तो हर मोड़ पर चौराहे पर पार्क में हर जगह फूलों से लदे हुए गुलमोहर ही गुलमोहर हैं। पर यह गुलमोहर मधुमक्खी के छत्तों से अलंकृत भी था। एक दो नहीं, पूरे तीन छत्ते और बहुत ही दर्शनीय। छत्तों का यह चित्रपट इतना मनोरम था कि इसकी परिक्रमा भी कर डाली और उस हरितिमा भरी ओट ने थकान मिटा दी। चिलचिलाहट भरी गर्मी में यह कुदरत का सौंदर्य इतना मनभावन था कि बार-बार देखकर मन नहीं भर रहा था।

ऐसा लग रहा था कि इस गुलमोहर के पत्ते तक में मिठास भरी होगी, इसीलिए इतनी हजारों की तादाद में मधुमक्खी का दल-बल यहीं अपना शिविर लगाकर शहद का उत्पादन कर रहा है। वैसे बचपन मे एक निबंध में पढ़ा था तो याद रह गया कि गुलमोहर के फूलों का पराग बहुत ही जायकेदार होता है, इसीलिए मधुमक्खी इसे इतना पसंद करती है। यों एक बार एक उच्च मार्ग पर ढाबे में किसी ने गुलमोहर को देखकर कहा था कि इसके फूलों का शर्बत भी बहुत स्वादिष्ट होता है।

यह सच भी होगा, क्योंकि बचपन में हम लोग भी इसके फूल पानी से धोकर चबाकर खा लेते थे। पर यह सब बचपन की ही बात हुआ करती थी। आजकल सैकड़ों दुकानों में इसकी फलियों का गोद आसानी से मिल जाता है जो मिठाई और हलवे में और सुपारी कूट कर बनाई जाने वाली दवा प्रयुक्त होते खूब देखा ही है। आयुर्वेद के जानकार अक्सर कहते हैं कि सुपारी का बारीक चूर्ण और गुलमोहर का गोद साथ मिलाकर लिया जाए तो यह कमर दर्द को कम करता है।

कहा जाता है कि यह मूल रूप से भारतीय वृक्ष नहीं है। इसे सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में सुदूर दक्षिण भारत मे पांडिचेरी में अंकुरित किया गया। कुछ ही समय में यह उत्तर भारत आकर गर्मी के इस मौसम की पहचान बन गया। गुलमोहर को सिनेमा या कविता, हर जगह सबने सराहा है। टेसू या हरसिंगार किसी से होड़ नहीं, पर इसकी हर मन को दूर से ही थिरका देने वाली भावप्रवण पहचान ऐसी कि इसने अपने लिए खूब तारीफ और आदरभाव अर्जित किया। अब बार-बार यही लगता है कि यह गुलमोहर न हो, तो गर्मी का क्या होगा!

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