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फर्क रंग धूल का

हर राज्य हर शहर का अपना इतिहास है जो उसकी पहचान होती है, जिससे उसे चिह्नित किया जाता है। हाल में हमारे नेताओं ने अपने प्रचार-प्रसार के दौरान विभिन्न जगह की भाषा और वस्त्र का प्रयोग मंच पर किया,...

Author October 23, 2015 1:10 PM

हर राज्य हर शहर का अपना इतिहास है जो उसकी पहचान होती है, जिससे उसे चिह्नित किया जाता है। हाल में हमारे नेताओं ने अपने प्रचार-प्रसार के दौरान विभिन्न जगह की भाषा और वस्त्र का प्रयोग मंच पर किया, ताकि वे अपना संबंध उस जगह से दिखा सकें। लेकिन कुछ बातें जो हमेशा परेशान करती हैं कि क्षेत्रीय भाषा, पहनावा और संस्कृति में तब्दीली की वजह आखिर है क्या? अपनी पहचान से आखिर क्यों भागते हैं हम? क्या हमारी सभ्यता और संस्कृति इतनी कमजोर है कि दूसरों की संस्कृति हम पर हावी होती जा रही है।

बारहवीं उत्तीर्ण करने के बाद मैं छोटे नगर की पगड़ी बांधे कॉलेज में नामांकन की जोत जगाए देश की धड़कन दिल्ली में आ पहुंचा। यहां मौजूद मेरे जानने वालों में मेरी बुआ की बेटियां थीं, जो दिल्ली से नजदीक गाजियाबाद के हाइवे पर एक अस्पताल में डॉक्टर थीं। मैं उनके यहां ठहरा और अपने नामांकन की कोशिश में जुट गया। माली हालत की वजह से नामांकन नहीं हो सका और एक वर्ष का इंतजार बढ़ गया।
यहां मेरी बुआ की छोटी बेटी, जो मुझसे बड़ी है, वह आइएएस बनने का सपना लिए एक पुरजोर कोशिश में लगी हुई थीं। मैं भी उनके साथ उनके संस्थान में जाने लगा। वहां हफ्ते में दो दिन पढ़ाई होती थी। दिल वालों के शहर में बिताए हुए दो दिन पूरे हफ्ते की गाजियाबाद की खामोशी पर भारी पड़ने लगे थे। नए रंग में रंगा यह मुगलों का शहर मुझ पर एक दम हावी होने लगा। मेरे लहजे से कोई जान नहीं सकता था कि मैं कहां से हूं। अंग्रेजी हो या फिर वेशभूषा, मैं पूरा दिल्ली वालों जैसा हो चुका था।

एक शाम अपनी बहन और उसके दोस्तों के साथ घूमते हुए हम नजदीक ही एक पित्जा के स्टॉल पर जा पहुंचे। बातचीत के दौरान एक ने मुझसे कहा कि ‘तुम तो जरा भी बिहारी नहीं दिखते… बोल-चाल से भी नहीं।’ छोटे शहर की काया पर ओढ़ी गई आधुनिक रंग की प्रशंसा हो रही थी। मैंने अपनी इस तारीफ को अपनी विजय समझा। मैं खुश था कि मैंने अपनी पहचान को बड़ी आसानी से छिपा लिया था। अंग्रेजी को अपनी भाषा में मैंने मिला लिया था।

मेरी तब्दीली ने रंग दिखाया था। मैं अपनी जमीन से दूर हो चुका था तो उसकी गर्द भी उतार दी थी। कुछ खोने का अहसास नहीं था मुझे। दोस्तों से दूर, घर वालों से दूर, मोहल्ला भी अपना नहीं था। और यह तो अपने बड़ों से ही सीखा था मैंने। जो भी बिहार जाता, फिर कभी दो-तीन महीने बाद लौटता तो उसके चाल-ढाल में एक ओछा-सा नयापन होता। तो मैंने भी बस वही किया था, सो मैं खुश था!
एक सुबह अखबार पढ़ते हुए एक लेख पढ़ा, जिसका मूल संदेश था कि ‘किसी जीव का विनाश तब निश्चित हो जाता है, जब वह अपना वजूद खो दे।’ मैं अपने विचारों की सीढ़ियों पर खड़ा इस संदेश को समझ कर भी कुछ और तथ्य निकालने का प्रयत्न कर रहा था। यों कहें कि अपने विजय की आलोचना मैं पढ़ नहीं पा रहा था। तभी मेरे फोन की घंटी बजी। उठाते ही आवाज आई- ‘हेलो, आप कौन? और मिस्ड कॉल क्यों किया?’ मैंने कहा- ‘मैं जिलानी।

मैंने यह नया नंबर लिया है तो कॉल किया। पर तुमने उठाया नहीं।’ उधर से आवाज आई- ‘भाई आप!’ मैंने कहा कि अच्छा… पहचान भी नहीं पाई! मेरी बहन ने कहा- ‘नहीं, ऐसी बात नहीं है। बस आपकी आवाज पहले से दमदार हो गई है।’ हालांकि मैंने कहा कि मेरी आवाज तो पहले जैसी ही है। बहन ने कहा- ‘नहीं, अभी वाला एक दम नया-सा लग रहा है।’

मैं स्तब्ध हो गया कि कहीं यह विनाश की बात तो नहीं है कि मेरे अपने मुझे पहचान न सके। मैं समझने की पूरी कोशिश कर रहा था कि मैंने क्या किया है। अब बस मुझे लौटना होगा अपनी पुरानी, उतरी हुई कमीज की तरफ। वह रंग जो मुझ पर चढ़ा था, वह धूल था। असली रंग तो वह है जो मेरी जमीन का है, जिसे मैंने गर्द समझा था। मेरी तारीफ करने वाले भी दिल्ली के नहीं थे। उनका संबंध भी एक गांव से था। उन्होंने अपनी पहचान खो दी थी और मैंने छिपा दी थी। अब मैं बेचैन हूं कि कोई राह से गुजरे तो ये कह दे- ‘यार, तुम तो पूरे बिहारी हो!’
गुलाम हुसैन

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