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दुनिया मेरे आगे: सहज जीवन की आकांक्षा

हाल ही में मुझे भी दो-ढाई साल पहले कश्मीर में बिताए पल याद आए। कॉलेज में एक दिन सहकर्मी के पूछने पर कि कश्मीर जाने के लिए कौन-सा मौसम अच्छा है, अनायास ही मुंह से निकला था कि मौसम तो सब अच्छे हैं, माहौल अच्छा नहीं है।

Author Updated: October 28, 2020 6:29 AM
अपनी ओर खीचताा कश्‍मीर का अपूर्व सौंदर्य।

सपना गांधी

मानव-मन सहज जीवन में ही खुशी पाता है। सहज स्थितियों के साथ-साथ व्यक्ति मानवीय संबंधों में भी सौहार्द, सहजता, विश्वास की आकांक्षा रखता है। स्थितियों के गड़बड़ाने से हमारे आपसी संबंध भी डगमगाने लगते हैं। हां, सहजता की परिभाषा सबके लिए अलग-अलग होती है। यानी हर व्यक्ति एक दिनचर्या, जीवन शैली निश्चित कर लेता है और उसकी दृष्टि में वही सहज होता है। जब उसके नित्य कर्मों की क्रमबद्ध शृंखला टूटती है, उसमें व्यवधान आता है या आपात स्थिति होती है तो वह असहज की परिधि में प्रवेश पा जाता है।

महामारी के मौजूदा समय में भी कुछ ऐसा ही हुआ, भले ही पूर्णबंदी अवधि के कितने ही सकारात्मक पहलू रहे, मसलन, भागदौड़ भरे जीवन से राहत पाना, परिवार के साथ फुर्सत के पल मिलना आदि। प्रकृति ने भी चैन की सांस ली, प्रदूषण कम हुआ, हरे-भरे पेड़-पौधों का माधुर्य अपने समुन्नत रूप में दृष्टिगोचर हुआ। अनेक पक्षी, चिड़िया जो हमारी गाड़ियों के शोर और उनसे निकलने वाले धुएं में कहीं गुम हो गए थे, उन्हें देखने और उनकी चहचहाहट भी सुनने को मिली। फिर भी व्यक्ति डर, दहशत, अवसाद से घिरा रहा, क्योंकि ये परिस्थितियां उसके लिए सहज नहीं थीं।

कहने का आशय यह है कि लोग अपने सामान्य-सहज दिनों की स्मृतियों को ही खंगालते रहे। हाल ही में मुझे भी दो-ढाई साल पहले कश्मीर में बिताए पल याद आए। कॉलेज में एक दिन सहकर्मी के पूछने पर कि कश्मीर जाने के लिए कौन-सा मौसम अच्छा है, अनायास ही मुंह से निकला था कि मौसम तो सब अच्छे हैं, माहौल अच्छा नहीं है। बचपन में परिवार के साथ कश्मीर गई थी- खुशनुमा मौसम, खुशनुमा माहौल। फिर तीन साल पहले जब भाई का तबादला श्रीनगर में हुआ तब दो बार जाना हुआ।

पहली बार गई तो शहर में कर्फ्यू होने के कारण अधिकतर दिन घर पर ही रहे, लेकिन परिसर में ही कदम-कदम पर खिले गुलाब के सौंदर्य ने इतना अभिभूत किया कि तभी सोच लिया था कि कुछ समय बाद ट्यूलिप बाग देखने अवश्य जाऊंगी। पहले दिन विशेष अनुमति लेकर जोजिला गए। चारों ओर प्राकृतिक सुषमा बिखरी हुई थी। इतनी कि आंखों में समेटी न जा सके। बीच में ही फोन पर समाचार मिला कि शहर का माहौल बिगड़ चुका है, जल्दी वापस आना होगा। सड़कों पर सन्नाटा पसरा था। टैक्सी चालक चूंकि इन हालात और शहर के सभी रास्तों से परिचित था, इसलिए हम बचते-बचाते ठीक-ठाक सुरक्षित पहुंच गए। शहर में फिर कर्फ्यू लग गया था। लेकिन लौटने के पहले कर्फ्यू में राहत मिली तो ट्यूलिप बाग जाने का मौका मिला।

जाहिर है, सौंदर्य शब्दातीत और वर्णनातीत था। मगर यहां इस प्रसंग को पर्यटन या किसी यात्रा-वृत्तांत की तरह नहीं देखा जा सकता, क्योंकि प्रकृति के सौंदर्य के अहसास में डूबने और घूमने की लालसा कई तरह की आशंकाओं और ऊहापोह के बीच झूल रही थी। इस बीच मन में जो भाव डूब-उतरा रहे थे, उसकी व्याख्या करना एक मुश्किल काम है, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि वक्त के साथ जो चीजें बदल रही हैं, उसमें स्वाभाविकता और सहजता का स्थान सिकुड़ता जा रहा है। सोचती हूं कि सहजता नहीं हो तो प्रकृति को हम कितना और कैसे महसूस कर पाएंगे!

बहरहाल, कश्मीर को धरती का स्वर्ग ठीक ही कहा गया है। स्वर्ग यहां सौंदर्य, सत्-चित्-आनंद का प्रतीक स्वरूप है। वहां की हवाएं, पहाड़ियां, झील-झरने, फल-फूल, पत्तियां ही कश्मीर का सच है। प्रकृति की जीवंत खूबसूरती आनंद से सराबोर कर देती है। लेकिन प्रज्ञाओं के साक्षी ये अचल कब अस्थिरता के पर्याय बन गए? मन कश्मीर के माहौल और ट्यूलिप फूल में समानता देखने लगा। जैसे यह फूल पंद्रह से तीस दिन ही खिलता है, वैसे ही कश्मीर के भी वर्ष के कुछ खूबसूरत या सामान्य दिन निकाल दिए जाएं तो शेष दिन कर्फ्यू और आतंकी हमलों में ही गुजरते थे।

ऐसे में मन में यह खयाल आता है कि कश्मीरवासियों के लिए सहजता का अर्थ क्या होगा? कर्फ्यू के दिन या राहत के दिन? या फिर क्या उनके भीतर ऐसा स्वीकार भाव आ गया है कि प्रिय-अप्रिय क्षणों का आना-जाना उन्हें प्रभावित ही नहीं करता! महामारी और कश्मीर, दोनों ने ही जीवन और मानव-मन से संबंधित कुछ बातों का अहसास कराया- जीवन का खूबसूरत और बदसूरत चेहरा समांतर चलते हैं।

‘सूखते चिनार’ उपन्यास में लेखिका मधु कांकरिया कश्मीर के विषय में लिखती हैं- ‘जैसे यहां जगह-जगह कुदरती सुंदरता बिखरी पड़ी है, कहीं गुलाब, कहीं चिनार, कहीं दुधिया बादल, कहीं चश्मे तो कहीं झेलम, वैसे ही यहां जगह-जगह कहीं हिंसा, कहीं शक और नफरत की बारूद बिछी हुई है।’ गुलाब, चिनार के साथ ट्यूलिप का सौंदर्य मैं अपनी ओर से जोड़ना चाहूंगी। मानव-मन सदैव खूबसूरत का ही आकांक्षी होता है। बुराई की, नकारात्मकता की आयु लंबी तो हो सकती है, लेकिन वे अमर नहीं हैं।

असहज होने पर मानव-मन सहज और सुन्दर के लिए और भी लालायित होता है। हम क्यों नहीं यह प्रयास करें कि जीवन की सहजता और सुंदरता बनी रहे। प्राकृतिक, इंसानी और भौतिक व्यवधानों से परे या उनसे बिना भयभीत हुए हम आत्मविश्वास और जिजीविषा से उन सभी विषम परिस्थितियों पर विजय हासिल कर लें जो जीवन की सहजता में आड़े आती हो।

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