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पानी की प्यास

इन दिनों कबूतरों को अपनी बालकनी में जल-क्रीड़ा करते हुए देखता हूं तो उन्हें देख कर बहुत आनंद आता है।

कबूतर।

इन दिनों कबूतरों को अपनी बालकनी में जल-क्रीड़ा करते हुए देखता हूं तो उन्हें देख कर बहुत आनंद आता है। जो जल-पात्र उनके जल पीने के लिए भरा जाता है, उससे वे पानी भी पीते हैं और फिर उसी में डुबकी लगाने के लिए उतर भी जाते हैं। पंख फड़फड़ाते हैं तो पानी की कुछ बूंदें उछलती भी हैं। दिन में कई बार देखे जाने वाले या सहसा दिख जाने वाले इस तरह के दृश्य के कई रूप हैं। कभी-कभी जल-पात्र आधा हो जाता है तो कोई कबूतर उसमें अपनी गर्दन झुका कर पानी पीता है। और जल-क्रीड़ा में नहीं, अपनी प्यास बुझाने में उसमें इतना ‘डूब’ सा जाता है कि उसकी तस्वीर खींच ली जाए तो भी वह उसके खींचे जाने का ‘प्रतिरोध’ करता हुआ फर्र से उड़ न जाए। कभी-कभी तीन-चार कबूतर उस जल-पात्र के इर्द-गिर्द चक्कर लगाते हुए मिलते हैं जब वह खाली हो जाता है। इस उम्मीद में कि वह फिर भर दिया जाएगा।

गर्मी में आमतौर पर भी प्रतिवर्ष इन दृश्यों पर गौर करता रहा हूं। उन्हें देख कर आनंद उठाता रहा हूं। पर कोरोना की अवधि में पशु-पक्षियों, वनस्पतियों, फल-फूलों से जुड़े हुए प्रसंग कुछ अतिरिक्त आनंद देते हैं। यह बहुतों का अनुभव है। इस अवधि ने हमें चीजों को कुछ गौर से देखने की दृष्टि दी है। साथ ही अपने आसपास से अपने संबंध को मर्म भरे ढंग से समझाया है। यह तो समझाया ही है कि सब कुछ अनित्य है, प्रकृति ही नित्य है। बहरहाल, यह ठीक ही माना जाता रहा है कि पानी की प्यास किसी और तरह से बुझती नहीं है। उसके सौंदर्य का भी कोई विकल्प नहीं है। जल-बूंद को देखना, लहरों को देखना, जल राशि को देखना, हमेशा अपूर्व ही तो होता है! यह सिर्फ मनुष्यों के साथ ही नहीं होता है। पशु-पक्षियों को भी पानी का मर्म पता है। वह चातक को पता है। मोर को पता है।

हाथी को भी पता है। कभी बच्चों के लिए एक कविता लिखी थी- ‘धम्मक धम्मक’। इसकी पंक्तियां बड़े सहज भाव से उतरती चली आई थीं कागज पर। उनमें से दो हैं- ‘जब पानी में जाता हाथी/ भर-भर सूंड़ नहाता हाथी।’ हां, देखा है हाथी को पानी में जाते और उसमें नहाते। बहुत देखा है। अपने बचपन के गांव में, किसी जलाशय में, पोखर-तालाब में तरह-तरह के पशु-पक्षियों को पानी पीते।

यह भी अकारण ही नहीं है कि हमारे देश के विभिन्न अंचलों में घड़ों, सुराहियों, मटकों को ग्रीष्म से जुड़ी हुई अनिवार्य चीज माना जाता रहा है। वे आराम करने वाले, सोने वाले बिस्तरों-चारपाइयों के आसपास रखे जाते रहे हैं। आज भी रखे जाते हैं। और अब फ्रिज में रखी हुई पानी की बोतलें शरीर में कैसी ठंडक पहुंचाती हैं। पानी हो, साफ-सुथरा हो, निर्मल हो इसकी चेष्टा मनुष्य करता आया है। उसे छान कर पीने तक की बात सोची गई है- उसका असली स्वाद पाने के लिए। हम जानते हैं कि अब उसे छान कर पीने की यंत्र-मय विधियां भी उपलब्ध हैं और ‘मिनरल वाटर’ तो अब एक बहुत बड़ा व्यवसाय भी बन चुका है।

हमारे बचपन के कुएं अब नहीं रहे। वे पूर दिए गए हैं। तमाम तालाब भी। एक जमाने में दोनों हथेलियों को जोड़ कर पानी पिया जाता रहा है। गिलास न होने की शिकायत नहीं की जाती थी। और बहुतों को उसी तरह पीना अच्छा लगता था। वह मुद्रा ‘पानी प्रार्थना’ जैसी होती थी। और कुल्हड़ में तो माटी के स्वाद के साथ मिल कर पानी का स्वाद बहुतों को यों भी मीठा लगता है। लगता रहा है।

पानी है तो फसलें हैं, फल-फूल हैं, सब्जियां हैं। पानी है तो जीवन है। जीवन के मानी हैं। कवि रघुवीर सहाय ने लिखा है- ‘बच्चा बच्चा हिंदुस्तानी/ मांग रहा है पानी पानी/ हमको पानी नहीं दिया/ तो हमको मानी नहीं दिया’। और अपनी एक और कविता में पानी का कितना सुंदर गुणगान किया है- ‘पानी का स्वरूप ही शीतल है/ बाग में नल से फूटती उजली विपुल धार/ कल-कल करता हुआ दूर दूर तक जल/ हरी में सीझता है/ मिट्टी में रसता है/ देखे से ताप हरता है मन का, दुख बिनसता है।’

पानी केवल नहाने-कपड़े धोने-फसल सींचने की ही चीज नहीं है। वह तो देखने से ही ताल्लुक रखता है। उसका होना एक बड़ा भरोसा है। बड़ा आश्वासन है। हमने उसे बहुत बर्बाद किया है। आज की प्यास बुझा ली है, कल की प्यास के बारे में अक्सर नहीं सोचा है कि उसे कौन बुझाएगा और वह कैसे बुझेगी। इधर उसके ‘संरक्षण’ के बारे में सोच-विचार कुछ तेज हुआ है। पानी बचाने की विधियां ईजाद हुई हैं। उसके भंडारण के कुछ प्रबंध हुए हैं। इन सबकी गति और तेज होनी ही चाहिए। लेकिन ‘संरक्षण’ के समांतर प्रकृति का यह अनमोल उपहार आज मुनाफे का कारोबार बन चुका है। क्या पानी इसी तरह बचेगा? क्या हम इसे बचा पाने में सक्षम नहीं है? सचमुच जल है तो जीवन है। ‘मछली जल की रानी है, जीवन उसका पानी है’ यह उक्ति जितना बड़ा सच मछली के लिए है, उतना ही बड़ा सच अन्य जीव-जंतुओं के लिए भी है, हम मनुष्यों समेत!

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