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दुनिया मेरे आगेः हिंदी खड़ी बाजार में

जब भाषा संप्रेषण कम और हैसियत का माध्यम ज्यादा बन जाए तो उसके प्रति लोगों का नजरिया बदल जाता है। लोगों के वोटों तक पहुंचने के लिए हिंदी की सीढ़ी चाहिए और उनके द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों तक पहुंचने के लिए अंग्रेजी की।

जब भाषा संप्रेषण कम और हैसियत का माध्यम ज्यादा बन जाए तो उसके प्रति लोगों का नजरिया बदल जाता है।

सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

कई बार थी, है और रहेगी की ऊहापोह स्थिति के बीच हिंदी को ढूंढ़ना कभी-कभी मजाक-सा लगता है। जब कहते हैं कि देश में इतने करोड़ लोग हिंदी बोलते, पढ़ते, समझते, लिखते हैं तो सीना गर्व से फूल उठता है। इसी के बलबूते जब उसे नई शिक्षा नीति में अनिवार्य करने की बात आती है तो फिर बहुत सारे लोग विरोध में भी उतर आते हैं। हंसी आती है उन लोगों पर जो नेताओं को ‘गिरगिट’ कहते हैं। हम क्या कम हैं! हममें से कोई निकल कर नेता बनता है। हृदय की पीड़ा उस समय और गहरा जाती है यह सोच कर कि हिंदी भाषा विषय की श्रेणी से निकल कर कहीं इतिहास का विषय न बन जाए। फिर कोई पढ़ाता मिलेगा कि पाली, प्राकृत, अपभ्रंश की तरह हिंदी भी एक भाषा हुआ करती थी। कबीर, तुलसी, जायसी, सूरदास आदि हुआ करते थे। अगर कोई गलती से भी हिंदी को राष्ट्रभाषा कह दे तो इक्कीस अन्य भाषाएं झगड़ा करने पर उतारू हो उठती हैं। जबकि हमने संविधान की रचना देश में एक-दूसरे से झगड़ा करने के लिए नहीं की थी।

संविधान की अष्टम सूची में हिंदी के साथ अन्य इक्कीस भाषाओं को जो दर्जा देकर एक दुविधाजनक स्थिति बनाई गई है, उसका खमियाजा हिंदी कदम-कदम पर झेल रही है। अगर हिंदी को कोई प्राचीन भाषा कह दे तो तमिल भाषी नाराज हो जाते हैं। अगर हिंदी को कोई मीठी भाषा कह दे तो दो-दो हाथ करने के लिए कोई अन्य भाषा खड़ी हो जाती है। अगर कोई इसे सुंदर लिपि कह दे तो किसी कोने से कोई भाषा अपनी खूबसूरती के प्रमाण देने लगती है।

राजभाषा हिंदी की स्थिति दिखाने वाले हाथी के दांत की तरह है। व्यवहार में यह केवल कहने, सुनने, पढ़ने, लिखने या दिखाने के लिए बहुत सुंदर लगती है। जबकि हाथी के खाने वाले दांत तो अंग्रेजी के हैं। ऊपर से कुछ और अंदर से कुछ। हिंदी को नाममात्र के लिए राजभाषा का दर्जा देकर ऊपर से कई नियमों की कील ठोंक दी गई है। ‘मैं अभी जिंदा हूं’ की तर्ज पर कभी-कभार बैंकों, रेलवे स्टेशन, डाकखाना, हवाई अड्डों पर घूमती हिंदी दिखाई पड़ जाती है। थोड़ा-सा सुकून और फिर ज्यादा पीड़ा होने लगती है। कभी-कभी लगता है कि इस भाषा के हिस्से में अब केवल पीड़ा बची है, जो आंसू बहाने के सिवा कुछ नहीं कर सकती। कहने को तो इसकी लिपि दुनिया में सर्वश्रेष्ठ और वैज्ञानिक मानी जाती है, लेकिन इसकी वैज्ञानिकता और श्रेष्ठता पर काम करने वाले इसका बखान अंग्रेजी में करते हुए नहीं थकते। यह भाषा समाज के निम्न वर्गों, निर्धनों तक व्याकरणिक दोष के साथ दुनिया से लुप्त हो रही मानवता की भांति थोड़ी-बहुत मात्रा में सुरक्षित है। दुर्भाग्य से जिनके पास यह सुरक्षित है, अब उन्हीं के दिन लदने लगे हैं।

हिंदी दिवस, सप्ताह, पखवाड़ा, माह और चाहे जो कुछ भी मना लें, मनाते सितम के अंबर के नीचे ही तो हैं! बहुत अच्छा लगता है जब भाषणों में इसे देश की सबसे अधिक बोली, लिखी, सुनी और पढ़ी जाने वाली भाषा कहा जाता है। बहुत अच्छा लगता है जब बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने उत्पाद टीवी और अन्य प्रचार-प्रसार माध्यमों के जरिए हिंदी में बेचते हैं। देश की सबसे अधिक कमाऊ, बिकाऊ और गाने-बजाने की यह भाषा उस समय और भी बहुत अच्छी लगती है, जब फिल्म और टीवी से जुड़े लोग मोटी-मोटी कमाई कर अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यमों के बड़े-बड़े स्कूलों में भेजते हैं, जहां हिंदी बोलने की सजा कभी कक्षा के बाहर कान पकड़े घुटनों के बल खड़े होकर भुगतनी पड़ती है, या फिर नोटबुक भर-भर कर तब तक यह लिखवाया जाता है, जब तक वह यह न कबूल ले कि अगली बार से हिंदी में बोलने की गलती नहीं करेगा।

जब भाषा संप्रेषण कम और हैसियत का माध्यम ज्यादा बन जाए तो उसके प्रति लोगों का नजरिया बदल जाता है। लोगों के वोटों तक पहुंचने के लिए हिंदी की सीढ़ी चाहिए और उनके द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों तक पहुंचने के लिए अंग्रेजी की। आजादी के इतने वर्षों बाद भी हमारे न्यायालयों को अंग्रेजी के चक्रव्यूह से निकलना तो दूर, सोचने के बारे में भी फुर्सत नहीं है। देश की उच्च शिक्षा आज भी अंग्रेजी के मायाजाल में फंसी हुई है। जब सपने हिंदी में आते हैं तो अंग्रेजी में बयान करने की मायावी विद्या सीखें तो सीखें कैसे? ऐसे लोगों के लिए भारत में ‘इंडिया’ बन कर रहना बड़ा मुश्किल है। ओके, थैंक्यू, प्लीज, सॉरी जैसे चंद शब्दों से महाग्रंथ लिखने की अपेक्षा करने वाले इस देश में हिंदी का सारगर्भित ज्ञान भी ओछा नजर आता है।

हिंदी के राष्ट्रभाषा या राजभाषा होने का सवाल एक ऐसा सवाल है, जिसे पूछता है तो हर कोई है, लेकिन जवाब किसी के पास नहीं है। कभी-कभी यह भाषा भी सोचती होगी कि उससे ऐसी कौन-सी गलती हो गई कि वह आज भी अपना अस्तित्व बनाने के लिए एड़ी-चोटी की मेहनत कर रही है। प्रशासनिक सदनों, नीति की गलियों और नियति के हाथों आज हिंदी धोखा खाए बाजार में खड़ी है। बावजूद इसके वह संवैधानिक शब्दों में सभी भाषाओं की दीर्घायु की कामना कर रही है।

 

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