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गांव में घर

सन 1974 में मैं उच्च शिक्षा के लिए अपने गांव से मुजफ्फरपुर के लिए निकला था। हाथ में टीन का बक्सा और कंधे पर झोला उठाए। बस पर बैठा तो रो पड़ा।

Author September 11, 2015 10:16 am

सन 1974 में मैं उच्च शिक्षा के लिए अपने गांव से मुजफ्फरपुर के लिए निकला था। हाथ में टीन का बक्सा और कंधे पर झोला उठाए। बस पर बैठा तो रो पड़ा। गांव छूट रहा था। एक बार जो निकला तो गांव फिर वापसी नहीं हुई। मुजफ्फरपुर से पटना, हैदराबाद होते हुए लगभग ग्यारह वर्षों से दिल्ली में हूं। अब उम्मीद यही है कि शेष जीवन दिल्ली में ही कटेगा।

गांव में वापसी नहीं होगी। दिल्ली को अपना परदेस कहने वाले लोग भी कहां लौटे कि मैं वापस हो जाऊंगा! गांव में अब रखा भी क्या है कि लौटूं? जमीन-जायदाद न के बराबर है। मां-बाप हैं नहीं। बहनें सब अपने-अपने घर हैं। मेरे भाई और चचेरे भाइयों की अब अपनी-अपनी दुनिया है। मतलब यह कि गांव जाने का न कोई भौतिक आकर्षण है और न कोई भावनात्मक बंधन, फिर भी मैं हूं कि साल में दो-तीन बार गांव हो ही आता हूं। अब दो-तीन वर्षों की दौड़-धूप और लगभग बीस लाख खर्च करने के बाद वहां एक छोटा घर भी बना लिया है। पैसों की व्यवस्था मैंने की, लेकिन भवन निर्माण की सारी परेशानियां पत्नी और पुत्रों ने उठार्इं।

दिल्ली में अभी मेरे पास कोई घर नहीं है। दो कमरे का एक फ्लैट खरीदने की योजना में लगा हूं। लेकिन अपनी जेब थोड़ी छोटी पड़ रही है। गांव में घर नहीं बनाया होता तो उतनी मुश्किल नहीं आती। गांव में जब घर बनाने जा रहा था तो दिल्ली के मेरे मित्रों ने यह बेवकूफी न करने की नेक सलाह दी थी। उन लोगों के उदाहरण दिए थे, जिन्होंने दिल्ली में होते हुए अपने गांव में घर बनाए और जो अनेक कारणों से वहां रह नहीं सके। मैं जानता हूं कि जब रहना नहीं है तो घर बनाना भावुकता है। लेकिन मैं सारे लाभकारी तर्कों को छोड़ कर अपनी इस भावुकता के साथ जीना चाहता हूं। मैं यह भी जानता हूं कि भावुक होना कोई अच्छी बात नहीं है।

फिर भी घर बनाया तो अपने कुछ निजी भावुक कारण थे। मैं अपने गांव से इतना जुड़ा हूं कि उससे पूरी तरह कट जाने की कल्पना भी नहीं कर सकता। गांव में घर मुझे अपना स्थायी पता-ठिकाना लगता है। अब तक मैंने शहर, मुहल्ले, आवास बदले। फोन नंबर और पचासों बार पत्राचार के पते बदले। इस बदलते रहने ने मुझे आर्थिक-अकादमिक रूप से थोड़ा विस्तृत किया। इस भूमंडलीकृत दुनिया में जब सब कुछ तेजी से परिवर्तनशील है तो मैं उससे अछूता कैसे रहता! फिर भी मैं गांव में घर की तरह खान-पान की कुछ आदतों, रिश्तेदारी, मित्रता आदि को स्थायी भाव से जीता हूं। सो दिल्ली में घर के पहले मैंने गांव के घर के बारे में सोचा।

मुझे लगता है कि गांव में घर के कारण मेरे भीतर थोड़ा देसीपन, लोकतत्त्व, रागात्मकता, संबंधों में स्थायित्व का भाव आदि चीजें बची रहेंगी। मैं उन लोगों में नहीं हूं जो गांव छोड़ कर महानगरों में बस चुके हैं, भूल कर भी गांव नहीं जाते, लेकिन कविता-कहानी, आलोचना आदि में लोकतत्त्व की महिमा गाते रहते हैं। यों तो गालिब ‘बेदरो दीवार का एक घर बनाया चाहिए’ जैसी दार्शनिकता के साथ भौतिक घर की व्यर्थता बता चुके हैं, पर मैं उतने ऊंचे दार्शनिक घर में जीना नहीं चाहता। मुझे तो हिंदी के दो छोटे कवियों की घर विषयक परेशानी अपनी ही लगती है। दुष्यंत कुमार ने लिखा है- ‘जान पहचान नहीं, शेष हैं रिश्ते घर में, घर किराए पे लिए घर की तरह लगते हैं।’

नगरों और यहां के घरों या संबंधों में बेगानेपन की तीव्र अनुभूति है। नगरों में रहते हुए मैं इस बेगानेपन से हमेशा परेशान रहा हूं। गांव का घर इस परेशानी के बीच सुकून का पड़ाव है मेरे लिए। गांव में घर के कारण मेरे माता-पिता, चाचा-चाची, भाई-बहन, रिश्तेदार-दोस्त मेरी स्मृति में बने रहते हैं। स्मृतियों में जीना मुझे अच्छा लगता है।

मेरी स्मृति में अपना मिट्टी का वह घर टंका हुआ है, जहां मेरा जन्म हुआ और पांच वर्ष तक वहां रहने का सौभाग्य मिला। फिर 1960 में मेरे पिता और कई चाचाओं ने र्इंट का छतदार घर बनाया, जो कभी पूरा नहीं बन सका और जो दो साल पहले तक गांव में हमारा पुश्तैनी घर था। वह घर हमारे रहने लायक नहीं रह गया था। उसे तोड़ कर हमने नया घर बना लिया है, जो नए मन-मिजाज के अनुकूल है। उस घर के कारण मैं, पत्नी और बेटे बार-बार गांव जाते हैं। इसलिए कि हमारे पास स्थायी घर और पता-ठिकाना है।

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