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इंसानियत का चेहरा

बाघों, शेरों सहित कई वन्य जीवों की घटती संख्या के बारे में आए दिन हम अखबारों में पढ़ते और टीवी पर देखते-सुनते हैं।

Author Updated: February 19, 2021 3:45 AM
save wildlifeवन्‍य जीवों का संरक्षण जरूरी। फाइल फोटो।

बृजमोहन आचार्य

इस पर केवल चिंता की जा रही है। अभी तक किसी ने कुछ ठोस प्रयास नहीं किया कि क्या ऐसा किया जाए, ताकि उन जीवों को बचाया जा सके और जंगलों में उन्हें उछल-कूद करते, कुलाचें भरते देख सकें। अगर स्कूलों में विद्यार्थियों से वन्य जीवों के बारे में कोई सवाल पूछा जाता है, तो शायद देहाती विद्यार्थी ही कुछ हद तक सही बता सकते हैं। शहरी विद्यार्थी को तो मोबाइल और टीवी से ही फुर्सत नहीं है। सोशल मीडिया पर एक वीडियो देख कर यह सोचने लगा की आज इस भागमभाग जिंदगी में भी कुछ इंसानियत बची हुई है, अन्यथा किसे फुर्सत है, जो बेचारे जानवरों की रक्षा कर सके।

वीडियो में बताया गया था कि जिस गांव में कुतिया ने पिल्लों को जन्म दिया था, वहां लोग न उन्हें रोटी डालते थे और न ही उनकी सुरक्षा करते थे। जब पिल्ले बड़े हुए तो गांव के स्कूल के कर्मचारियों ने उनका खयाल रखा। उस कुतिया को भी भोजन डालना शुरू कर दिया, जो पिल्लों को जन्म देने के बाद काफी कमजोर हो गई थी।

वहां के स्थानीय लोगों की सोच थी कि ये श्वान उनकी गायों और अन्य पशुओं को नुकसान पहुंचाएंगे। इस भय से उन्होंने उस कुतिया तथा उसके पिल्लों को भोजन डालना बंद कर दिया ताकि ये कमजोर हो जाएं और भूखे ही मर जाएं। हालांकि उन गांव वालों का भय सही भी है। मगर उस स्कूल के कर्मचारियों ने कुतिया तथा पिल्लों को रोटी डालनी शुरू कर दी।

एक बार तो एक कुतिया ने भर पेट रोटी खा ली थी। जब एक रोटी बच गई तो उसे खड्ढा खोद कर उसमें छिपा दिया, ताकि भविष्य में यह रोटी काम आ सके। जब स्कूल का अवकाश होता तो उन्हें कोई रोटी डालने वाला नहीं होता था। ऐसे में उस स्कूल के कर्मचारियों ने उन पिल्लों को अन्य गांव में छोड़ दिया, ताकि भूख से न मरें। अगर स्कूल के कर्मचारी गांव वालों की तरह ही सोच लेते, तो शायद ही पिल्ले बड़े हो सकते थे।

जब देश में कोरोना की वजह से पूर्णबंदी हुई, तो उस समय भी कई जानवर भूख के मारे इधर-उधर भटक रहे थे। कोई उन्हें भोजन डालने वाला नहीं था, क्योंकि सभी को भय था कि कहीं पुलिस उन पर लाठी न बरसा दे। मगर जानवरों को जिंदा रखने के लिए भी कुछ लोग पुलिस से विनती कर घर से उनके लिए भोजन आदि ले जाते थे।

यानी यह समझना कि पशुओं से मनुष्य को नुकसान होता है, सर्वथा गलत है। आज अगर गिद्ध और श्वान नहीं होते, तो मृत पशुओं को खाने वाला कोई न होता। हमारे पर्यावरण में भी इन पशु-पक्षियों का महत्त्व माना गया है। क्योंकि इन मृत पशुओं से वातावरण में दुर्गंध मिटाने का काम भी ये पशु-पक्षी ही करते हैं। शहरी क्षेत्रों में अगर कोई कुतिया पिल्लों को जन्म देती है, तो महिलाएं उसे हलवा बना कर खिलाती हैं, ताकि उसके शरीर की कमजोरी दूर हो सके। यह है मानवीय संवेदना का चेहरा।

पालतू श्वानों की देखभाल के लिए सैकड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं, लेकिन आवारा श्वानों के लिए कोई उचित व्यवस्था नहीं है। मेरे मकान के पास पशुओं का अस्पताल है। यहां महंगे-महंगे पालतू श्वानों को लोग कारों में लाते और उनका इलाज कराने के लिए रुपए भी खर्च करते हैं। तब सोचता हूं कि गलियों में घूमने वाले श्वानों ने इनका क्या बिगाड़ा। इस समय वन्य जीवों के संरक्षण के लिए कई योजनाएं बनाई जाती हैं।

इसके लिए पशु प्रेमी भी विचार-विमर्श करते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय धरातल पर आने से पहले ही सब कुछ समाप्त हो जाता है। आज शहरी क्षेत्र के इंग्लिश स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को वन्य जीवों की कोई खास जानकारी नहीं है। वे केवल अपनी किताबों में छपे फोटो देख कर ही समझने का प्रयास करते हैं कि फलां जानवर वन्य जीव है और उसका भोजन इस तरह का है।

पिछले दिनों बर्ड फ्लू की आशंका हुई तो कई पक्षी प्रेमियों तथा विभिन्न प्रांतों की सरकारों ने कई योजनाएं बनार्इं, लेकिन आज क्या स्थिति हो गई है बताने की दरकार नहीं है। आज वन्य जीवों की संख्या धीरे-धीरे कम होने लगी है। इसकी वजह यह मानी जा रही है कि इनके संरक्षण और सुरक्षा को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं और शहरों के विस्तार तथा गांवों में औद्योगिक इकाइयों के स्थापित होने के कारण वन्य जीव अपना स्थान छोड़ते जा रहे हैं। अगर इन वन्य जीवों को बचाना है तो इनके लिए एक क्षेत्र निश्चित करना होगा। उनके भोजन-पानी की पर्याप्त व्यवस्था करनी होगी।

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