ताज़ा खबर
 

प्रतिभा की पहचान

विश्व में करीब आठ सौ करोड़ आबादी में किसी भी दो व्यक्ति के चरित्र और गुणसूत्र आपस में नहीं मिलते। यही कारण है कि हर व्यक्ति अपने आप में उम्दा, असाधारण और अद्भुत है।

Author Published on: May 20, 2019 1:17 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

श्रीप्रकाश शर्मा

चीन के महान दार्शनिक और विचारक कन्फ्यूशियस ने एक बार कहा था- ‘आप अपने लिए उस काम या नौकरी को चुनिए, जिसे आप प्यार करते हैं और तब आपको एक दिन के लिए भी काम करने की जरूरत नहीं पड़ेगी!’ आशय यह है कि जब किसी नौकरी या कॅरियर का चुनाव किसी व्यक्ति के जीवन के आधे हिस्से से भी अधिक समय तक साथ चलता रहता है तो ऐसी स्थिति में हमारे सामने एक अहम प्रश्न बार-बार उठ खड़ा होता है कि आखिर कॅरियर के चुनाव में तरजीह किसको दी जानी चाहिए- दिल को या दिमाग को! नौकरी से मिलने वाले पैसे, पद, सुविधा और पदोन्नति के आधार को या नौकरी के प्रति दिल में छिपे प्यार या आसक्ति को? अपने दिल की आवाज को अभिभावकों के दबाव को? दोराहे पर खड़ी आधुनिक युवा पीढ़ी के मुतल्लिक आज इस प्रकार के अनगिनत प्रश्नों पर गंभीर आत्मचिंतन की दरकार है।

इस हकीकत को हम आसानी से नहीं झुठला नहीं सकते हैं कि किसी व्यक्ति के लिए उसकी नौकरी महज उसके और उसके परिवार के लिए जीविका का माध्यम नहीं होता है, बल्कि यह उस परिवार के सभी सदस्यों के जीवन, दर्शन, विचार और मनोविज्ञान को भी प्रभावित करता है। अपने लिए एक अच्छे कॅरियर का चुनाव महज यह निर्धारित नहीं करता है कि कोई व्यक्ति अपने जीवन के निर्वाह के लिए किस प्रकार के रोजगार का चुनाव करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि व्यक्ति आने वाले वर्षों के लिए किस प्रकार के जीवन की योजना बनाता है, वह परिवार सहित अपने के लिए भी किस प्रकार की जीवन-शैली और जीवन के आदर्शों का चुनाव करता है। गला-काट प्रतियोगिता के वर्तमान दौर में इस मामले में चुनाव के लिए विद्यार्थी अजीब संघर्ष और मानसिक तनाव की अवस्था से गुजर रहा है तो हमें इस समस्या पर बड़ी संजीदगी से सोचने की जरूरत है। बच्चों पर कॅरियर के चुनाव के लिए अभिभावकों द्वारा अपनी मर्जी थोपी जाती है तो यह और भी विकट समस्या का रूप ले लेता है और कालांतर में बेशुमार पारिवारिक-सामाजिक समस्याओं का भी सबब बन जाता है। आज के भौतिकवादी समाज में जहां हर व्यक्ति किसी तांगे के घोड़े की तरह अपनी आंखों पर पट्टी बांधे एक-दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ में लगा हुआ है तो ऐसे में उत्कृष्ट और मनपसंद कॅरियर चुनाव का माकूल उत्तर अपने ही प्रश्न में विलुप्त हो जाता है। अपने बच्चे को पड़ोसी के बच्चों से आगे देखने और उसे रोजगार की दुनिया में मोटी तनख्वाह की नौकरी करते देखने की चाहत में हम सबसे यह तथ्य भूल जाते हैं कि इस दुनिया में हर व्यक्ति अपनी विलक्षण प्रतिभा के साथ जन्म लेता है।

विश्व में करीब आठ सौ करोड़ आबादी में किसी भी दो व्यक्ति के चरित्र और गुणसूत्र आपस में नहीं मिलते। यही कारण है कि हर व्यक्ति अपने आप में उम्दा, असाधारण और अद्भुत है। लता मंगेश्कर जब गाती हैं तो ऐसा लगता है गोया कानों में मिसरी घोली जा रही हो। उनके परिवार वालों ने अगर उनकी अंतर्निहित प्रतिभा का पहचान किए बगैर उन्हें डॉक्टर बनने या सरकारी नौकरी करने का दबाव डाला होता तो एक करिश्माई गायन प्रतिभा की हत्या हो गई होती। रवींद्रनाथ ठाकुर को स्कूल बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। वे प्रकृति को सबसे बड़ा शिक्षक मानते थे। वे प्रकृति को निहारते हुए विश्व के मशहूर दार्शनिक और साहित्यकार बन गए, जिनकी रचना नोबेल पुरस्कार से सम्मानित हुई। विश्व इतिहास के पन्ने ऐसे बेशुमार उदाहरणों से भरे हुए हैं जो महज इस सत्य को परिलक्षित करता है कि जीवन में सफलता की सबसे बड़ा कसौटी किसी व्यक्ति में स्वाभाविक प्रतिभा की पहचान करनी है। लेकिन अफसोस कि इक्कीसवीं सदी में जब सूचनाओं के समंदर के रूप में इंटरनेट तक हमारी पहुंच हर दिन और आसान होती जा रही है तो हम बच्चों को मशीन सरीखा और उनमें कुदरती काबिलियत को कंप्यूटर के सॉफ्टवेयर के रूप में तौले जाने का अपराध कर रहे हैं। यही कारण है कि किशोरों में अवसाद, मनोरोग और खुदकुशी की घटनाओं में सालों-साल इजाफा होता जा रहा है।

इस सत्य से शायद हम इनकार नहीं कर पाएं कि कॅरियर के चुनाव में पहला अधिकार विद्यार्थी का खुद का होना चाहिए। विवेकशील अभिभावक के रूप में हमें अपने संतानों को इस रूप में समझने की जरूरत है। कभी-कभी बच्चे को खुद यह पता नहीं होता है कि उनकी अपनी पहचान क्या है और उनमें कौन-सी प्रतिभा है जो उन्हें औरों से अलग और असाधारण बनाती है। यहां शिक्षक के साथ-साथ अभिभावकों की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है। लेकिन कई बार हमारी सोच काफी अवैज्ञानिक और गैर-मनोवैज्ञानिक होती है। कॉलेज और विश्वविद्यालय की फाइनल परीक्षाओं में निरंतर बढ़ती असफलता और बीच में पढ़ाई छोड़ने के आंकड़े एक बड़े खतरे की ओर इशारा करते हैं। देश में बदतर होती जा रही बेरोजगारी की समस्या से लेकर निरंतर क्षीण होते जा रहे नैतिक मूल्य देश के भविष्य के रूप में बच्चों के दोषपूर्ण कॅरियर चुनाव का प्रतिबिंब है।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगे: भूलते भागते क्षण
2 दुनिया मेरे आगे: सितारों की चमक
3 दुनिया मेरे आगे: जीवन की राह