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दुनिया मेरे आगे: भाषा बहता नीर

हिंदी का विपुल साहित्य, व्यापक भौगोलिक क्षेत्र, बाजारवाद में हिंदी का बोलबाला और बोलने वालों की जनसंख्या इसे मजबूती प्रदान करने के लिए काफी हैं।

देश में हिंदी भाषा के प्रति दुराग्रह चिंता का विषय है।

निशा यादव

महामारी के दौरान आॅनलाइन शिक्षा के माध्यम से पढ़ाई करते मेरे पांच वर्ष के बेटे को अध्यापिका ने कहा- ‘वाट्स कम्स आफ्टर ‘क’? …नाउ वी विल रीड अ-अ:’! एक हिंदी शिक्षिका होने के नाते मेरे लिए इस पर असहज और चकित होना लाजिमी था। बात सिर्फ अध्यापिका के पढ़ाने तक नहीं रुक जाती है, क्योंकि अब बच्चा ‘बाद’ और ‘पहले’ के बजाय ‘बिफोर’ और ‘आफ्टर’ को ही समझता है। ‘हिंदी नई चाल में ढली’ -आधुनिक युग के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र् की यह पंक्ति तत्कालीन समय में हिंदी के व्यापक होते स्वरूप की ओर इंगित करती है, लेकिन वर्तमान हिंदी की स्थिति पर भी यह पंक्ति कम नहीं फबती है! ‘केवल अंग्रेजी में बोलो’ जैसे निर्देश का असर इतना गहरा और व्यापक होता है, इसका परिणाम इस दृष्टांत के बाद मेरे सामने था।

हिंदी एक स्वतंत्र और पूर्ण भाषा है। उसका अपना समृद्ध शब्द भंडार है, अपने क्रियारूप हैं, पदक्रम हैं। किसी भाषा की विभक्तियां, क्रियारूप उसको एक पूर्ण और स्वतंत्र भाषा बनाते हैं और दूसरी भाषा से अलग भी बनाते हैं। प्रसिद्ध वैयाकरण किशोरीदास वाजपेयी ने अपने ‘हिंदी शब्दानुशासन’ में इस बात को स्पष्ट किया है- ‘क्रियापद, अव्यय, विभक्तियां तथा सर्वनाम। ये चार मुख्य स्तंभ हैं, जिस पर किसी भी भाषा का अस्तित्व टिका रहता है। ये शब्द कभी बदलते नहीं, कभी भी किसी दूसरी भाषा से कोई भाषा लेती नहीं।’ लेकिन यहां तो हिंदी वर्णमाला की ध्वनियों का उच्चारित और लिखित रूप भी इस तरह से बच्चों को पढ़ाया जा रहा है, जैसे लैटिन-भाषी बच्चों को पढ़ाया जा रहा हो।

इस तरह के उदाहरणों से हमारी प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा जैसी पहल बेमानी-सी लगती है। हाल ही में नई शिक्षा नीति में तीन भाषाओं को पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने की जो घोषणा की गई है, उसके पीछे भी सरकार का मंतव्य मातृभाषाओं को बढ़ावा देना ही है। अपनी भाषा में सीखने-समझने और सृजनात्मकता की जो स्वच्छंदता बच्चों को मिलती है, वह विदेशी भाषाओं में नहीं मिल पाती है और न ही बुद्धि का सर्वांगीण विकास हो पाता है। भाषा संस्कृति की वाहिका होती है, अस्मिता होती है। भाषा मानव-मात्र को सिर्फ सामाजिक ही नहीं बनाती है, बल्कि इस हाड़-मांस के शरीर में भाषा-रूपी ज्योति प्रज्वलित होकर इसके बुत न होने का प्रमाण भी देती है। इसलिए भाषा का महत्त्व मानव जीवन में सर्वव्याप्त है।

आज हमारे सामने हिंदी दिवस, विश्व हिंदी दिवस, अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस भंवर या झंझावात में हिचकोले खाती भाषाओं के स्मृति दिवस के रूप में सामने आते हैं। समस्या विकट इसलिए हो जाती है कि ये सारे भाव सिर्फ स्मृति और व्याख्यानों में ही सिमट कर रह गए, हम इन्हें व्यवहार में नहीं ला पाए हैं। भाषा की व्यापकता, समृद्धि और जीवंतता उसके व्यवहार पर ही निर्भर करती है। यही उसका खाद-पानी है। इसीलिए कहा गया है कि भाषा बहते हुए पानी की तरह है, जितना बहेगी अपने आसपास की भाषाओं से अपने शब्द भंडार को उतना ही समृद्ध करेगी।

हिंदी में न केवल संस्कृत के, बल्कि अरबी-फारसी, पुर्तगाली, डच, तुर्की और अंग्रेजी के शब्द भरे पड़े हैं और इस तरह से घुल-मिल चुके हैं कि हम चाहकर भी आज उन्हें हिंदी से अलग नहीं कर सकते। भाषाओं का यह आदान-प्रदान शब्दों के स्तर पर ज्यादा होता है, लेकिन जब दो भाषाएं सांस्कृतिक एवं भाषाई दृष्टि से ज्यादा संपर्क में आ जाती हैं, तो ध्वनि और वाक्य-रचना भी परस्पर उनको प्रभावित करते हैं। मसलन, अरबी-फारसी की नुक्ता वाली ध्वनियां और पश्तो भाषा के ‘दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीता है’ जैसी हिंदी में रम चुकी लाकोक्तियां हैं।

हिंदी का विपुल साहित्य, व्यापक भौगोलिक क्षेत्र, बाजारवाद में हिंदी का बोलबाला और बोलने वालों की जनसंख्या इसे मजबूती प्रदान करने के लिए काफी हैं। दूसरी ओर, विज्ञान और तकनीक के इस युग में जब हम विज्ञान से कदमताल करने की कोशिश करते हैं तब हम विकल्पहीन होकर फिर अंग्रेजी के शरणार्थी बन जाते हैं। यह भी चिंतन का विषय है कि जब हम कहते हैं कि विज्ञान-तकनीक के विषयों को अंग्रेजी में ही पढ़ा और समझा जा सकता है, इसलिए आज हमें न चाहते हुए भी अंग्रेजी को अपनाना पड़ता है। लेकिन प्रसिद्ध वैज्ञानिक सत्येन बोस ने बांग्ला भाषा के संदर्भ में कहा था- ‘अगर कोई बंगाली कॉलेज अध्यापक यह कहता है कि वह बांग्ला में भौतिक विज्ञान नहीं पढ़ा सकता, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह बांग्ला नहीं जानता, बल्कि इसका मतलब है कि वह भौतिक विज्ञान नहीं जानता।’ उनका यह कथन सभी भारतीय भाषाओं के संदर्भ में आज भी प्रासंगिक लगता है।

जाहिर है, कोई भी भाषा अपूर्ण नहीं होती है। किसी भी जाति या समुदाय की भाषा में उस जाति या समुदाय के लोगों के भावों की अभिव्यक्ति की पूर्ण सामर्थ्य रहती है। बात चाहे भारतीय स्तर की हो या वैश्विक स्तर की, रोज कोई न कोई भाषा मर रही है। 2011 से शुरू हुई भाषाई जनगणना में यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि भारत एक तरह से भाषाई कब्रगाह बन चुका है। भाषा का मरना एक संस्कृति, जाति और समुदाय का हमेशा के लिए खामोशी की चादर ओढ़ने जैसा है। भाषा की जीवंतता के लिए उसका बहते रहना यानी व्यवहार में लाना जरूरी है।

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