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दुनिया मेरे आगेः कारीगरी की विरासत

हजार हवेलियों के शहर बीकानेर में हवेलियां आज भी अपने अतीत को लिये खड़ी हैं। लेकिन कुछ सरकार की उदासीनता और बढ़ते शहरीकरण के कारण इनका पुरातत्त्व भी धीरे-धीरे छीज रहा है।

Author May 14, 2018 04:09 am
ऐसी कई हवेलियां हैं जो पैसों के लिए बिकने के कगार पर खड़ी हैं। अपने अतीत को समेटे इन हवेलियों के रखरखाव और उचित संरक्षण की जरूरत है।

बृजमोहन आचार्य

काम के सिलसिले में मुझे करीब दो साल तक राजस्थान के झुंझुनूं जिले में रहने का मौका मिला था। इस जिले को शहीदों का जिला कहा जाता है, क्योंकि देश की रक्षा के लिए सरहद पर हर मौसम में तैनात रहने वाले हमारे जवान इसी जिले से सर्वाधिक संख्या में आते हैं और उन्हीं में से बहुत सारे जवानों ने वतन की रक्षा करते हुए अपनी जान न्योछावर कर दी। इस जिले के हर दूसरे गांव में शहीद की प्रतिमा नजर आ जाती है। एक गांव को तो यहां के लोग शहीदों का गांव ही कहते हैं। सैनिकों के इस जिले को नजदीक से देखने का मौका मिला तो हर उस स्थान को देखा और खानपान का स्वाद लिया था जो कभी किताबों में पढ़ने को मिलता था। इस जिले में मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित यहां की हवेलियों ने किया था। झुझुनूं, नवलगढ़, मलसीसर और मंडावा की हवेलियां हमारा ध्यान आकर्षित करती हैं।

यहां जल संरक्षण के लिए बनाए गए कई कुओं ने भी अपनी अलग पहचान बनाई है। इन कुओं का निर्माण यहां के सेठ-साहूकारों ने जनता को मुफ्त पानी उपलब्ध कराने के लिए किया था। इनके निर्माण में मुगल स्थापत्य कला का स्वरूप मौजूद है। हालांकि अंधाधुंध जल दोहन होने के कारण इन कुओं का महत्त्व अब समाप्त होने लगा है। हवेलियों और कुओं के महत्त्व के बारे में जब सोच रहा था तो बीकानेर और जैसलमेर की हवेलियों की ओर ध्यान गया। हालांकि इन दोनों जगहों की हवेलियों की पहचान विश्व-पटल पर छाई हुई है और विदेशों से आया कोई भी पर्यटक आमतौर पर इन हवेलियों को देखता ही है।

दरअसल, हजार हवेलियों के शहर बीकानेर में हवेलियां आज भी अपने अतीत को लिये खड़ी हैं। लेकिन कुछ सरकार की उदासीनता और बढ़ते शहरीकरण के कारण इनका पुरातत्त्व भी धीरे-धीरे छीज रहा है। यों बीकानेर के अधिकतर पुराने मुहल्लों में हवेलियां खड़ी हैं, मगर रामपुरियों की हवेलियां आज भी अपनी ओर ध्यान खींचती हैं। इनके निर्माण में दुलमेरा के लाल पत्थरों का सबसे अधिक उपयोग किया हुआ है। सोलहवीं शताब्दी के दौरान दुलमेरा में मिले लाल पत्थरों के महत्त्व को यहां के सेठों ने समझा और उनका उपयोग हवेलियों के निर्माण में करना शुरू किया। यहां की सभी हवेलियों पर की गई कोरनी की बारीकियों को देख कर लगता नहीं है कि ये हाथों से बनाई गई हैं। हवेलियों की सूरत पर बेहद करीने से बनी जालियां, झरोखे और हवा के लिए बनाई गई खिड़कियां ऐसे लगती हैं जैसे सैलानियों को कुछ कह रही हों।

पुराने बीकानेर में कई मुहल्लों में हवेलियां देखने को मिल जाएंगी, लेकिन एक मुहल्ला है, जिसे रामपुरियों का मुहल्ला कहते हैं। वहां रहने वाले सेठ-साहूकारों ने अपने रहने के लिए हवेलियों का निर्माण कराया था। लेकिन काम-धंधे के सिलसिले में वे बीकानेर छोड़ कर चले गए। इसके बाद यहां वापस आकर कभी ध्यान नहीं दिया। फिर भी इन हवेलियों की अंदर से दशा कैसी है, कोई बताने को तैयार नहीं है। इन पर ताले लगे हैं। हालांकि बाहरी हिस्से को देख कर मन को सुकून मिलता है कि आज भी ये हवेलियां अपने पुराने वैभव को समेटे हुए हैं। इन पर बनी खिड़कियां और झरोखे बनाने का मूल उद्देश्य यह था कि मरुस्थल की प्रचंड गरमी में रात के समय शीतल बयार का आनंद लिया जा सके। इन पर पत्थर से बनाए गए बेल-बूटे और पत्तियों की झालर देख कर लगता है कि कारीगरों ने पत्थरों को रबड़ समझ कर मरोड़ दिया हो। हवेलियों पर उकेरे गए फूल, बलखाती बेलें, पत्ते और अन्य विभिन्न आकृतियां कलाकारों की उत्कर्ष कारीगरी का नायाब नमूना हैं। इनके निर्माण में जल भंडारण और वास्तु का भी विशेष ध्यान रखा गया है।

बरसात के पानी को फिजूल में नालियों में न बहा कर बावड़ियों का निर्माण करवा कर पानी के महत्त्व को समझा गया है। हवेलियों की स्थापत्य-कला में बीकानेर की संस्कृति इस तरह रची-बसी है मानो स्थापत्य कला का उद्भव यहीं पर हुआ हो। हवेलियों पर बने भित्ति-चित्रों में देवी-देवताओं के चित्रों को भी काफी महत्त्व दिया गया है। इतना सब कुछ होते हुए भी हवेलियां उपेक्षा का शिकार हो रही हैं। विडबंना यह है कि इनका निर्माण कराने वालों की पीढ़ियां इनकी देखभाल कभी-कभार ही करती हैं। कई हवेलियों के जाली-झरोखे और दरवाजे बिक चुके हैं और पत्थरों को उतार कर कहीं और रख दिया गया है। स्वाभाविक ही कभी शहर की शान रही इन हवेलियों के संरक्षण की दरकार महसूस की जाने लगी है। हालांकि सरकार ने रामपुरियों की हवेलियों को पुरातत्त्व संरक्षण के अंतर्गत रखा हुआ है। फिर भी ऐसी कई हवेलियां हैं जो पैसों के लिए बिकने के कगार पर खड़ी हैं। अपने अतीत को समेटे इन हवेलियों के रखरखाव और उचित संरक्षण की जरूरत है।

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