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दुनिया मेरे आगे: रोग का दायरा

आज दुनिया का हर इंसान छोटी-बड़ी किसी न किसी प्रकार की शारीरिक पीड़ा को भोग रहा है। रोगों ने इंसानों का सुख छीन लिया है। अस्पताल और क्लीनिक रोगों और रोगियों से अटे पड़े हैं। दिन-प्रतिदिन चिकित्सक और औषधियों का अभाव बढ़ता जा रहा है, जबकि आज के समय में सरकारें सबसे अधिक ध्यान स्वास्थ्य सुविधाओं की ओर देने का दावा कर रही हैं।

Author Published on: March 21, 2020 5:08 AM
रोगों का दायरा जरूरी

अंजलि ओझा

पहली नजर में यह कहना विचित्र लग सकता है कि रोगों की गुलामी का क्या आशय हो सकता है। वास्तव में है भी। हम जिस जीवनशैली के समाज के रूप में विकसित हुए हैं, उसमें जानवरों को इंसानों की गुलामी करना पड़ता है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इंसानों को भी कई संदर्भों में इंसान की ही गुलामी करनी पड़ती है। आधुनिक दुनिया के जितने भी नगर हैं, साम्राज्य हैं, कभी न कभी सभी गुलामी के दौर को सह चुके हैं। आज दुनिया में मानवाधिकारों को लेकर अधिक सक्रियता है। लोकतांत्रिक पद्धति वाली शासन-व्यवस्थाएं हैं। हालांकि मानवीय स्वतंत्रता और अधिकारों को बाधित करने वाले सियाह कोने आज भी अस्तित्व में हैं जो इंसान को शारीरिक, मानसिक और सांस्कृतिक रूप से गुलाम बनाए हुए हैं। फिर भी इंसान को सबसे अधिक और व्यापक गुलामी किसी की सहनी पड़ रही है तो वह है- ‘रोग’!

रोग को चिकित्सा विज्ञान आधि और व्याधि, दो रूपों में वर्णित करता है। यही आधियां और व्याधियां मिल कर समस्त प्राणी जगत की प्रताड़ना की वजह बनती हैं। इंसानों की तो दीर्घजीविता को रोगों ने ग्रहण लगा दिया है। संपूर्ण ब्रह्मांड में अपना अधिनायकत्व स्थापित करने की महत्वाकांक्षा रखने वाला इंसान रोगों के आगे दुर्बल हो जाता है। शारीरिक दुर्बलता मानसिक अक्षमता में बदल जाती है। मन में उपजी कल्पनाएं, योजनाएं तभी साकार हो पाती हैं, जब शरीर में उन योजनाओं के श्रम को वहन करने की क्षमता होती है। शारीरिक सौष्ठव जीवन को आनंद और सफलताओं से भर देता है। लेकिन जब इसी शरीर में रोगों का घुन लग जाता है, तब यह अत्यंत दुखदायी हो जाता है।

आज दुनिया का हर इंसान छोटी-बड़ी किसी न किसी प्रकार की शारीरिक पीड़ा को भोग रहा है। रोगों ने इंसानों का सुख छीन लिया है। अस्पताल और क्लीनिक रोगों और रोगियों से अटे पड़े हैं। दिन-प्रतिदिन चिकित्सक और औषधियों का अभाव बढ़ता जा रहा है, जबकि आज के समय में सरकारें सबसे अधिक ध्यान स्वास्थ्य सुविधाओं की ओर देने का दावा कर रही हैं। ऐसा इसलिए है कि कई रोगों ने इंसानों के प्रतिरक्षी तंत्र पर कब्जा कर लिया है। वह प्रतिरक्षी तंत्र, जो शरीर का प्रहरी है। जैसे राजमहलों में द्वारपाल की नियुक्ति की जाती थी, जिसके हाथ में एक माला होता था, जो महल में प्रविष्ट होने वाले हर इंसान की जांच-परख करता था और संदेहास्पद व्यक्ति को वहीं ढेर कर देता था, वैसे ही प्रतिरक्षी तंत्र भी शरीर का द्वारपाल और रक्षक है, जो अनिष्टकारी तत्त्वों को मार गिराता है और रोगों से रक्षा करता है। लेकिन जब द्वारपाल ही निर्बल और असहाय हो जाए तो स्पष्ट है कि शत्रु महल में घुस कर राजा को अपना गुलाम बना लेगा। इंसान अपनी कमजोरियों से ही आज ‘रोगों का गुलाम’ है।

जीवन की उत्पत्ति के साथ ही जीवन को समाप्त करने वाले रोगों का भी उद्भव हो गया होगा। ‘एपिडेमिक’ यानी महामारी की स्थियियां तब भी थीं जब ‘चिकित्सा’ जैसे किसी शब्द से मानवीय प्रज्ञा ने साक्षात्कार नहीं किया था। धीरे-धीरे आवश्यकता ने आविष्कार को प्रेरित किया और इंसान जीवन-रक्षा की तमाम विधाओं को खोजने में सफल हुआ। रोगों के न होने की दशाओं पर भी व्यापक चिंतन और कार्य किया गया, लेकिन रोग आज नए-नए रूप धारण करके शरीर को कमजोर कर रहे हैं। खानपान से लेकर जीवनशैली तक में आमूलचूल परिवर्तन ने रोगों को इंसानों को पीड़ित करने के अधिक मौके उपलब्ध करा दिए हैं। विशाल आबादी को भोजन उपलब्ध कराने के लिए अलाभकारी उर्वरकों और कीटाणुनाशकों के बहुउपयोग ने भूमि और अनाज के साथ-साथ इंसानी शरीर को भी कमजोर और बहुत कमजोर कर दिया है।

लगभग सभी लोगों को पेट भरने के लिए खाना तो मिल गया, लेकिन उस खाने की गुणवत्ता, उसके पोषक तत्त्वों भंडार शायद खत्म हो चुका है। आज फलों की आड़ में हम उसे पकाने वाले रसायनों को खा-पी रहे हैं। जिस फल की ताकत से बीमारियां भाग खड़ी होनी चाहिए, उसके जरिए भयानक जहर हमारे शरीर में भरा जा रहा है। ऐसे में शरीर और रोगों से प्रतिरक्षा की क्षमता बढ़ने के बजाय पहले से कहीं अधिक कम हो जाती है और शरीर कई असाध्य रोगों की आश्रयस्थली बन जाता है।आज जबकि चिकित्सा जगत की अपरिमित पहुंच ने बड़े-बड़े कीर्तिमान रच दिए हैं, तब भी अधिकांश जनसंख्या रोगों से ग्रसित है।

हल्के से बुखार को भी जाने में कई बार महीनों लग जाते हैं। हवा-पानी का दूषित होना और रोगाणुओं का दिन-दिन शक्तिशाली होते जाना मानव अस्तित्व के लिए गंभीर संकट की स्थिति उत्पन्न कर रहा है। पहले इंसान दवाइयों और इलाज के अभाव में मर भी जाता था, आज का इंसान दवाइयों और इलाज पाकर भी मर-मर कर जी रहा है। शरीर की अपंगता ने मानसिक सुख हर लिया है। इंसान लाचार और हतबुद्धि होकर जीने की कोशिश कर रहा है और रोग अपनी ‘साम्राज्यवादी’ नीतियों को सफल बनाते हुए मनुष्य को गुलाम बनाए जा रहे हैं। पूरी दुनिया पर राज करने वाला इंसान ‘रोगों की गुलामी’ करने को विवश है।

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