ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: अच्छा बनाम बुरा

अच्छाई अपने आप में हम सबके जीवन का साध्य है। बुराई के साधन से अच्छाई को हासिल करने की पहल करना यानी अपनी जीवनी शक्ति को ही नकारना है। दिन इसलिए दिन है कि वह हमेशा प्रकाशवान रहता है। प्रकाश खत्म तो दिन खत्म हैं। इसी तरह अच्छाई भी अपने-आप ही अच्छी है।

जो हमें अच्छा लगे, वह अच्छा है, भले ही वह सबको अच्छा न भी लगे। पूर्ण अच्छा और पूर्ण बुरा जैसा कुछ होता नहीं है। सब कुछ प्राय: प्रसंगवश है। (Designed by Gargi Singh)

अनिल त्रिवेदी

अच्छा होना अपने आप अच्छा है, या बुरा होने से अच्छे होने का अस्तित्व है। जैसे कभी रात हो ही नहीं तो शायद दिन की पूछताछ में कमी हो जाए। अच्छे लोग बुराई से परहेज करते हैं। बुरे लोग हमेशा अच्छाई को नकारते नहीं, पर बुराई को अपनाए रखने से परहेज भी नहीं करते।

अगर दुनिया में बुराई का नामोनिशान खत्म हो जाए तो क्या अच्छाई अकेलेपन में अहंकार शून्य हो जाएगी? यह भी एक सवाल है। अच्छे बुरे का सवाल केवल व्यक्तियों का नहीं, विचारों का भी है। हम किसी व्यक्ति, विचार, व्यवहार, काम, रीति-रिवाज, साधन, संगठन, समाज, भाषा, वेशभूषा, बोलचाल, जाति, गीत संगीत, ध्वनि, चित्र, भोजन, संपत्ति, धर्म, देश, संसाधन और तकनीक आदि को अच्छा-बुरा मान कर ही क्यों देखते समझते हैं।

अच्छे-बुरे से परे निरपेक्ष भाव को मानव समाज ने क्यों नहीं अपनाया? अच्छे की हमारी व्याख्या भी शायद बहुत संकुचित मन से की गई है। जो हमें अच्छा लगे, वह अच्छा है, भले ही वह सबको अच्छा न भी लगे। पूर्ण अच्छा और पूर्ण बुरा जैसा कुछ होता नहीं है। सब कुछ प्राय: प्रसंगवश है।

हम शांत तटस्थ और सहज रूप में आजीवन नहीं रह पाते। हमारा अधिकांश जीवन सुविधा का संतुलन है। सहज रहना भी हमारे लिए तपस्या जैसा है। आजीवन हम किसी न किसी विशेषण के आदी होते जाते हैं। अच्छा और बुरा विशेषणों के दो छोर हैं।

समय, काल, परिस्थिति हमारे अच्छे-बुरे की अवधारणा को बदलती रहती है। हमारा अपने आप से अतिशय लगाव भी अच्छे-बुरे की हमारी व्याख्या को बदलता रहता है। हमारी दृष्टि, सोच, समझ सब सापेक्षता से ओतप्रोत होती है। निरपेक्ष बुद्धि न के बराबर है इतनी बड़ी दुनिया की इतनी बड़ी जिंदगी में।

अच्छाई बुराई को लेकर कई मत-मतांतर है। एक मत यह है किसी का बुरा नहीं करना चाहिए। एक मत यह है कि अच्छे बन कर जी ही नहीं सकते। एक मत है अच्छे के साथ अच्छा और बुरे के साथ बुरा बन कर रहें। सच बोलना अच्छा है, असत्य बोलना बुरा है। जितनी नीति और सद्व्यवहार की बातें हैं, वे अच्छाई की बात करती हैं।

अनीति और असत्य बुराई को बुरा नहीं मानते। अच्छा सबसे अच्छा है, यह मानने के बाद भी हम अच्छाई के साथ विचारपूर्वक और आग्रह के साथ जी नहीं पाते। बुराई को गलत मानते हुए भी आजीवन बुराई से संघर्ष करने का साहस हम सब में हर समय नहीं हो पाता।

बुराई एक तरह से हमारे लिए गुरु की तरह भी काम करती है। बुराई हमें समझाती या सिखाती है कि यह बात बुरी है तो हम उससे बच या दूर रह सकते हैं। जैसे हिंसा अच्छाई नहीं है, फिर भी अहिंसक होना अच्छाई होते हुए भी हम सबको सहज-सरल नहीं लगता और हम कम या ज्यादा मात्रा में हिंसा का उपयोग कई रूपों में जाने-अनजाने करते रहते हैं।

कई बार आवश्यक बुराई की दलील को भी हम अपनी ढाल बना लेते हैं। इस तरह अच्छाई की महत्ता को जानते-समझते हुए भी हम बुराई को त्याग नहीं पाते। बुराई को लेकर उदासीन बने रहना हमें व्यावहारिकता लगने लगी है। भ्रष्टाचार बुराई है, पर हम उसे मिटाना संभव नहीं मानकर आम व्यवहार का आम तरीका बना बैठे हैं। शिष्टाचार जीवन की सभ्यता है या अच्छाई है, पर हममें से अधिकतर उसे निभाने में लापरवाह और उदासीन बने जाते हैं।

अच्छाई अपने आप में हम सबके जीवन का साध्य है। बुराई के साधन से अच्छाई को हासिल करने की पहल करना यानी अपनी जीवनी शक्ति को ही नकारना है। दिन इसलिए दिन है कि वह हमेशा प्रकाशवान रहता है। प्रकाश खत्म तो दिन खत्म हैं। इसी तरह अच्छाई भी अपने-आप ही अच्छी है।
रात और दिन का एक निश्चित क्रम बना हुआ है, पर अच्छाई और बुराई का कोई क्रम नहीं। सब हमारी सोच-समझ और मन:स्थिति पर निर्भर है।

हमेशा अच्छा बने रहना सहज भी है और कुछ हद तक कठिन भी है। बुराई करना सरल है और बुराई से आजीवन बचे रहना असंभव तो नहीं, पर कठिन जरूर हैं। मन में ठान लें तो कुछ भी कठिन नहीं। अच्छा और बुरा हमारे निजी और सार्वजनिक जीवन में हर समय हमारे साथ बने रहते हैं, पर यह हमारे ऊपर है कि हम जीवनभर अच्छे को मानें और बुराई को आवश्यक बुराई के तर्क के आधार पर भी न मानें, तभी हम अच्छाई को आजीवन आत्मसात कर सहज स्वरूप में जी सकते है।

अच्छाई हमारी जीवनी शक्ति को हमेशा व्यापक जीवन-दृष्टि तथा सहजता की समझ वाली बनाए रखती है। इस तरह अच्छाई और बुराई दिन और रात की तरह है जो जीवन को प्रकाश में प्रकट और प्रखर करते हैं और रात के अंधेरे मे सुप्त हो जाते हैं। अच्छाई लोभ-लालच से परे रहना और बुराई लोभ-लालच के साथ रहना है। अच्छाई सबके भले के लिए होती है, इकट्ठा कर अपने पास रखने के लिए नहीं। इसीलिए कहा गया है- ‘नेकी कर दरिया में डालह्ण। अच्छाई जीवन की गहराई है, जबकी बुराई जीवन का उथलापन।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगे: विभाजित सपने
2 दुनिया मेरे आगे: घरेलू हिंसा के बीज
3 दुनिया मेरे आगे: कहने का सलीका
IPL 2020 LIVE
X