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गुमशुदा उम्मीद

अपने जीवन की जड़ों को सींचने को लेकर हमें कोई जरूरत महसूस नहीं होती। हमारे समय में हमारे लोकतंत्र का दीपक अपनी जगह से गुम हो गया है।

Author नई दिल्ली | May 23, 2016 4:23 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

उसका नाम कुछ भी हो सकता है, वह किसी भी गांव का चेहरा हो सकता है। सुविधा के लिए उसका नाम दीपक रखते हैं। कद लंबा, छरहरा बदन। उम्र बयालीस साल। हालांकि गांव में लोग उसे एक अजीब नाम ‘फालतू’ कहके पुकारते थे और पता नहीं यह नाम किसने किस संदर्भ में रख दिया था! शायद लोग उसे फालतू समझते थे। जबकि वह बढ़िया क्रिकेट खेलता था। विनम्र और व्यावहारिक था। उसका नाम दीपक था, लेकिन वह एक तरह से अंधेरे में था। घर अंधेरा था, भविष्य अंधेरा और रास्ता भी अंधेरा था। वह उन्हीं अंधेरे रास्तों पर अक्सर नंगे पांव चलता था। पिछले पंचायत चुनाव में वह एक शाम मुझे मिला था। उसने बताया था कि वह गांव का एक गरीब, लेकिन सबसे अधिक पढ़ा-लिखा, उत्साही और कर्मठ नौजवान है। सही कहा था उसने। वह गांव के प्रधान सीट के लिए चुनाव लड़ना चाहता था।

जब वह बता रहा था, तब मैं लोहियाजी को सुन रहा था। अवसर से योग्यता विकसित होती है। सबसे गरीब आदमी के हाथ में अधिकार होगा तो गरीबी का खात्मा आसान होगा। उनकी बात दिल में बैठ गई। हम दीपक के पक्ष में हो गए। उसके समर्थन में लोग जुटते गए। समर्थन बढ़ता गया। वह चुनाव जीत गया और प्रधान बन गया। अब वह अंधेरे में नहीं, रोशनी में था। उसके चबूतरे पर ग्राम पंचायत के मिनी सचिवालय के पास सौर ऊर्जा से जलने वाले बल्ब का प्रकाश था। उसने अपने प्रशंसकों के लिए आनंदोत्सव का आयोजन किया।

अब उसका रास्ता अंधेरा नहीं रहा। अंधा नहीं रहा। अब उसमें आंखें उग आई थीं। दो नहीं, दर्जनों। अब वह नंगे पांव नहीं था। अब उसके पांवों में मजबूत और महंगे पदत्राण थे, धरती को कुचलते हुए। चमकदार आतंक फैलाती लकदक सफेदी थी, सिर से पांव तक। उसके लंबे हाथों में बहुत कुछ था। वह सक्रिय था, अथक भाग-दौड़ में व्यस्त। वह विकास को समर्पित था। उसने कीर्तिमान कायम किए, लेकिन सब कागज पर। शायद उसने जान लिया था कि जमीन पर कुछ भी किया हुआ मिट्टी में मिल जाता है। कागज पर कुछ भी किया अमिट हो जाता है। अपने पूरे कार्यकाल में उसने गांव को जस का तस छोड़ दिया। गांव को उसने ओढ़ा-बिछाया, मगर फिर भी कबीर की तरह ओढ़-बिछा कर जस की तस धरि दीन्हि चदरिया।

अब वह गांव में नहीं है। लोग बताते हैं शहर में उसने घर बना लिया है। अच्छा, आरामदेह घर। सवारी ढोने वाली गाड़ियां रख ली हैं, नियमित आमदनी बांध ली है। यानी दीपक शहर के प्रकाश में डूब गया। लेकिन गांव अब भी अंधेरे में डूबा है। गांव चिल्ला-चिल्ला कर दीपक को टेर रहा है। दीपक ने गांव को छोड़ क्यों दिया? आखिर गांव का गुनाह क्या है? गांव ने क्या नहीं दिया दीपक को! लेकिन सोचता हूं कि यह भी तो हो सकता है कि गांव ने कभी किसी दीपक से बहुत कुछ छीन लिया हो!

लुढ़की हुई प्याली की तरह आज भी हमारे गांव की आत्मा गली-गली, ठोकर खाते हर किसी से लापता दीपक का पता पूछ रही है। वह कहीं गुम हो गया है। उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करानी है। कहां दर्ज होगी, कौन दर्ज करेगा, गांव को पता नहीं है! हमारा गांव दुखी है। हमारा देश दुखी है। हमारे देश के जीवन की जड़ें दुखी हैं।

जड़ें जीवन-रस देती हैं। छतनार और छायादार बनाती हैं। हमारे समय में पेड़ वैसे भी जरूरत से बहुत कम हैं। पेड़ों में छाया नहीं है, नदियां सूखी हैं, जलाशय सूखे हैं, बादल बेपानी हैं। ऐसे में भी जो पेड़ पनप रहे हैं, जैसे ही छायादार बन रहे हैं, अपनी छाया लेकर जड़ों से दूर भाग जा रहे हैं। जड़ें क्या करें! जड़ें तो अपनी जगह छोड़ नहीं सकतीं न! वे अपनी जगह से भाग नहीं सकतीं! भागना शायद जड़ों का स्वभाव नहीं है।

हमें सब कुछ के बारे में सोचने की फुर्सत है। हम सोचते हैं। लेकिन हमारे पास अपने जीवन की जड़ों के बारे में सोचने की कतई फुर्सत नहीं है। अपने जीवन की जड़ों को सींचने को लेकर हमें कोई जरूरत महसूस नहीं होती। हमारे समय में हमारे लोकतंत्र का दीपक अपनी जगह से गुम हो गया है। हम अपने दीपक के बारे में पता करना कब शुरू करेंगे! दीपक एक अकेले व्यक्ति का नाम नहीं है! हर गांव में कहीं कोई दीपक उम्मीद बन के खड़ा होता है और बहुत सारे लोगों को निराश करके चला जाता है। लेकिन उसके चले जाने के पीछे जो वजहें होंगी, क्या उसमें हमारी या हमारे गांव की भी कोई भूमिका होगी! क्या कुछ सांस्कृतिक और सामाजिक सवाल भी होंगे! हो सकता है, उसके पास भी अपने सवाल हों। जवाब उसे भी चाहिए। लेकिन यह पता करना और उसे खोज कर वापस लाना हमारे समय की सबसे बड़ी जरूरत है!

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