नायक और आदर्श

हर उम्र के अपने नायक यानी हीरो होते हैं। समय और उम्र के साथ ये हीरो बदलते रहते हैं।

सांकेतिक फोटो।

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी

हर उम्र के अपने नायक यानी हीरो होते हैं। समय और उम्र के साथ ये हीरो बदलते रहते हैं। जब बच्चा छोटा होता है तो घर में सबसे ज्यादा रौब वाले व्यक्ति को अपना हीरो मानने लगता है। देखता है कि जब सभी लोग उसका कहा मानते हैं, तो उसे लगता है कि यह हीरो दुनिया का हर काम कर सकता है। जब बच्चा बड़ा होता है और घर के बाहर जिस व्यक्ति को रौब मारते देखता है, तो उसे भी अपना हीरो मानने लगता है। इसी तरह यह शृंखला बढ़ती जाती है।

जब बच्चा बड़ा होकर स्कूल जाता और देखता है कि बस का कंडक्टर सभी बच्चों को बस में ठीक से और ठीक स्थान पर बैठने का कहता है, तो बच्चे को लगता है कि सभी बस कंडक्टर का कहा मानते हैं, तो वह उसका अगला हीरो हो जाता है। उसे लगता है कि उसकी बस का कंडक्टर किसी सुपर हीरो से कम नहीं है। फिर जब वह देखता है कि क्लास को मानीटर नियंत्रित कर रहा है तो मानीटर उसका हीरो हो जाता है।

शिक्षक को जब वह सभी को प्रभावित करके क्लास को नियंत्रित करते देखता है, तो शिक्षक को हीरो मानने लगता है। जब प्रार्थनासभा में प्राचार्य को सभा को नियंत्रित करते देखता है तो प्राचार्य उसका हीरो हो जाता है। इसी तरह जिंदगी के विभिन्न मोड़ों पर उसके हीरो बदलते जाते हैं। चाहे वह यातायात का सिपाही या अफसर हो या किसी कार्यालय में काम करने वाला या सभा को नियंत्रित करने वाला व्यक्ति। साधारण व्यक्ति की असाधारण क्षमता ही तो उसे हीरो का दर्जा दिलाती है।

हीरो बनने के लिए बड़ी ऊंचाई से कूदना या हैरतअंगेज कारनामा करना ही जरूरी नहीं। छोट-छोटे काम दिलेरी से करना और सही समय पर सही निर्णय लेकर किसी की मदद करना भी हीरो का दर्जा दिलाता है। जैसे नर्स, कंपाउंडर के रूप में या फिर कोई ऐसा छोटा-सा काम, जिसे करने की कोई हिम्मत ही न कर रहा हो, वह भी नायक हो सकता है। इन्हीं नायकों में से बच्चे अपना-अपना भावी आदर्श ढूंढ़ लेते हैं और उन्हें अपने सामने रख कर उन्हीं के अनुसार बनने का सपना संजोते हैं। कोई प्राध्यापक को आदर्श मान लेता है तो कोई डाक्टर या अफसर को या फिर खिलाड़ी, नेता या अभिनेता को या फिर किसी कलाकार को। इसी तरह यह सिलसिला चलता रहता है। कुछ लोग अपराधी किस्म के और खलनायक जैसे लोगों को भी अपना आदर्श मान कर उन जैसा बनना चाहते हैं।

नायक कब आदर्श में बदल जाता है, यह पता ही नहीं चल पाता। यह एक धीमी प्रक्रिया है, जो सतत चलती रहती है और आदर्श के रूप में स्वीकार किए गए हीरो की मौन-सी खूबी उसे आदर्श में बदल देती है। यह भी बाद में ही पता चल पाता है। एक विद्यार्थी अपने आदर्श शिक्षक को इस कारण आदर्श मानता था, क्योंकि वे बड़े विनोदप्रिय थे और छोटे-छोटे और आसान शब्दों से बनाए गए वाक्यों में अद्वितीय हास्य भाव पैदा कर देते थे। पर साथ ही मदिरापान भी बहुत करते थे। छात्र को उनकी विनोदप्रियता रास आई या मदिरापान का शौक, कौन जाने?

कभी-कभी गफलत भी होती है और नतीजतन सारा मिजाज गड़बड़ा जाता है। यह भी होता ही है कि जिसे हम आदर्श मानते रहे हों, उसकी किसी बात से किसी वजह से हमारा भ्रम टूट जाए और हम उससे दूर हो जाएं। नायक खलनायक लगने लगे। एक बार ऐसा होते खुद मैंने देखा। एक कन्या महाविद्यालय की वरिष्ठ प्राचार्या एक बड़े कवि का काव्य पाठ सुन कर इतनी ज्यादा प्रभावित हुर्इं कि उन्होंने यहां तक कहा कि उन्होंने अपने जीवन में ऐसा यादगार आयोजन कभी नहीं देखा। पर जैसे ही उन्हें पता लगा कि कवि को मदिरापान का शौक है, वे उस महान लग रहे कवि की आलोचना करने लगीं। सिर्फ दो घंटे में उनकी उस कवि की बनाई छवि भंग हो गई।

मैं हैरान था कि कवि के बारे में राय उसकी कविता को केंद्र में रख कर बनाई जानी चाहिए या उसकी किसी कमजोरियों को आधार बना कर। क्या कवि और कविता अलग-अलग नहीं हैं? टीएस इलियट ने तो कहा है कि कवि के व्यक्तिगत जीवन पर आधारित आलोचना कभी स्तरीय और श्रेष्ठ आलोचना नहीं हो सकती। कवि जो सहता और भुगतता है उसका उसकी कविता से कोई संबंध नहीं है, क्योंकि काव्य सृजन में विवेक मिश्रित भावना और संवेदना ही महत्त्वपूर्ण होती है।

यही बात खिलाड़ी को हीरो मानने वाले व्यक्ति का उस खिलाड़ी से केवल इस आधार पर मोहभंग हो जाना कि उसकी जीवन में कुछ कमजोरियां हैं, अनुचित है। हम उसके खेल, उसकी खेल शैली और उपलब्धि पर ध्यान दें और उनका मूल्यांकन करें। उसके निजी जीवन की शल्य चिकित्सा की क्या जरूरत है?

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