पहचान का संकट

शहर पुराने समय से सभ्यता और संस्कृति के केंद्र रहे हैं।

सांकेतिक फोटो।

मीना बुद्धिराजा

शहर पुराने समय से सभ्यता और संस्कृति के केंद्र रहे हैं। इन्हें ग्रामीण जीवन का विरोधी नहीं, उसके सामाजिक-भौगौलिक विस्तार के रूप में देखा जाता रहा। व्यक्ति की पहचान स्थान विशेष की अपनी संस्कृति से जुड़ी होती है। हर शहर का अपना मिजाज होता है जो उसकी जीवन शैली, परिवेश, स्थापत्य, साहित्य, कला, खानपान, संस्कृति और बहुत-सी चीजों में झलकता है। शहर वहां के लोगों के जीवन में स्पंदित होता है। उसकी जड़ों से गहराई से जुड़ा होने के कारण कभी कहीं उससे बाहर जाने पर भी उस व्यक्ति के साथ-साथ ही चलता है। अपने ही शहर में कभी मेहमान बन कर जाना कितने अनोखे अहसास एक साथ दे जाता है। कभी सुखद तो कभी दुखद अनुभूतियां, अतीत की स्मृतियां और भावुक कर देने वाली अनेक यादें, जो कभी उदास छोड़ देती हैं, तो कभी मुस्कान बन कर छा जाती हैं। कभी यही शहर उस व्यक्ति को अजनबी के रूप में तटस्थ होकर अपने को नए नजरिए से देखने का अवसर भी देता है।

बदलते समय और विकास की चकाचौंध ने हमारे शहरों को भी बदला है, उनके इतिहास और संस्कृति की पुरानी पहचान को भी, उनके रंग-रूप को भी बहुत सीमा तक बदला है। लेकिन हमारी सुदूर अतीत की गहरी स्मृतियों में वही पुराना शहर झिलमिलाता है, जो हमारी चेतना से आत्मीय राग-सबंध के सूत्रों से जुड़ा हुआ है। भूमंडलीकरण के बाद शहरों में एक नई दुनिया उभरी है, जिसमें जीवन की संवेदनाओं का विस्तार नहीं, बल्कि भौतिक विकास और सुविधाओं से सुसज्जित जीवन-शैली का एकाधिकार हुआ है।

इस बदलाव ने शहरों की सामाजिक और मानवीय संरचना को आघात पहुंचाया है। समाज की सोच अभी उतनी तीव्रता से नहीं बदली है, जितनी तेजी से बाहरी और आभासी परिवर्तन हुए हैं। इस विकास की प्रतिस्पर्धा में मूल्य, सबंध, संवेदनाएं और नैतिकताएं ध्वस्त हुई हैं, जिसमें अनेक विसंगतियों, विषमताओं और असंतुलन को समेटे हुए आधुनिक शहर या स्मार्ट सिटी जैसे महानगर अब मनुष्य के अस्तित्व के भीषण संघर्ष, पहचान के संकट की चुनौतियों से जूझने का स्थान हैं। यांत्रिक और भावविहीन जीवन-शैली, रोजमर्रा की जरूरतों के अभाव की जटिलताएं, कार्यस्थल तक पहुंचने की जद्दोजहद में ट्रैफिक जाम की समस्याओं की विकराल होती परिस्थितियों ने जिस तनाव और रिक्तता बोध को उत्पन्न किया है, वह आज के महानगरीय जीवन की संस्कृति का सच है। मानवीय संबंधों में अलगाव, आर्थिक अनिश्चितता, असुरक्षा बोध तथा असीमित महत्त्वाकांक्षाओं ने आत्मसंघर्ष और द्वंद्व को आज व्यक्ति और समाज की केंद्रीय चिंता के रूप में उपस्थित कर दिया है।

बाजार आधारित विकास के परिणाम स्वरूप शहरों ने जो वर्तमान रूप लिया है उसने सभी पुराने मूल्यों को अपदस्थ और अप्रासंगिक कर दिया है। यह बाहरी चमक-दमक सिर्फ आधुनिकता का ऊपरी ढांचा है, जिसमें एक पूरा युग और उसका समय हमेशा के लिए खो गया है। एक आत्मघाती चेष्टा में निरंतर संवेदनहीन व्यवस्था के बीच, अमानवीय और निर्मम समय में जीने के लिए विवश महानगरों के परिवेश में वह शहर अब भी एक सपना है, एक उम्मीद है, एक संभावना है, जिसकी ऋतुएं, रंग, कला, संगीत और प्रेम के दौर को अतीत के सुनहरे रूप में, धरोहर की तरह आज भी हम याद कर सकते हैं। एक-दूसरे से जुड़ाव की सुंदर परंपराएं, स्मृतियां वर्तमान आत्मकेंद्रित महानगरीय समाज में व्यक्ति के लिए अब भी उतनी ही जरूरी हैं। चमक-दमक से भरा जो कृत्रिम यथार्थ अपनी पूरी मौजूदगी के साथ समाज की सतह पर दिखाई दे रहा है, जिसकी परतों के नीचे अवसाद, हताशा और एकाकीपन का भयावह अंधेरा है। परंपरा और मूल्यों से निर्वासित इस समय ने सभी मान्यताओं और आपसी विश्वास को जिस स्तर पर बहिष्कृत किया है, उसने अस्तित्व की टूटन के साथ जीवन की सार्थकता की तलाश को और ज्यादा चुनौतीपूर्ण बनाया है।

इस महानगरीय यथार्थ में राजनीतिक व्यवस्था की विकल्पहीनता से लेकर साधारण व्यक्ति के जीने का संघर्ष, विस्थापन की पीड़ा, चरम उपभोक्तावाद से ढहते मानवीय सामाजिक ढांचे की अंतहीन त्रासदी और विडंबनाएं, लोकतंत्र के मूल्यों के समाप्त होते दौर में समकालीन मनुष्य का भोगा हुआ यथार्थ बन कर सामने आती हैं। इस विवशता, अपराधबोध, आतंरिक द्वंद्व के साथ छद्म रूप से विकसित, गतिशील, यांत्रिक, आभासी, आत्मकेंद्रित शैली से संचालित महानगरीय सभ्यता ने मानवता का बहुत कुछ बेदखल किया है, जहां जीवन को संपूर्ण रूप से अनुभव करना असंभव है। भौतिकता और बाजार से आक्रांत तकनीकी विकास के इस समय में जीने के लिए हम सभी अभिशप्त हैं, जो वर्तमान नागरिक की नियति है। इसलिए किसी सार्थक विकल्प की तलाश में अपने शहर की उन दूरगामी मधुर स्मृतियों, संवेदनाओं को बचाने की निरंतर कोशिश करते हैं, जिसे इस तीव्र विकास की आंधी में हमने खो दिया है। अपनी परंपराओं, मूल्यों, संस्कारों, इतिहास और अतीत की विस्मृति के विरुद्ध मूल्यवान स्मृतियों को बचाने की यह मनुष्य की दुर्लभ कोशिश है, जो अपने चेतनशील अस्तित्व को जीवित रखने का सार्थक प्रयास है।

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