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दुनिया मेरे आगे: खुशहाली के रास्ते

आज के परिदृश्य में माता-पिता जरूरत से ज्यादा फिक्रमंद हैं। हमेशा बच्चे को अपनी नजरों के सामने रखना चाहते हैं। इस प्रकार बच्चा एक बंधन में कसा उबाऊ चक्र में घूमने को बाध्य होता है। बंधन में कैसी ‘हैप्पीनेस’ या खुशी? उसके जेहन में हमेशा मोटी-मोटी किताबें, स्कूल और कोचिंग संस्थान होते हैं, जहां से शिक्षा प्राप्त कर वह एशो-आराम का जीवन जीना चाहता है।

sportsबच्‍चपन अपने आप में निराला होता है। फाइल फोटेा।

हेमंत कुमार पारीक

अब भी याद है मुझे कि हर रविवार दादी एक आना यानी छह पैसे दिया करती थी। हम सब भाई-बहनों को बराबर से एक आना मिलता था। उस एक आने के लिए हम लोग बेसब्री से रविवार का इंतजार करते थे। उस एक आने में हमारे बहुत से सपने थे। उसे लेकर दोपहर से शाम तक बाजार में घूमते-फिरते गोया कारू का खजाना हो हमारे पास और उस बाजार की हर चीज खरीद सकते हैं।

छुट्टी का दिन होता था। स्कूल और किताबों को भूल जाते थे। टोली में बाजार जाते देख माता-पिता भी बेफिक्र हो जाते। बाजार हमारे आनंद की जगह थी। एक दुकान से दूसरी, दूसरी से तीसरी, तीसरी से चैथी और पांचवीं..! इस प्रकार पूरे बाजार के चक्कर इस आशा से काटते थे कि एक आने में अपनी पसंद की हर चीज खरीद लें। मगर उस समय एक आना विनिमय की सबसे छोटी राशि होती थी। फिर भी इस तरह बाजार में घूमने-फिरने में आनंद तो आता ही था। एक नई ऊर्जा का संचार भी होता था जो बाकी छह दिनों के लिए काम आती थी। बाजार में न तो शिक्षक की छड़ी होती थी और न पिता जी की टेढ़ी नजर! आजाद पंछी की तरह खुले आसमान में होते थे।

माता-पिता को भी ज्यादा परवाह नहीं करना पड़ती थी। उनका कर्तव्य इतना भर था कि पहनने के लिए कपड़े हों, वक्त पर खाना और अच्छे स्कूल में शिक्षा हो। यह उनके कर्तव्य की प्राथमिकता थी। आज के माता-पिता की तरह उनकी कोई ख्वाहिश नहीं थी कि बेटा अमेरिका या लंदन जाए! वे तो बस इतना चाहते थे कि अच्छे से पढ़-लिख ले। न तो वे बच्चे पर कलेक्टर बनने का सपना लादते थे और न डॉक्टर या इंजीनियर बनने का।

यह उनकी ‘हैप्पीनेस’ यानी खुश रहने का राज था। आज तमाम तरह की चिंताएं रहती हैं मां-बाप को। और उनके साथ बच्चों को भी। वजह यह कि बचपन से ही बच्चे के कंधों पर सपनों का भारी-भरकम बैग लाद दिया जाता है। इस धारा में बह रहे हर किसी का सवाल होता है- बड़े होकर क्या बनोगे, डॉक्टर या इंजीनियर? अवचेतन में भी यही बड़े-बड़े सपने कुलांचे भरने लगते हैं।

और सपने सफल नहीं होने पर निराशा के अंधकूपों में खो जाते हैं बच्चे।अक्सर सोचता हूं कि आज के इन बच्चों के सपने कितने अपने होते हैं और कितने उनके सिर पर थोपे हुए! माता-पिता पर वह कौन-सा सुर हावी हो गया है कि वे अपने बच्चों को बेहतर, समझदार और संवेदनशील इंसान बनाने के बजाय ‘बड़ा आदमी’ बनाने का सपना पालते हैं और उस सपने को पूरा करने का भार बच्चों के सिर पर डाल देते हैं? बच्चे इन पराए सपनों के बोझ को कितना सह पाते हैं, यह हम आज के बच्चों के चेहरे की छिन गई वास्तविक खुशी और छाई मायूसी की शक्ल में देख सकते हैं। आखिर क्यों आज खुशी जीने के बजाय याद करने का मामला बनता जा रहा है?

आजकल ‘हैप्पीनेस इंडेक्स’ यानी खुशहाली का सूचकांक की बातें जोर-शोर से होने लगी हैं। मध्य प्रदेश वह पहला राज्य है जहां इस उद्देश्य के तहत ‘आनंद भवन’ की स्थापना हुई है। मगर सर्वे से पता चला कि ‘हैप्पीनेस’ में वह कहीं पीछे छूट गया है। मिजोरम, अंडमान निकोबार जैसे छोटे राज्य इस दौड़ में सबसे आगे निकल गए हैं। वैवाहिक स्तर, आयु, शिक्षा और आय का सीधा संबंध खुशहाली से होता है। इसी तरह, काम के आधार पर आय, परिवार, रिश्ते, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य आदि। सामाजिक स्तर पर धार्मिक और आध्यात्मिक पहलू इसकी कसौटियां होती हैं।

सवाल यह है कि हम कम खर्चे में कितना आनंद उठा सकते हैं! इसी संदर्भ में उस एक आने से हम कभी पतंग खरीद लाते थे तो कभी लट्टू! कभी-कभी ‘राई-झूला’ झूलते थे तो कभी मीठी गली में मिठाइयों की दुकान से अपनी पसंद की मिठाई ले आते और फिर मिल बांट कर खाते थे। कभी छुट्टी के दिनों में सर्वसुलभ गांव की नदी में नहाने चले जाते थे तो कभी गांव के मेलों में। परिवार की तरफ से कोई बंधन नहीं था और न उन्हें चिंता-फिक्र थी। हैप्पी-हैप्पी थे… ज्यादातर वक्त खुशियों में गुजारते थे।

आज के परिदृश्य में माता-पिता जरूरत से ज्यादा फिक्रमंद हैं। हमेशा बच्चे को अपनी नजरों के सामने रखना चाहते हैं। इस प्रकार बच्चा एक बंधन में कसा उबाऊ चक्र में घूमने को बाध्य होता है। बंधन में कैसी ‘हैप्पीनेस’ या खुशी? उसके जेहन में हमेशा मोटी-मोटी किताबें, स्कूल और कोचिंग संस्थान होते हैं, जहां से शिक्षा प्राप्त कर वह एशो-आराम का जीवन जीना चाहता है।

रात-दिन उसी मृग मरीचिका में दौड़ लगाता रहता है। या फिर कभी अपनी कथित खुशी के लिए बड़े शहर में या विदेश भेजते हैं, जहां उसकी उम्र का ज्यादातर साल बिना माता-पिता के साथ के गुजर जाता है। और इसी आपाधापी में ‘हैप्पीनेस’… वास्तविक खुशी कहीं पीछे छूट जाती है। हालांकि आनंद लेने के उसके आसपास बहुत से साधन मौजूद होते हैं। ये साधन उसे व्यावहारिक भी बनाते हैं। शिक्षा का उद्देश्य यह नहीं है कि बच्चा किताबों में आंख फोड़ता रहे… वह उस खुशहाली से विमुख हो जाए जो उसे हमारे आसपास है, सर्व सुलभ है। बिना पैसे खर्च किए मिलने वाली है।

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