अंकों में बदलता आदमी - Jansatta
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अंकों में बदलता आदमी

हमारा समाज और भाषायी परिवेश बहुत तेजी से बदल रहा है। ज्ञान और सूचना को भोजपत्र, पेपाइरस, ताम्रपत्र, क्ले टेब्लेट्स आदि पर दर्ज करने से होता हुआ हमारा समाज टेरा बाइट्स, गीगा बाइट्स के समय तक का सफर तय कर चुका है..

हमारा समाज और भाषायी परिवेश बहुत तेजी से बदल रहा है। ज्ञान और सूचना को भोजपत्र, पेपाइरस, ताम्रपत्र, क्ले टेब्लेट्स आदि पर दर्ज करने से होता हुआ। (फाइल फोटो)

हमारा समाज और भाषायी परिवेश बहुत तेजी से बदल रहा है। ज्ञान और सूचना को भोजपत्र, पेपाइरस, ताम्रपत्र, क्ले टेब्लेट्स आदि पर दर्ज करने से होता हुआ हमारा समाज टेरा बाइट्स, गीगा बाइट्स के समय तक का सफर तय कर चुका है। इस बीच समाज के साथ हमारी भाषा, तकनीक, माध्यम आदि भी बदले हैं। अगर नहीं बदली है तो खुद को अभिव्यक्त करने की छटपटाहट। प्रकाशन, लेखन और संरक्षण के माध्यम और तकनीक में दिनोदिन सुधार और विकास हुआ है। हमारी समझ और ज्ञान को संप्रेषित करने का जरिया भी बदला है। विद्यालयी, विश्वविद्यालयी कक्षाओं से लेकर समाज के ग्राह्य समूह की भाषा भी बदली है। डिजिटल इंडिया में अगर भाषायी सरोकार और हस्तक्षेप को देखने-समझने की कोशिश करें तो पाएंगे कि इसमें खुद को अभिव्यक्त करने की हमारी भाषा खासी बदल चुकी है। इसमें भाषा का संकुचन दिखाई देता है।

कक्षा और कक्षा के बाहर के समाज में भाषायी चरित्र में भी बदलाव देखे जा सकते हैं। सहज और सरल बनाने के तर्क पर भाषा को पहले से गंदला ही किया गया है। समाज में एक ऐसा वर्चस्वशाली वर्ग भी है, जो लगातार बच्चों की स्कूली पाठ्यपुस्तकों में खालिस हिंदी के शब्दों को देखना चाहता है। उस समृद्ध भाषायी दर्शन का गला घोंट कर अन्य बोली-भाषा के शब्दों को हिंदी के आंगन से बेदखल करने पर आमादा है।

एक लंबे अकादमिक और शिक्षा शास्त्रीय विमर्श में भी इस परिघटना को सकारात्मक नजरिए से नहीं लिया गया। प्राथमिक कक्षा से लेकर उच्च शिक्षा में भी भाषा को लेकर एक नया रुख देखने को मिल जाएगा। भाषायी विकास में साहित्य के अहम योगदान को नकारा नहीं जा सकता। बाजार के दबाव ने साहित्य शिक्षण और पठन-पाठन को लघुकृत और छिछला ही किया है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने दसवीं और बारहवीं कक्षा की भाषायी परीक्षा में बहुविकल्पीय प्रश्नों का सिलसिला चलाया। इसके पीछे यह तर्क था कि बच्चों को भाषा में काफी दिक्कतें आती हैं। इसलिए उन्हें बहुविकल्पीय प्रश्न दिए जाएं, ताकि वे आसानी से समझ और लिख सकें। इसी का परिणाम था कि बच्चे अस्सी-नब्बे प्रतिशत अंक तो लाने लगे, लेकिन भाषायी दक्षता छितराती चली गई। लिखने-पढ़ने और बोलने जैसे कौशलों से बच्चे वंचित होने लगे। न वे शुद्ध लिख पाते हैं और न बेहतर तरीके से बोल पाते हैं। न उन्हें अपनी मातृभाषा पर अधिकार रहा। मातृभाषा कहीं न कहीं उन्हें हीन लगने लगी। ऐसे में बच्चों ने हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के स्थान पर गैर-भारतीय भाषाओं को पहली पसंद के तौर पर पढ़ना शुरू किया। निजी स्कूलों में कक्षा छह और आठ में बच्चे फ्रेंच, जर्मन आदि भाषाएं पढ़ने लगे। यहीं से अपनी मातृभाषा और भारतीय भाषाओं से हमारे युवाओं का मोहभंग होने लगा, क्योंकि इन भाषाओं में न केवल अंक मिल रहे थे, बल्कि रोजगार की संभावनाएं भी ज्यादा दिखाई गर्इं।

बाजार की भाषा को पाठ्यक्रमों और भाषा नीतियों में तवज्जो दिया जाना इस बात की ओर संकेत है कि भाषा शिक्षण और अध्ययन महज स्वांत: सुखाय नहीं हो सकता, बल्कि अगर युवाओं को भाषा रोटी नहीं दे सकती तो उस भाषा को क्यों पढ़ा जाए! जाहिर है, भाषा नीति ने भी भाषा के विकास में बाधा पैदा की है। भाषा संरक्षण आयोग और समितियों ने अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभाया, जिसका परिणाम है कि आज भाषाएं दिनोंदिन मर और अप्रासंगिक हो रही हैं।

डिजिटल इंडिया और सूचना संप्रेषण तकनीक में गहरा रिश्ता है। इन दोनों में एक तत्त्व समान है कि किस प्रकार से सूचना तकनीक और उपकरणों से जोड़ कर समाज को आधुनिकता की ओर हांक दिया जाए। आइसीटी का हमारे समाने सिर्फ उजला पक्ष परोसा जा रहा है। इस पक्ष को देख कर अंदाजा लगाना कठिन नहीं है कि आने वाला समाज किस तेजी से अपने मूल्यों, सूचना को कितना और कैसे साझा किया जाए, इस पर विचार किए बगैर बस साझा करने पर उतारू हो जाए। सूचना संप्रेषण तकनीक ने निश्चित तौर पर हमारे कामकाज को काफी हद तक बदल दिया है। यह बदलाव हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में भी घट रहा है।

कामकाज की शैली तो बदली ही है, हमारी आम और निजी जिंदगी के मायने और निजता भी प्रभावित हुई है। बदलाव के दौर में निजी और आम की परतें तकरीबन खत्म हो गई हैं। इस डिजिटल इंडिया की भाषा में बदलाव बहुत तेजी से घटित हुए हैं। यहां भाषा अपनी पुरानी काया लेकर नहीं, बल्कि अंकों यानी डिजिट में मौजूद है। हर किसी की अभिव्यक्ति और उपस्थिति और पहचान अंकीय हो गई है। दूसरे शब्दों में, हमारी पहचान भोजपुरी, मैथिली, अवधी, पंजाबीभाषी से हट कर अंकों में हो गई है, मसलन, आधार नंबर। क्या एक इंसान की पहचान महज अंकों में सिमट गई है?

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