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भाषा के प्रश्न

पिछले दिनों आकाशवाणी के अस्थायी उद्घोषकों की स्वर-परीक्षा में निर्णायक के रूप में शामिल होने का अवसर मिला। इस स्वर-परीक्षा में एक प्रश्नपत्र भी था, जिसमें कई तरह के प्रश्न थे। प्रतिभागियों से उर्दू, हिंदी और अंगरेजी शब्दों के उच्चारण भी करने को हम लोग बराबर कह रहे थे।

जब हमारे विद्वान धड़ल्ले से ‘लब्धप्रतिष्ठ’ की जगह ‘लब्ध प्रतिष्ठित’ बोल रहे हैं, ‘अनेकों’ और ‘श्रीमति’ का प्रचलन आम और क्षम्य हो गया है, तो फिर युवा पीढ़ी का क्या दोष! वह तो वही आत्मसात कर रही है, जो हम उसको परोस रहे हैं।

पिछले दिनों आकाशवाणी के अस्थायी उद्घोषकों की स्वर-परीक्षा में निर्णायक के रूप में शामिल होने का अवसर मिला। इस स्वर-परीक्षा में एक प्रश्नपत्र भी था, जिसमें कई तरह के प्रश्न थे। प्रतिभागियों से उर्दू, हिंदी और अंगरेजी शब्दों के उच्चारण भी करने को हम लोग बराबर कह रहे थे। आश्चर्य की बात है कि दो-चार अभ्यर्थियों को छोड़ कर लगभग सबने अंगरेजी के उच्चारण ठीकठाक किए, पर हिंदी और उर्दू के उच्चारण को लेकर स्थिति काफी शोचनीय थी। हालांकि प्रश्नपत्र काफी स्तरीय था और उस पर पर्याप्त मेहनत की गई थी। कवयित्री, हिमकिरीटनी और बाजार, रोजनामचा, गजल जैसे उच्चारण करने में भावी उद्घोषकों को बहुत कठिनाई हो रही थी।

हिंदी के गद्य अवतरण और पद्यांश को ढंग से पढ़ने में तो वे किसी तरह सफल हो गए, लेकिन उसमें आए शब्दों और खासकर देशज शब्दों को लेकर उनका ज्ञान अत्यंत कमजोर था। यहां तक कि वे कॉमा और विस्मयादिबोधक जैसे चिह्नों का अर्थ भी नहीं समझते थे। जब उनसे रुक कर पूछा गया कि ‘कंदील’, ‘मेंड़’ शब्द का अर्थ जानते हैं, तो उन्होंने अनभिज्ञता जाहिर की। यह दशा देश में भाषा ज्ञान की एक तस्वीर पेश करती है। मैंने अपने लंबे अनुभव में देखा है कि शिक्षा से जुड़े लोग भी ऐसी विकट भाषिक गलतियां करते हैं कि सिर धुनने का मन होता है।

एक नामी-गिरामी स्कूल का विज्ञापन कहता है कि हमारे यहां अपने होनहार को प्रवेश दिला कर उसका भविष्य ‘उज्जवल’ बनाएं। अब जिसे ‘उज्ज्वल’ लिखना नहीं आता, उसके यहां पढ़ा कर भी भला क्या करना है। व्याकरण और हिंदी-इंग्लिश के छौंक की तो बात ही न करें। शहर की एक दुकान पर लिखा हुआ है भगवती नमकीनस एंड मिष्ठान्न भंडार। हिंदी, अंगरेजी का ऐसा मणिकांचन संयोग आपको बहुत कम देखने को मिलेगा। एक खबरिया चैनल कहता है कि एक ‘टीचर’ ने अपने बैंक बैलेंस से यह कमाल कर दिखाया। क्या शिक्षक या अध्यापक प्रचलन से बाहर हो चुका है? या हम एक सोची-समझी साजिश के तहत युवा पीढ़ी को उसकी साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत से विलग कर रहे हैं।

मुझे उद्घोषकों की इस स्वर-परीक्षा में सबसे ज्यादा आश्चर्य तो तब हुआ जब वे लोग निराला और प्रसाद के नाम और उनकी कृतियां भी नहीं बता पाए। जबकि जूलियट सीजर के बारे में अधिकतर लोगों ने सही जवाब दिए। मार्टिन लूथर किंग और महात्मा गांधी के विषय में भी उनका ज्ञान शून्य के बराबर था। यहां तक कि कई लोगों को उनकी आत्मकथा तो छोड़िए, गांधीजी के जन्म स्थान के विषय में भी नहीं पता था।

हमारी युवा पीढ़ी किस तरह सोशल मीडिया और अधकचरे ज्ञान तक सीमित है, यह इसका ज्वलंत उदाहरण है। उनसे विवेकानंद से जुड़े सवाल भी पूछे गए। लेकिन दो-चार प्रतिभागियों को छोड़ कर कोई भी विवेकानंद के विषय में चलताऊ जानकारी से ज्यादा नहीं दे पाया। प्रचार किस तरह दिग्भ्रमित करता है और महापुरुष किस तरह अपहृत हो जाते हैं, इसका उदाहरण तब पता चला जब एक महिला ने कहा कि विवेकानंदजी ने एबीवीपी की स्थापना की थी। एक मुहावरा था- गुदड़ी का लाल, जिसके बारे में दो मिनट तक बोलना था। लगभग सभी अभ्यर्थियों ने इसकी शाब्दिक व्याख्या की। उदाहरण बहुत कम ने दिए। अधिकतर उद्घोषकों के उदाहरण अंगरेजी प्रभाव से ग्रस्त थे। वे ‘सिया के राम’ धारावाहिक के रावण की तरह हिंदी उच्चारण कर रहे थे। उनसे बार-बार हमें आग्रह करना पड़ रहा था कि स्पष्ट पढ़ें, थोड़ा जुड़ कर पढ़ें, भाव के साथ पढ़ें। यह स्थिति बताती है कि हमारी युवा पीढ़ी साहित्य, भाषा आदि को लेकर कहां खड़ी है।

किसी भी उद्घोषक ने दिए गए प्रश्न के अनुसार साक्षात्कार तैयार करने के लिए दिए गए विकल्पों- समाजसेवी, वकील, संगीतज्ञ और साहित्यकार में से साहित्यकार को चुनना मुनासिब नहीं समझा। ऐसी स्थिति में अगर किताबें एक हजार या पांच सौ के संस्करण में छप रही हैं, तो चिंता न कीजिए। जब हमारे विद्वान धड़ल्ले से ‘लब्धप्रतिष्ठ’ की जगह ‘लब्ध प्रतिष्ठित’ बोल रहे हैं, ‘अनेकों’ और ‘श्रीमति’ का प्रचलन आम और क्षम्य हो गया है, तो फिर युवा पीढ़ी का क्या दोष! वह तो वही आत्मसात कर रही है, जो हम उसको परोस रहे हैं। भाषा वही जो पेट पाल सके और इस दौड़ में हिंदी, उर्दू कहां टिकती हैं बेचारी।

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