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दुनिया मेरे आगे- लाचार इंसानियत

जब मैं एक स्कूल में पढ़ाता था, तब मैंने एक बार विद्यार्थियों से पूछा कि आकाश में पक्षी समूह में ‘वी’ आकार में क्यों उड़ते हैं! विद्यार्थियों ने काफी कोशिश की, लेकिन सही उत्तर नहीं बता सके।

Author September 10, 2016 2:20 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

जब मैं एक स्कूल में पढ़ाता था, तब मैंने एक बार विद्यार्थियों से पूछा कि आकाश में पक्षी समूह में ‘वी’ आकार में क्यों उड़ते हैं! विद्यार्थियों ने काफी कोशिश की, लेकिन सही उत्तर नहीं बता सके। फिर मेरे पास जो जानकारी थी, वह मैंने उन्हें बताई कि पक्षी आकाश में इसलिए ऐसा करते हैं कि हवा को काटते हुए आसानी से उड़ सकें। पक्षियों में एक और बात ध्यान देने योग्य है। अगर उनका कोई साथी छूट जाता है या उनमें किसी को चोट लग जाती है, तो समूह के अन्य पक्षियों में से दो पक्षी उस छूटे पक्षी को फिर से अपने साथ लाते हैं। इस तरह वे पीछे छूटे पक्षी की सहायता करते हैं। यह संयुक्त रूप से कार्य करने की प्रणाली भी है जिसे आजकल प्रचलित भाषा में ‘टीम मैनेजमेंट’ कहा जाता है। कहने का मतलब यह कि मनुष्येतर उपलब्धियों से इतर प्रकृति में मौजूद बहुत सारे जीव हमें हर स्तर पर एक नई शिक्षा देते हैं। इस ओर भी बहुत सारे लोगों का ध्यान गया होगा कि जैसे ही किसी पक्षी की मौत हो जाती है तो उसके अन्य साथी इकट्ठा होकर अपनी भाषा में शोर मचाते हैं। यह उनका अपने दुख को प्रकट करना होता है। साथ-साथ रहने वाले कुछ पशुओं को तो मैंने खुद देखा है कि उनमें से किसी की मृत्यु हो गई तो दूसरे बहुत ज्यादा विलाप करते हैं, अपना भोजन तक नहीं करते।

दूसरी ओर, मनुष्य जिन संवेदनाओं के उच्चतम स्तर को हासिल करने या इनके साथ जीने का दावा करता रहा है, आजकल संवेदनाओं के अभाव या इसके छीजते जाने की शिकायतें सबसे ज्यादा उन्हीं के बीच पाई जा रही हैं। सही है कि किसी की मौत के बाद रोते रहने से व्यक्ति वापस नहीं आएगा। लेकिन क्या इस सच के लिए ही अपने भीतर की सारी संवेदना को मार डाला जाए? मनुष्य में एक चीज जीवित बची दिखती है- अपने घर, परिवार और धर्म के प्रति मोह। इसके सिवा वह अपने संवेदनहीन हो जाने पर भी तब तक गौर नहीं करता, जब तक खुद किन्हीं दुखद हालात में नहीं फंस जाता। सामान्य स्थितियों में मनुष्य लगातार इस बात का दंभ भरता है कि वह तो जानवर से बेहतर है। जबकि मनुष्यों ने ही कभी यह मुहावरा गढ़ा होगा कि ‘अपने लिए तो जानवर भी जी लेता है, दूसरों के लिए जीना ही जीवन है।’ कुछ दिन पहले दिल्ली के बदरपुर से गुजर रहा था। सड़क किनारे एक मृत व्यक्ति पड़ा था। थोड़ी ही दूर दो पुलिस वाले मोबाइल पर बात कर रहे थे। मेरे मित्र ने बताया कि यह लाश कल से ही यहां पड़ी है। मैं इस बात को लेकर आश्चर्य और दुख में था। किसी को भी उस मृत व्यक्ति के बारे में जानने की जरूरत नहीं थीं। पुलिस की पूछताछ के पचड़े में कोई नहीं पड़ना चाहता था। इसलिए कोई पहल नहीं करना चाह रहा था। शायद मैं भी इन्हीं में शामिल था। संवेदनहीनता का एक चक्र बन गया है, जिसे हमारी व्यवस्था ने भी बढ़ावा दिया है।

जबकि सभी धर्मों के अनुयायी यह दावा करते दिखते हैं कि उनका धर्म सबसे मानवीय है। लेकिन मानवीय संवेदनाओं के लिए सबसे जरूरी जगहों पर धर्म के वे भाव या तो निरपेक्ष रहते हैं या फिर धर्म के नाम पर ही घोर अमानवीय हरकतें की जाती हैं। जब तक कोई व्यक्ति बहुत मुश्किल में अपना जीवन काट रहा होता है, संगठित रूप से कोई भी धर्म उसकी मदद करने आगे नहीं आता। लेकिन जैसे ही किन्हीं वजहों से उसके धर्मांतरण की अफवाह भी फैल जाती है तो धर्म के कथित रक्षक इसके विरोध में हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। धर्म के नाम पर होने वाले दंगों में लूटपाट, आगजनी, मासूमों की हत्या, महिलाओं और बच्चियों से बलात्कार से लोग नहीं हिचकते।

ये सभी अपने कथित ‘मानवीय’ धर्म को बचाने की लड़ाई लड़ने का दावा कर रहे होते हैं! यह कैसा धर्म है जो इंसानियत के लिए न्यूनतम संवेदना और विवेक की जगह नहीं छोड़ता? ऐसा लगता है कि समूचे समाज को एक भीड़ में तब्दील कर देने की कोशिश हो रही है। सब यंत्रवत अपने काम से मतलब रखते हैं और अपनी राह निकलते रहते हैं। किसी के निजी फैसले पर हंगामा मचाने वाले इस बात से मतलब नहीं रखते कि वह भूख से दो-चार है या किसी समस्या से। मैंने देखा है कि सड़क के किनारे बेसुध पड़ा हर व्यक्ति शराब के नशे में नहीं होता। कोई भूख की वजह से भी उस हालत में हो सकता है। लेकिन उसे एक बार पलट कर भी कोई नहीं देखता। मुझे लगता है कि अपने धर्मोपदेशकों, बाबाओं या नेताओं के कहने पर धर्म की रक्षा के लिए मरने-मारने पर उतारू होने से ज्यादा जरूरी है कि इंसानियत और उसकी संवेदनाओं को बचा लिया जाए।

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