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दुनिया मेरे आगे: स्त्री का घर

समाज ने अपने ढांचे में औरत को सबसे निरीह बना रखा है और उसकी इसी निरीहता को उसकी महानता के रूप में पेश करता है। क्या उसका है और क्या उसका नहीं, यह फैसला करना स्त्री के हाथ में नहीं है।

शशि पांडेय

समाज और परिवार के बारे में जब भी सोचती हूं तो यह बात अक्सर मन में कौंधती रहती है कि इसमें स्त्री की जगह क्या है और आखिर स्त्री का घर कहां होता है! हंसी-मजाक या चुटकुलों मे भी इस बात का खूब मजाक बनाया जाता है। लेकिन सवाल ज्यों का त्यों अक्सर मेरे सामने खड़ा रहता है। मां-बाप के घर में रहने के बाद किसी युवती का विवाह होता है और उसके बाद वह जहां जाती है, वह उसके पति का घर कहा जाता है। सवाल है कि जन्म के बाद पिता का घर, विवाह के बाद पति का घर, तो इस समाज में उस औरत का घर कहां है! महिलाओं को ससुराल में भी यह ताना आमतौर पर मिलता है कि ‘यह तेरे बाप का घर नहीं है’! क्या यह पितृसत्ता के बूते कायम पुरुष प्रधान समाज में स्त्री के अस्तित्व पर सवाल नहीं है? कहने को हमारे समाज ने आधुनिकता का बाना ओढ़ा हुआ है, लेकिन आज भी यही विचार उसके मन और व्यवहार में घुला हुआ है।

एक स्त्री जब सोचने बैठती है तो इस बात पर न भी सोचना चाहे तो आसपास की तमाम घटनाएं उसे यह सोचने पर मजबूर कर देती हैं। कुछ समय पहले ऐसी एक घटना ने मुझे झकझोर कर रख दिया। मेरी एक दोस्त की शादी बड़े और धनी घराने में हुई थी। कुछ समय बाद किन्हीं कारणों से पति-पत्नी के बीच विवाद होना शुरू हो गया। छोटी बातों से शुरू हुए विवाद इस कदर बढ़ गए कि कई बार बात तलाक लेकर अलग हो जाने तक पहुंच जाती। तब उसे घर से निकालने की भी धमकी दी जाती। वह जब इसके विरोध में आवाज उठाती तो उसे अपने ऊपर इस कटाक्ष से गुजरना पड़ता था कि वह जहां रह रही है, वह उसके पिता का घर नहीं है।

यानी ससुराल में एक स्त्री जिन र्इंट-पत्थरों के दीवारों को सजाती-संवारती है, घर के जिन सदस्यों को वह अपना मान कर उनके लिए सब कुछ करती रहती है, कब उसके लिए पराया घोषित कर दिया जाए, यह उसे भी नहीं पता होता है। दरअसल, यह सवाल सिर्फ चारदिवारी के रूप में घर की नहीं है। यह लड़ाई है अधिकारों की, एक औरत के वजूद की। वह वजूद, जहां स्त्री अपने दम पर कह सके कि अमुक चीज उसकी है। समाज में अपनेपन की गाथा सुनाते हुए हम इसे महान परंपरा और संवेदना से जुड़ा पक्ष भले घोषित करते रहें, लेकिन सच यही है कि एक स्त्री पिता या भाई के घर के बाद पति की आश्रित बन कर पालतू बनी जीवन काट लेती है। यह उसका कैसा जीवन है जो दूसरे के आश्रय पर पलने को महानता के रूप में देखा जाता है। पितृसत्तात्मक मानसिकता में जीने वाले समाज में अगर ऐसा हो कि विवाह के बाद पुरुष विदा होकर लड़की के घर जाए तो क्या पुरुषों को ऐसी ही बातों से दो-चार होना पड़ेगा? इस मानस वाला पुरुष ऐसी बात शायद सोच भी नहीं सकता कि वह जिस घर में रहे, उसके बारे में कोई किसी भी मौके पर यह ताना मारे कि ‘यह घर तेरे बाप का नहीं’!

समाज ने अपने ढांचे में औरत को सबसे निरीह बना रखा है और उसकी इसी निरीहता को उसकी महानता के रूप में पेश करता है। क्या उसका है और क्या उसका नहीं, यह फैसला करना स्त्री के हाथ में नहीं है। जिसके बारे में फैसला उसका भी होना चाहिए, उस मामले में वह दूसरों के फैसले पर निर्भर रहती है। विडंबना भी यही है कि इक्कीसवीं सदी की तमाम आधुनिकताओं को जीते हुए समाज में औरत अपना घर तलाश रही है। इस अधिकार की लड़ाई को सार्थक और सफल बनाया जा सकता है। जब स्त्रियां आर्थिक रूप से आजाद होंगी, अपने गुजारे के लिए वे किसी पर आश्रित नहीं रहेंगी, तब जाकर उसका आधा अधिकार पूरा होगा। हालांकि यह बदलाव भौतिक पहलू का होगा। बाकी का आधा अधिकार उसे तब हासिल होगा, जब समाज की सोच बदलेगी।

स्त्री कोई घर के प्रयोग में या सजावट के काम में आने वाली वस्तु नहीं है। अगर कोई ऐसा सोचता है तो अब यह सोच बदलने का वक्त है। यह सोचने और मन से स्वीकार करने की जरूरत है कि समाज में औरत का दर्जा समान है। वह जिस घर में रहती है, उसमें हर स्थिति में उसका बराबर का और इतना अधिकार है कि कोई उसे घर से निकलने को नहीं सकता। हम सभी को मिल कर औरत के घर के बारे में तय करना होगा कि उसका घर कहां है और कौन-सा है। जब तक यह तय नहीं होगा, तब तक यह प्रश्न बना रहेगा कि औरत का घर कहां है, वह किसके घर को अपना घर कहे और किस घर को अपना माने।